ज़हर उगलती चिमनियाँ, मौत बांटती नदियां………..सरकार एवं सिस्टम की चुप्पी

सरकार एवं सिस्टम की चुप्पी, आखिर मेरे शहर में कब जागेगा न्यायतन्त्र !

विशेष रिपोर्ट-आकाश शर्मा
चित्तौड़गढ़ । स्मार्ट हलचल|पाली, बांडी और जोजरी नदियों में औद्योगिक प्रदूषण के दानव को देख कर सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में जो स्वतः संज्ञान लिया है, उसने देश की सोई हुई नौकरशाही और लापरवाह उद्योगों की चूलें हिला कर रख दी हैं। माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने दो टूक शब्दों में यह संदेश दिया है कि औद्योगिक विकास या रोजगार की आड़ में आम नागरिकों, बेजुबान पशुओं और पर्यावरण के जीवन से खिलवाड़ करने वाले किसी भी कारखाने या तंत्र को बख्शा नहीं जाएगा। लेकिन विडंबना देखिए कि राजस्थान के चित्तौड़गढ़ जिले में, जहां सदानीरा गंभीरी और बेड़च नदियां बहती थीं, वहां हालात पाली से भी बदतर और भयावह हो चुके हैं।

1. हिदुस्तान जिंक चंदेरिया जिंक स्मेल्टर प्लांट से छोडा जा रहा रासायनिक घुआं ।

चंदेरिया स्थित हिंदुस्तान जिंक लिमिटेड (HZL) स्मेल्टर प्लांट से निकलने वाले जहरीले अपशिष्ट और घातक गैसों ने चंदेरिया, नगरी, बिलिया, आजोलिया का खेड़ा, सुरजना, मुगा का खेड़ा जैसे दर्जनों गांवों के अस्तित्व को संकट में डाल दिया है। इतना ही नहीं, इस पूरे खेल का एक और स्याह पहलू भी है अपनी ज़हरीली करतूतों पर पर्दा डालने के लिए बड़े उद्योग घरानों ने आजोलिया का खेड़ा और चंदेरिया जैसे क्षेत्रों के स्थानीय मार्बल व्यवसाइयों व लघु उद्योगों की मार्बल स्लरी को पर्यावरण का ‘सबसे बड़ा खतरा’ बताकर मुख्य मुद्दे से ध्यान भटकाने का घिनौना प्रयास किया। हद तो तब हो गई जब राजस्थान राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने भी इन लघु इकाइयों को ऑरेंज कैटेगरी में डाल दिया ! यह शहर के स्थानीय व्यापारियों के धंधे को पूरी तरह ठप्प करने और अपना रंग चोखा करने की सोची-समझी मंशा का हिस्सा है । जल्द ही हम इस पूरे गठजोड़ का एक बड़ा खुलासा करने जा रहे हैं । यदि शहर के व्यापारी और स्थानीय उद्यमी अब भी नहीं जागे, तो वे हमेशा के लिए अपने व्यापार से हाथ धो बैठेंगे ।
प्रदूषण का तांडव और मौत के मुहाने पर खड़े गांव !

2. हिदुस्तान जिंक चंदेरिया लेंड जिंक स्मेल्टर प्लांट के पास प्रदुषित बहता नाला

चंदेरिया स्मेल्टर प्लांट से लगातार रिसने वाला रासायनिक कचरा सीधे तौर पर गंभीरी और बेड़च नदियों में उड़ेला जा रहा है, जिससे इन जीवनदायिनी नदियों का पानी पूरी तरह जहरीला हो चुका है। स्थिति यह है कि इन नदियों के तटवर्ती क्षेत्रों में न केवल इंसानों का जीना मुहाल है, बल्कि पानी की तलाश में भटकने वाले मूक पशुओं (मवेशियों) के लिए यह पानी काल साबित हो रहा है। इसके अलावा, प्लांट से निकलने वाली जहरीली गैसें हवा में घुलकर आसपास के दर्जनों गांवों के लोगों के फेफड़ों को अंदर से गला रही हैं। ग्रामीणों के खेतों की उपजाऊ मिट्टी बंजर होती जा रही है और भूजल इस हद तक प्रदूषित हो चुका है कि कैंसर और गंभीर बीमारियों का खतरा मंडरा रहा है।
मजदूरों की जिंदगी दांव पर,अंदर की खौफनाक सच्चाई !

