फॉर्म 7 के पीछे मक़सद वोट चोरी ; आरएसएस-भाजपा मास्टरमाइंड

(तथ्यान्वेषी रिपोर्ट: के. नीला कलबुर्गी, अनुवाद : संजय पराते)

स्मार्ट हलचल|भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) के एक प्रतिनिधिमंडल ने 1 अक्टूबर, 2026 को बीदर ज़िले के भालकी तहसील के एनकूर गांव का दौरा किया और मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के तहत फॉर्म 7 पर आपत्तियां जमा करने से जुड़े घटनाक्रमों का गहराई से अध्ययन किया। प्रतिनिधिमंडल में सीपीआई(एम) की राज्य सचिवमंडल की सदस्य के. नीला और पार्टी की बीदर जिला संगठन समिति के सदस्य शशिकांत डांगे, प्रभु संतोषकर और गौसोद्दीन शामिल थे। प्रतिनिधिमंडल के दौरे से कई बातें सामने आईं हैं।

*एनकूर : सांप्रदायिक सद्भाव के लिए मशहूर गांव*

एनकूर गांव में करीब 2,300 मतदाता हैं, जिनमें से करीब 725 मुस्लिम मतदाता हैं। यह गांव ऐतिहासिक रूप से सांप्रदायिक सद्भाव के लिए जाना जाता है। चाहे मुहर्रम हो या दूसरे समुदायों के त्योहार, लोग पारंपरिक रूप से आपसी सद्भाव के माहौल में उन्हें मनाते आए हैं। गांव के सभी मुस्लिम लोग अच्छी कन्नड़ बोलते हैं। एनकूर के लोग गर्व से कहते हैं कि रजाकार आंदोलन के समय भी गांव में एक भी बुरी घटना नहीं हुई।

सीपीआई(एम) प्रतिनिधिमंडल ने फॉर्म 7 पर आपत्तियां जमा करने के पीछे के कारणों का अध्ययन करने के लिए इस गांव का दौरा किया। दौरे के दौरान, लगभग सभी समुदायों के लोगों ने प्रतिनिधिमंडल से बातचीत की और अपने विचार साझा किए।

प्रतिनिधिमंडल को मिली जानकारी के अनुसार, खास तौर पर मुस्लिम समुदाय के मतदाताओं के खिलाफ नाम हटाने के लिए फॉर्म 7 में कुल 266 आवेदन जमा किए गए थे। इन सभी आवेदनों को तीन लोगों ने ही जमा किया था।

एनकूर में दो पोलिंग बूथ — बूथ नंबर 251 और 252 — हैं।दोनों बूथों के बूथ लेवल ऑफिसर (बीएलओ) को फॉर्म 7 पर आपत्तियां दी गईं, और मांग की गई कि उन्हें 22 सितंबर, 2026 को अपलोड किया जाए। कथित तौर पर दबाव के कारण, बूथ नंबर 252 से 65 आवदेन और बूथ नंबर 251 से दो आवेदन अपलोड किए गए। प्रतिनिधिमंडल को पता चला कि बाकी 198 आवेदनों को भी अपलोड करने के लिए भाजपा नेताओं का दबाव था। बूथ नंबर 251 के मामले में, सिर्फ़ दो आवेदन ही अपलोड किए जा सके, क्योंकि बीएलओ के परिवार का एक सदस्य बीमार पड़ गया था।

*आवेदन वापस करने की मांग*

जैसे ही फार्म 7 के कथित गलत इस्तेमाल की खबर सामने आई, तीनों शिकायत करने वालों — नागनाथ, गुरैया और गौसुद्दीन — ने 24 सितंबर को तहसील चुनाव अधिकारी को एक पत्र दिया, जिसमें कहा गया था कि वे अपनी शिकायतें वापस लेना चाहते हैं। उन्होंने कहा कि वे फॉर्म 7 को ठीक तरीके से नहीं समझ पाए थे, प्रक्रिया को लेकर भ्रमित थे और अपने आवेदन के समर्थन में उनके पास कोई दस्तावेज नहीं थे।

