काला चश्मा और उपसभापति! मुकेश्या नंद महाराज…. एक बेबाक राजनीतिक व्यंग्य

पान का बीड़ा, काला चश्मा और उपसभापति!
मुकेश्या नंद महाराज….
एक बेबाक राजनीतिक व्यंग्य #17 — आकाश शर्मा
स्मार्ट हलचल|बाबाजी… पान का बीड़ा तो दबा लिया, काला चश्मा भी चढ़ा लिया… अब बताओ, नगर परिषद की राजनीति में अगला पत्ता कौन सा खुलने वाला है ? वत्स…बाबाजी जनता तो सभापति का नाम सुनने के लिए कान लगाए बैठी थी,सुन भी लिया और देख भी लिया … लेकिन असली हलचल तो अब उपसभापति की कुर्सी को लेकर दिखाई दे रही है ! बाबाजी…अच्छा ! यानी सभापति की कुर्सी पर तो सबकी नजर थी, अब उपसभापति की कुर्सी ने भी राजनीतिकों की नींद उड़ा दी ? वत्स…बिल्कुल बाबाजी ! वार्ड 60 और वार्ड 2 के दावेदारों को लेकर राजनीतिक गलियारों में चर्चाओं का बाजार गर्म है । हर चाय की थड़ी पर एक नया समीकरण, हर मोबाइल कॉल में एक नया नाम और हर गुट के पास अपनी-अपनी गणित ! बाबाजी…. वाह वत्स ! राजनीति में गणित भी बड़ा विचित्र होता है… जोड़ कोई लगाता है और घटता कोई और है ! वत्स… बाबाजी, वार्ड 60 से जुड़े सुरेन्द्र सिंह राजोरा उर्फ गोपाल सिंह को लेकर भी राजनीतिक गलियारों में उनके पुराने राजनीतिक सफर की चर्चा हो रही है । चर्चाओं के मुताबिक वे पहले कांग्रेस से अलग होकर निर्दलीय चुनाव मैदान में उतरे थे और चुनाव जीतने के बाद तत्कालीन बोर्ड में कांग्रेस को समर्थन दिया था । बाद में उन्होंने भाजपा का रुख किया और भाजपा मंडल अध्यक्ष की जिम्मेदारी भी संभाली । बाबाजी….अरे वत्स… राजनीति में पाला बदलना कोई नई बात नहीं। लेकिन जनता की याददाश्त बड़ी खतरनाक चीज है… वो पुराने पन्ने भी कभी-कभी खोल देती है ! वत्स… यही तो बात है बाबाजी । विधानसभा चुनाव के दौरान भाजपा प्रत्याशी के समर्थन में उनकी भूमिका की भी चर्चा होती रही, लेकिन उनके अपने वार्ड के चुनावी नतीजों को लेकर भी सवाल उठते रहे । अब राजनीतिक चर्चाओं में यही सवाल है कि टिकट और पद के फैसले में पुराना राजनीतिक रिकॉर्ड, संगठन के प्रति भूमिका और स्थानीय समीकरण कितने महत्वपूर्ण होंगे ? बाबाजी….मतलब वत्स… उपसभापति की कुर्सी सिर्फ कुर्सी नहीं, पूरा राजनीतिक कैलकुलेटर है ! वत्स….और दूसरी तरफ बाबाजी, वार्ड संख्या 2 से घनश्याम मेनारिया का नाम भी चर्चा में है । लंबे समय से सामाजिक गतिविधियों और जनसेवा से जुड़े होने की बात कही जाती है। वर्ष 2014 में भाजपा पार्षद रहते हुए पुरानी आबादी से जुड़े स्थानीय निवासियों के मामले को रिकॉर्ड में पुरानी आबादी के रूप में दर्ज कराने की दिशा में उनकी भूमिका का भी उल्लेख समर्थकों की ओर से किया जाता है, जिससे स्थानीय निवासियों को नियमों के तहत राहत और आवास नियमितीकरण का रास्ता मिला । बाबाजी…अच्छा ! यानी एक तरफ राजनीतिक सफर के पन्ने हैं और दूसरी तरफ पुराने कामों की फाइल ! वत्स…. जी बाबाजी । समर्थकों का कहना है कि पार्टी के प्रति निष्ठा, सेवाभाव और लंबे समय से क्षेत्र में सक्रियता को भी निर्णय लेते समय ध्यान में रखा जाना चाहिए । बाबाजी… लेकिन वत्स, राजनीति में दावेदार तो इतने होते हैं कि गिनने बैठो तो पान सूख जाए… पद कितने हैं ? वत्स… बस यही तो पूरा खेल है बाबाजी ! दावेदार अनेक… लेकिन कुर्सी एक ! चंदेरिया उपनगरीय क्षेत्र में भी सर्वसमाज के बीच यह चर्चा सुनाई दे रही है कि उपसभापति जैसे महत्वपूर्ण दायित्व के लिए पार्टी किस तरह का चेहरा सामने लाती है अनुभव, संगठनात्मक भूमिका, सामाजिक स्वीकार्यता या कोई बिल्कुल नया समीकरण ? बाबाजी…वत्स, तूने तो मेरी चाय भी ठंडी कर दी ! आखिर फैसला किसके नाम पर होगा ? बाबाजी, यही तो रहस्य है। नामों की चर्चाएं चल रही हैं, समीकरण बन रहे हैं, फोन घूम रहे हैं और समर्थक अपने-अपने उम्मीदवार की पैरवी में जुटे हैं। लेकिन अंतिम फैसला पार्टी के स्तर पर ही होगा । तो फिर सुन वत्स…कल तक जो नाम सबसे आगे दिखाई दे रहा हो, जरूरी नहीं कि आखिरी पर्ची उसी की निकले ! मतलब बाबाजी… कोई सरप्राइज पैकेज ? बाबाजी…अरे वत्स! राजनीति में पान का बीड़ा मुंह में दबाने से पहले स्वाद पता चल जाता है… लेकिन राजनीतिक पत्ता खुलने से पहले खिलाड़ी का नाम पता नहीं चलता ! और हां…काला चश्मा लगाकर बाबाजी ने आंखें तो छिपा लीं, लेकिन मुस्कान बता रही थी कि उन्हें कुछ तो मालूम है ! बाबाजी, हमें भी बता दीजिए ! बाबाजी…नहीं वत्स….. राज का मजा राज रहने में ही है । कुछ घंटों की बात है… फिर जिस नाम पर मोहर लगेगी, वही बताएगा कि राजनीतिक बाजी किस दिशा में चली !बाबाजी ने पान का बीड़ा मुंह में दबाया… काला चश्मा ठीक किया… और मुस्कुराते हुए बोले…“वत्सss… राजनीति में आखिरी गेंद तक मैच बाकी रहता है !”
ॐ नमो नारायण।