आचार्य आनंद ऋषिजी की जीवनगाथा का गुणगान, जन्मजयंती पर 1008 से अधिक आयंबिल तप की भव्य भेंट अर्पित

शरीर और संयम की चादर को जीवनभर मलिन नहीं होने दिया आनंद ऋषिजी ने : युवाचार्य महेन्द्र ऋषिजी

पुनित चपलोत

भीलवाड़ा |स्मार्ट हलचल|राष्ट्रसंत आचार्य सम्राट आनंद ऋषिजी महाराज की 126वीं जन्म जयंती शांतिभवन में श्रमणसंघीय युवाचार्य महेन्द्र ऋषिजी, यशोदिप्ती मधुकंवरजी, उप प्रवर्तिनी दिव्यज्योतिजी, महासती सुचेताजी, स्मितभाषी प्रियुदर्शनाजी सहित संत- साध्वी वृंद के सान्निध्य में मनाई गई। इस अवसर पर तपस्वी भाई-बहनों ने सामूहिक रूप से 1008 आयंबिल तप की आराधना कर आचार्यश्री के चरणों में तप की भेंट अर्पित की।
जन्मजयंती गुणगान समारोह में युवाचार्यश्री ने आचार्य आनंद ऋषिजी के व्यक्तित्व और संयममय जीवन का उल्लेख करते हुए कहा कि व्यक्तित्व की वास्तविक पहचान बाहरी रूप से नहीं, बल्कि भीतर की शुचिता, शील और आचरण से होती है। बाहर दिखाई देने वाला व्यक्तित्व और भीतर का अस्तित्व अलग होता है। चेहरा कितना ही प्रभावशाली क्यों न हो, वास्तविक श्रेष्ठता अंतरंग पवित्रता से प्रकट होती है।
आचार्यश्री की जीवनशैली में स्वच्छता केवल शरीर और वस्त्रों तक सीमित नहीं थी। उनके व्यवहार में सदाचार की सुगंध, विचारों में निर्मलता और प्रत्येक व्यक्ति के प्रति मंगलभाव सहज दिखाई देता था। उनका चलना, बैठना और व्यवहार भी उनके अंतरंग व्यक्तित्व की गरिमा को प्रकट करता था। उस महापुरुष के चरण जहां-जहां पड़े, वहां की रज तक लोगों ने श्रद्धा से सुरक्षित रखी। उनके प्रति यह गहरी आस्था उनके पवित्र आचरण और संयममय जीवन की ही अभिव्यक्ति थी।
युवाचार्यश्री ने कहा कि आचार्यश्री के जीवन में वात्सल्य और अनुशासन का अद्भुत संतुलन था। वे अपनी असुविधा से अधिक दूसरों की साता का ध्यान रखते और किसी के मन को ठेस न पहुंचे, इसका भी ख्याल रखते थे। वहीं साधुचर्या, अनुशासन और मर्यादा के मामले में किसी प्रकार का समझौता नहीं करते थे।
उन्होंने कहा कि आचार्यश्री ने इंसानों को भी संभाला और पात्रों को भी। शिष्य का हित, संघ की मर्यादा और साधु जीवन का अनुशासन उनके लिए समान रूप से महत्वपूर्ण था। उनका वात्सल्य व्यक्ति के प्रति था, लेकिन सिद्धांतों में कोई शिथिलता नहीं थी।
युवाचार्यश्री ने कहा कि शरीर माता-पिता से मिली चादर है और संयम गुरु से मिली चादर। आचार्य आनंद ऋषिजी ने दोनों चादरों को जीवनभर मलिन नहीं होने दिया। शरीर के प्रति सजगता रखते हुए उन्होंने साधुचर्या की मर्यादा और संयम का पूरी निष्ठा से निर्वहन किया। गुरु से प्राप्त संयम को उन्होंने शील, सदाचार, अनुशासन और सिद्धांतनिष्ठ जीवन से गरिमा प्रदान की।
उन्होंने कहा कि आचार्यश्री का जीवन उस महापुरुष की जीवनगाथा है, जिसने गुरु से मिली संयम की चादर को केवल धारण नहीं किया, बल्कि अपने आचरण से उसकी मर्यादा को जीवनभर निभाया। उनकी जन्मजयंती पर उनका स्मरण तभी सार्थक है, जब उनके जीवन से मिले इन मूल्यों को अपने आचरण में उतारने का भाव जागे।
इस अवसर पर हितमितभाषी हितेंद्र ऋषि जी, महासती प्रियुदर्शनाजी,विदुषी सुप्रभाजी, साध्वी चिंतनश्रीजी, साध्वी काव्याश्रीजी एवं यश सुशिष्या सुप्रभाजी आदि ने भजन एवं विचारों के माध्यम से आचार्यश्री के जीवन का स्मरण करते हुए कहा कि आचार्यश्री शरीर रूप में भले हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनके संस्कार, विचार और गुण आज भी समाज को दिशा दे रहे हैं।
इसदौरान साध्वी नाव्याश्रीजी के 11 उपवास पूर्ण होने पर युवाचार्यश्री ने उन्हें आदर की चादर प्रदान कर तप की अनुमोदना की।महिला मंडल की बहनों ने भी नौ उपवास का संकल्प लेकर साध्वीजी को आदर की चादर ओढ़ाई। वहीं 29 उपवास की दीर्घ तपस्या पूर्ण करने वाली आशादेवी कुकड़ा का श्री संघ, महावीर युवक मंडल एवं शांति जैन महिला मंडल की ओर से अभिनंदन पत्र भेंट कर सम्मान किया गया।
शांतिभवन के अध्यक्ष राजेन्द्र प्रसाद चीपड़ एवं मंत्री नवरतनमल भलावत ने बताया कि जन्मजयंती समारोह में 1008 से अधिक श्रावक-श्राविकाओं ने युवाचार्यश्री से आयंबिल तप के प्रत्याख्यान ग्रहण किए। आचार्य आनंद ऋषिजी महाराज की जन्मजयंती पर हुई इस सामूहिक तप आयंबिल के लाभार्थी नवरतनमल बंब का श्री संघ की ओर से अभिनंदन किया गया। तथा तपस्यार्थियों के तप की सामूहिक रुप अनुमोदना की गई