सीपीआई(एम) प्रतिनिधिमंडल के अनुसार, इस मुद्दे पर गांव वालों ने शिकायतकर्ताओं के साथ बहस की। उन्होंने आरोप लगाया है कि जब यह पूरा मामला उजागर हुआ, तब तहसील चुनाव अधिकारी ने दोनों पक्षों के बीच अंदरूनी समझौता करवा दिया और मामले को खत्म कर दिया।

कर्नाटक के मुख्यमंत्री द्वारा 1 अक्टूबर को चुनाव आयोग कार्यालय पर पांच घंटे तक विरोध प्रदर्शन करने के बाद ही भालकी तहसील के कुल 32 शिकायतकर्ताओं के खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई हैं।

सीपीआई(एम) प्रतिनिधिमंडल ने पाया कि फॉर्म 7 घोषणा भरकर भाजपा कार्यालय से शिकायतकर्ताओं को दिए गए थे, और फिर उन्हें इन फॉर्मों को बीएलओ के पास जमा करने के लिए कहा गया था। शिकायतकर्ताओं ने फॉर्म 7 में दिए गए स्व-घोषणा पर ध्यान नहीं दिया।

फॉर्म 7 के गलत इस्तेमाल के साथ-साथ, ज़रूरी समर्थित दस्तावेज़ दिए बिना मुस्लिम समुदाय के लोगों को निशाना बनाकर आपत्तियां जमा करना एक बड़ा मुद्दा बन गया है। झूठे शिकायतकर्ताओं के खिलाफ जैसे-जैसे कार्यवाही की मांग तेज हुई, शिकायतकर्ताओं ने लिखित रूप से, अपने आवेदन वापस लेने की मांग की, क्योंकि उन्हें कानूनी नतीजों का सामना करने में डर लग रहा था।

सीपीआई(एम) ने कहा है कि इस घटना क्रम से यह गंभीर सवाल खड़ा होता है कि क्या ज़मीनी स्तर पर पहले से ही कोई योजना बनाई गई थी कि किसके वोट हटाए जाएं और किनके जरिए आपत्ति दर्ज कराई जानी चाहिए।

*पूर्व योजना को अमल में लाने का आरोप*

प्रतिनिधिमंडल ने पाया है कि फॉर्म 7 में दिए गए स्व-घोषणा की गंभीरता के बारे में या तो शिकायतकर्ताओं को बताया नहीं गया या जानबूझकर उसे नज़रअंदाज़ किया गया, और इस योजना में शामिल लोगों को यह यकीन था कि वे कानूनी नतीजों से बच सकते हैं। एनकूर में फार्म 7 के आवदेन में जिन मुस्लिम मतदाताओं के नामों पर आपत्तियां की गई थीं, उनके पास अपनी पात्रता साबित करने वाले सभी ज़रूरी दस्तावेज़ थे। इसके बावजूद, उनके नामों पर आपत्तियां दर्ज की गई थीं। इन नामों को हटाने के लिए प्रशासनिक मशीनरी के अंदर के लोगों का इस्तेमाल करने की संभावना से भी इंकार नहीं किया जा सकता। कुल मिलाकर, यह घटनाक्रम मुस्लिम मतदाताओं को निशाना बनाने और उनके नाम मतदाता सूचियों से हटाने के साफ इरादे को दिखाता है।

*दूसरे गांवों में भी फॉर्म 7 के आवेदन*

एनकूर अकेला ऐसा गांव नहीं है, जहां कथित तौर पर ऐसी घटना हुई है। उसी भालकी तहसील के नित्तूर बी गांव में चार पोलिंग बूथ हैं, और कथित तौर पर 400 से ज़्यादा मतदाताओं के नाम हटाने के लिए फॉर्म 7 भरकर आपत्तियां दर्ज की गई हैं। खटक चिंचोली, उचा, हुपला, लखन गांव, मेटिमेलकुंडा, नवदगी, डावरगांव और भालकी शहर के पांच पोलिंग बूथों पर भी फॉर्म 7 पर आपत्तियां जमा की गई हैं। पार्टी को मिली जानकारी के अनुसार, भालकी विधानसभा क्षेत्र में फॉर्म 7 के कुल 3,079 आवेदन जमा किए गए हैं।