3. हिदुस्तान जिंक चंदेरिया जिंक स्मेल्टर के समीप सें गुजरती बैडेच नदी जों अपनी कहानी खुद ही बंया कर रही है ।3.  हिदुस्तान जिंक चंदेरिया जिंक स्मेल्टर के समीप सें गुजरती बैडेच नदी जों अपनी कहानी खुद ही बंया कर रही है ।
मामले की तह में जाने पर जो तथ्य सामने आते हैं, वे रोंगटे खड़े करने वाले हैं। हमारे कार्यालय में मौजूद पुख्ता सबूत इस बात की गवाही देते हैं कि हिंदुस्तान जिंक प्रबंधन द्वारा अपने प्लांट के भीतर काम करने वाले आम श्रमिकों के जीवन और सुरक्षा मानकों के साथ खुलेआम खिलवाड़ किया जा रहा है। मुनाफे की अंधी हवस में मजदूरों की जान की परवाह किए बिना उन्हें घातक गैसों और खतरनाक माहौल के बीच काम करने के लिए मजबूर किया जाता है ।
जिला प्रशासन और प्रदूषण मंडल की संदेहास्पद भूमिका !

4. हिदुस्तान जिंक चंदेरिया जिंक स्मेल्टर के समीप सें गुजरती बैडेच नदी का मटमैला पानी ।

सबसे बड़ा सवाल यह है कि इस गंभीर जनसंहार और पर्यावरणीय अपराध पर जिला प्रशासन और राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (चंदेरिया) की आंखें क्यों बंद हैं? आज दिनांक तक इन विभागों द्वारा जिंक प्रशासन के खिलाफ कोई भी पुख्ता, ठोस और दंडात्मक कार्रवाई अमल में नहीं लाई गई है। प्रशासनिक खामोशी यह साबित करने के लिए काफी है कि मोटी रकम और रसूख के दम पर इस अवैध साम्राज्य को संरक्षण मिल रहा है।
दबाई जाती आवाजें और न्याय की अंतिम उम्मीद !
जब भी इन गांवों के पीड़ित किसान और ग्रामीण अपने हक, साफ हवा और शुद्ध पानी के लिए आवाज उठाते हैं, तो जिंक प्रबंधन अपनी आर्थिक ताकत और धनबल के जोर पर उनकी आवाजों को कुचल देता है, दबा देता है। स्थानीय जनता की चीखें कागजों में दफन होकर रह जाती हैं।
लेकिन अन्याय का यह अंधकार अधिक समय तक टिक नहीं सकता। जिस प्रकार सर्वोच्च न्यायालय ने पाली की लूणी, बांडी और जोजरी नदियों की सुध लेते हुए नौकरशाही को चेताया है और प्रो-एक्टिव रवैया अपनाने का आदेश दिया है, ठीक उसी तर्ज पर अब चित्तौड़गढ़ के इन पीड़ित किसानों और बेजुबानों की नजरें माननीय उच्च न्यायालय पर टिकी हैं। क्षेत्र की जनता को पूरी उम्मीद है कि न्यायपालिका इस गंभीर मामले का स्वतः संज्ञान लेगी, जिला प्रशासन व जिंक प्रशासन की साठगांठ को बेनकाब करेगी और इन निर्दोष ग्रामीणों की पीड़ा सुनकर जिंक के काले कारनामों पर कड़ा प्रहार करेगी।
अब वक्त आ गया है कि राज्य सरकार, जिला प्रशासन और प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड अपनी कुंभकर्णी नींद से जागे, अन्यथा जनमानस का यह आक्रोश किसी भी दिन एक बड़े जन-विस्फोट का रूप ले सकता है।