विवाह कोई सौदा नहीं, दो परिवारों और दो आत्माओं का पवित्र मिलन है
दहेज की मांग से टूट रहे परिवार, कर्ज और मानसिक पीड़ा झेलने को मजबूर माता-पिता
युवाओं को आगे आकर लेना होगा संकल्प, न दहेज लेंगे और न दहेज देंगे
भीलवाड़ा@स्मार्ट हलचल।भारतीय समाज में विवाह को सबसे पवित्र संस्कार माना गया है, लेकिन समय के साथ इस पवित्र बंधन पर दहेज जैसी कुप्रथा का ऐसा ग्रहण लगा है, जिसने न केवल रिश्तों की गरिमा को ठेस पहुंचाई है, बल्कि हजारों परिवारों को आर्थिक, सामाजिक और मानसिक रूप से कमजोर भी किया है। आधुनिक शिक्षा और कानूनी सख्ती के बावजूद दहेज की प्रवृत्ति पूरी तरह समाप्त नहीं हो सकी है। आज भी कई परिवार अपनी बेटियों के विवाह के लिए वर्षों तक धन जुटाने, कर्ज लेने और अपनी संपत्ति बेचने तक को मजबूर हैं।
सामाजिक चिंतकों का मानना है कि दहेज कोई सम्मान नहीं, बल्कि समाज की वह कुरीति है जो रिश्तों की पवित्रता को कलंकित करती है। दहेज को लेकर प्रचलित एक विचार आज भी समाज की सच्चाई को उजागर करता है कि “दहेज सामाजिक ऐसी कुरूप्रथा की भीख है, जिसे लेने वाला सिर उठाकर सम्मान से लेता है और देने वाला अपनी लाचारी, मजबूरी व बेबसी छुपाकर दर्द के साथ देता है।” यह कथन उन लाखों परिवारों की पीड़ा को दर्शाता है, जो सामाजिक दबाव और परंपराओं के नाम पर आर्थिक बोझ उठाने के लिए विवश हो जाते हैं।
बेटी को लक्ष्मी मानने वाला समाज क्यों मांगता है दहेज?
भारतीय संस्कृति में बेटी को लक्ष्मी, शक्ति और परिवार की शान माना जाता है। जन्म से लेकर विवाह तक माता-पिता उसे अच्छे संस्कार, शिक्षा और जीवन के मूल्य प्रदान करते हैं। इसके बावजूद विवाह के समय दहेज की मांग बेटी और उसके परिवार के सम्मान पर सीधा आघात करती है। सवाल यह है कि जब बेटी स्वयं एक परिवार की सबसे बड़ी पूंजी है, तो उसके साथ धन और संपत्ति की मांग क्यों जोड़ी जाती है?
विशेषज्ञों का कहना है कि दहेज की मानसिकता समाज में महिलाओं के प्रति असमान दृष्टिकोण को बढ़ावा देती है। यह सोच बेटियों को बोझ और बेटों को आर्थिक लाभ का माध्यम मानने जैसी विकृत मानसिकता को जन्म देती है, जो किसी भी सभ्य समाज के लिए घातक है।
दहेज ने बढ़ाई आर्थिक और मानसिक परेशानियां
ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में दहेज की समस्या गंभीर रूप धारण कर चुकी है। मध्यम और गरीब वर्ग के परिवार अपनी बेटियों के विवाह के लिए जीवनभर की जमा पूंजी खर्च कर देते हैं। कई परिवार कर्ज के बोझ तले दब जाते हैं, जिसकी भरपाई उन्हें वर्षों तक करनी पड़ती है। आर्थिक संकट के साथ-साथ मानसिक तनाव, सामाजिक अपमान और पारिवारिक तनाव भी बढ़ता है।
कई मामलों में दहेज की मांग पूरी नहीं होने पर विवाह टूट जाते हैं या विवाह के बाद उत्पीड़न की घटनाएं सामने आती हैं। यह स्थिति केवल एक परिवार की नहीं, बल्कि पूरे समाज की संवेदनशीलता और नैतिक मूल्यों पर प्रश्नचिह्न लगाती है।
शिक्षा और जागरूकता से बदलेगी तस्वीर
सामाजिक संगठनों और शिक्षाविदों का मानना है कि दहेज उन्मूलन के लिए केवल कानून पर्याप्त नहीं है। इसके लिए सामाजिक जागरूकता और मानसिकता में बदलाव आवश्यक है। युवाओं को स्वयं आगे आकर बिना दहेज विवाह करने का संकल्प लेना होगा। माता-पिता को भी अपनी बेटियों को आत्मनिर्भर और शिक्षित बनाने पर जोर देना चाहिए, ताकि समाज में उनकी पहचान दहेज से नहीं, बल्कि उनकी योग्यता और व्यक्तित्व से हो।
सम्मान कमाया जाता है, खरीदा नहीं जाता
समाज की वास्तविक उन्नति तब होगी जब बेटियों का मूल्य दहेज से नहीं, बल्कि उनके संस्कार, शिक्षा, प्रतिभा और व्यक्तित्व से आंका जाएगा। दहेज लेने वाला कभी सम्मान का अधिकारी नहीं हो सकता, क्योंकि सम्मान कमाया जाता है, खरीदा नहीं जाता। विवाह यदि प्रेम, विश्वास और समानता के आधार पर हो, तभी वह सफल और सुखद बन सकता है।
संकल्प लेने का समय
समाज के प्रत्येक वर्ग को अब यह संकल्प लेना होगा कि न तो दहेज लिया जाएगा और न ही दिया जाएगा। दहेज मांगने वालों को सामाजिक प्रतिष्ठा देने के बजाय उनका विरोध किया जाएगा। यही एक शिक्षित, जागरूक और समानतामूलक समाज की पहचान होगी।
दहेज मुक्त समाज केवल एक सपना नहीं, बल्कि सामूहिक इच्छा शक्ति और सामाजिक जागरूकता से प्राप्त किया जा सकने वाला लक्ष्य है। जब समाज बेटियों को सम्मान और समान अवसर देगा, तभी वास्तविक अर्थों में विकास और सामाजिक न्याय की स्थापना हो सकेगी।