*पूरे कर्नाटक में फॉर्म 7 का खेल*

आंकड़ों के अनुसार, कर्नाटक के बीदर जिले के भालकी तहसील में फॉर्म 7 के जरिए सबसे ज़्यादा 3,079 आवेदन दाखिल किए गए हैं। बबलेश्वर में लगभग 1,647 आवेदन फॉर्म 7 के साथ दाखिल किए गए हैं और यह दूसरे स्थान पर है। इस तरह, 224 विधानसभा सीटों में से, भालकी और बबलेश्वर में दर्ज की गई आपत्तियां, पूरे राज्य में दर्ज आपत्तियों का लगभग छठा हिस्सा है। दोनों सीटों पर कुल मिलाकर 4,726 आपत्तियां दर्ज की गई हैं, जो कर्नाटक में दर्ज कुल आपत्तियों का 16.1 प्रतिशत है। पूरे कर्नाटक में भालकी और बबलेश्वर ही दो ऐसी सीटें हैं, जहां नाम हटाने के लिए आए आवेदन, नए मतदाताओं के पंजीयन के लिए आए आवेदनों से ज़्यादा हैं।

जिन दूसरी सीटों पर फॉर्म 7 आवेदनों की संख्या ज़्यादा है, उनमें मेलुकोटे में 648, शिकारीपुरा में 617, हनूर में 545, रामनगर में 503, शिवमोग्गा में 485, बल्लारी सिटी में 423, हदगली में 417 और मदिकेरी में 406 आवेदन शामिल हैं।

*अंतिम समय में आपत्तियों की बाढ़*

सीपीआई(एम) ने पाया है कि अगस्त और सितंबर के ज़्यादातर समय में आपत्तियां जमा करने की रफ़्तार बहुत धीमी थी। भालकी में, 21 सितंबर तक फ़ॉर्म 7 पर सिर्फ 7 आपत्तियां दर्ज की गई थीं। लेकिन, 22 और 23 सितंबर को आपत्तियों की संख्या में तेज़ी से बढ़ोतरी हुई। 23 सितंबर को सबसे ज़्यादा 4,781 आवेदन जमा किए गए। जिस तरह से अंतिम समय में इतनी बड़ी संख्या में आवेदन जमा किए गए, उससे गंभीर शक और चिंता पैदा होती है। यह कोई सामान्य या आकस्मिक प्रक्रिया नहीं लगती और इसलिए इसकी गंभीर जांच की ज़रूरत है।

आखिरी दिन आपत्तियों को जमा करने के अलावा, आवेदन अपलोड करने के लिए बहुत ज़्यादा दबाव था, और यह दबाव कथित तौर पर भाजपा नेताओं की ओर से था। पूरे राज्य में दाख़िल किए गए कुल आपत्तियों का लगभग दसवां हिस्सा सिर्फ़ 14 लोगों ने जमा किया था। इससे यह शक होता है कि यह काम पूर्व योजना के तहत किया गया था। ये आपत्तियां स्वाभाविक नहीं थी। अंतिम दिन कुछ लोगों द्वारा बिना किसी समर्थित दस्तावेज़ के जमा की गई आपत्तियों की बाढ़, विस्तृत जांच और सही कार्यवाही की मांग करती है।

*फॉर्म 7 बांटने में भाजपा का हाथ*

एक फोन पर हुई बातचीत से पता चलता है कि मडिकेरी में भाजपा कार्यकर्ताओं ने कथित तौर पर माना है कि फॉर्म 7 के आवेदन भाजपा कार्यालय से दिए गए थे। इस बातचीत को एक मीडिया संगठन ने पहले ही सोशल मीडिया पर जारी कर दिया था। यह बातचीत इस आरोप का समर्थन करने वाला सबूत देती है कि यह काम पूर्व योजना के तहत किया गया था।

