क्या अब खत्म कर देना चाहिए नगर विकास न्यास? प्रदेशभर में उठी मांग, निगम में विलय से रुकेगा भ्रष्टाचार?

जनता का सवाल— जब सारे काम निगम कर सकता है तो अलग न्यास की जरूरत क्यों? करोड़ों खर्च कर पद हासिल करने की होड़ पर भी उठे सवाल

भीलवाड़ा/ जयपुर।स्मार्ट हलचल।प्रदेश में नगर विकास न्यास (यूआईटी) की कार्यप्रणाली को लेकर लगातार सवाल उठ रहे हैं। आमजन और विभिन्न सामाजिक संगठनों के बीच अब यह मांग जोर पकड़ने लगी है कि नगर विकास न्यास विभाग को समाप्त कर उसके सभी अधिकार और दायित्व नगर निगम को सौंप दिए जाएं। लोगों का तर्क है कि जब अधिकांश शहरी विकास कार्य नगर निगम भी प्रभावी ढंग से कर सकता है तो फिर अलग से न्यास जैसी संस्था बनाए रखने का औचित्य क्या है?
प्रदेशभर में चर्चा है कि नगर विकास न्यास वर्षों से विवादों, अनियमितताओं और भ्रष्टाचार के आरोपों के घेरे में रहा है। भूमि आवंटन, भू-उपयोग परिवर्तन, पट्टों और विकास योजनाओं से जुड़े मामलों में समय-समय पर सवाल उठते रहे हैं। ऐसे में जनता पूछ रही है कि आखिर इस व्यवस्था से आम नागरिक को क्या लाभ मिल रहा है?
क्या दो-दो विभागों की व्यवस्था विकास में बाधा बन रही है?
शहरों में अक्सर विकास कार्यों को लेकर यह भ्रम की स्थिति बनी रहती है कि संबंधित कार्य नगर निगम के अधीन है या नगर विकास न्यास के। कई बार सड़क, नाली, सीवरेज, पार्क और अन्य आधारभूत सुविधाओं के कार्यों में जिम्मेदारी तय नहीं हो पाती और जनता परेशान होती रहती है।
लोगों का कहना है कि जब एक ही शहर में दो अलग-अलग एजेंसियां विकास कार्यों की जिम्मेदारी संभालेंगी तो समन्वय की कमी होना स्वाभाविक है। आखिर जवाबदेही तय किसकी होगी? विकास कार्यों में देरी का जिम्मेदार कौन होगा?
जनप्रतिनिधियों की नियुक्ति पर भी उठे सवाल
जनता के बीच यह चर्चा भी आम है कि नगर विकास न्यास में अध्यक्ष और अन्य महत्वपूर्ण पदों पर नियुक्ति पाने की होड़ में भारी राजनीतिक दबाव और आर्थिक प्रभाव देखने को मिलता है। आरोप लगते रहे हैं कि इन पदों की दौड़ में करोड़ों रुपये तक खर्च किए जाते हैं। यदि यह धारणा सही है तो फिर इसकी भरपाई आखिर कहां से होती है?
प्रदेशवासियों का सवाल है कि क्या ऐसी व्यवस्था भ्रष्टाचार को बढ़ावा नहीं देती? क्या न्यास को निगम में मर्ज कर देने से इस तरह की संभावनाओं पर अंकुश नहीं लगेगा?
विलय से क्या होंगे फायदे?
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि नगर विकास न्यास को नगर निगम में विलय कर दिया जाए तो प्रशासनिक खर्च कम होंगे, जवाबदेही बढ़ेगी और विकास कार्यों में अनावश्यक दोहराव समाप्त होगा। एक ही संस्था के माध्यम से योजनाओं का क्रियान्वयन होने पर निर्णय प्रक्रिया भी तेज हो सकती है।
साथ ही जनता को यह भी स्पष्ट रहेगा कि किसी भी विकास कार्य की जिम्मेदारी किस विभाग की है। इससे शिकायतों के समाधान में भी तेजी आएगी।
भ्रष्टाचार पर लगेगी लगाम?
जनता का एक बड़ा वर्ग मानता है कि न्यास और निगम जैसी समानांतर व्यवस्थाओं के कारण पारदर्शिता प्रभावित होती है। यदि दोनों संस्थाओं का एकीकरण हो जाए तो वित्तीय और प्रशासनिक नियंत्रण मजबूत होगा तथा भ्रष्टाचार की संभावनाएं कम होंगी। सवाल यह है कि क्या सरकार इस दिशा में कोई बड़ा फैसला लेने का साहस दिखाएगी?
जनता पूछ रही है— अलग न्यास की जरूरत आखिर क्यों?
प्रदेशभर में अब यह बहस तेज हो रही है कि क्या नगर विकास न्यास अपने मूल उद्देश्य को पूरा कर पा रहा है या फिर यह केवल एक अतिरिक्त प्रशासनिक ढांचा बनकर रह गया है? जब नगर निगम शहरी विकास के अधिकांश कार्य करने में सक्षम है तो अलग से न्यास बनाए रखने का औचित्य क्या है? क्या समय की मांग नहीं है कि इस व्यवस्था की व्यापक समीक्षा कर जनता के हित में बड़ा निर्णय लिया जाए?
फिलहाल जनता की नजरें सरकार पर टिकी हैं। देखना यह होगा कि बढ़ती मांगों और उठते सवालों के बीच सरकार नगर विकास न्यास की भूमिका पर पुनर्विचार करती है या नहीं। आखिर शहरी विकास के नाम पर दोहरी व्यवस्था कब तक चलती रहेगी? और यदि इससे भ्रष्टाचार तथा भ्रम की स्थिति पैदा हो रही है तो उसका समाधान कब निकलेगा?