कर्नाटक के अलग-अलग हिस्सों में बिना किसी समर्थित दस्तावेज़ के मुस्लिम समुदाय के लोगों को निशाना बनाने वाली आपत्तियां दर्ज करने के पीछे के मकसद की पहचान करना ज़रूरी है। फॉर्म 7 जमा करने के पीछे का मकसद सिर्फ मतदाताओं को उनके वोट देने के अधिकार से वंचित करना भर नहीं है। मतदाता सूची से मुस्लिम मतदाताओं के नाम हटाने की मांग करके, उन लोगों के बीच सांप्रदायिक भावनाओं को और मज़बूत करने की कोशिश की जा रही है, जो पहले से ही धार्मिक आधार पर एकजुट हो चुके हैं, जिससे सांप्रदायिक ध्रुवीकरण और तेज़ हो जाएगा।

*भालकी को क्यों निशाना बनाया गया है?*

यह महाराष्ट्र की सीमा से कर्नाटक के कल्याण इलाके में सांप्रदायिक-राजनीतिक आधार को बढ़ाने की एक कथित रणनीति है। पार्टी का कहना है कि सांप्रदायिक सद्भाव के लिए मशहूर गांवों में फूट डालने से भाजपा के पक्ष में अच्छा चुनावी माहौल बन सकता है। मुस्लिम मतदाताओं को हटाना उनकी इसी कोशिश का हिस्सा है।

बीदर जिले में सूफी और संतों की एक मजबूत परंपरा है, और दस्तरख्वान से जुड़ी संस्कृति और इलाके की मिली-जुली परंपराएं इसके सामाजिक ताने-बाने में गहराई से जुड़ी हुई हैं। आरएसएस इस परंपरा को ध्वस्त करना चाहता है और इसीलिए उसने बीदर जिले को निशाना बनाया है।

आरएसएस ने बासववादी आवास स्थलों के आस-पास हिंदू सम्मेलनों के ज़रिए बासवकल्याण की ओर अपनी पैठ बनानी शुरू कर दी है, और अब मतदाताओं के चुनाव-अधिकारों मे दखलंदाजी करके भालकी में सांप्रदायिक तनाव भड़काने की कोशिश की जा रही है। आरएसएस अलग-अलग तरीकों से सांप्रदायिक विचारों को फैलाने और सांप्रदायिक ध्रुवीकरण करने की कोशिश कर रहा है। उसके अनुयायियों का एक समूह पहले ही इसी तरह से लामबंद हो चुका है और अब उन्हें और ज़्यादा उन्मादी बनाने की कोशिश की जा रही है। इसके लिए, उनके अपने गांवों में मतदाता सूची से मुस्लिम मतदाताओं के नाम हटाने या हटाने में मदद करने की कोशिश की जा रही है।

जनता दल (एस) ने भाजपा की कथित रणनीति पर सवाल उठाने के बजाय, चुप रहकर यह दिखा दिया है कि वह भी इस प्रक्रिया में भागीदार है।

*लोगों की प्रतिक्रिया : “हम साथ रहते हैं”*

लेकिन एनकूर और दूसरे गांवों के आम लोगों की प्रतिक्रिया आरएसएस की उम्मीद के बहुत विपरित है। गांव वालों ने पार्टी प्रतिनिधिमंडल से कहा, “हम साथ रहते हैं। हम सब एक ही गांव के लोग हैं। हम अलग कैसे हो सकते हैं?” इसके बाद उन्होंने एक-दूसरे का हाथ पकड़कर एक साथ ऊपर उठाया।प्रतिनिधिमंडल के सामने ही गैर-मुस्लिम ग्रामीणों ने खुद उन लोगों की कड़ी आलोचना की, जिन्होंने मुस्लिम मतदाताओं के नाम हटाने की शिकायत की थी। कुछ गांव वालों ने इन शब्दों में चुनौती दी, “देखते हैं, वे उन्हें कैसे हटाते हैं।”

प्रतिनिधिमंडल ने उस जगह का भी दौरा किया, जहाँ लोग ग्रामीण रोज़गार गारंटी प्रोग्राम के तहत काम कर रहे थे। अलग-अलग समुदायों के लोग एक नहर से गाद निकालने के काम में एक साथ लगे हुए थे। उन्होंने प्रतिनिधिमंडल को अपनी आर्थिक मुश्किलों के बारे में बताया और 200 दिनों के रोज़गार, अधिक मजदूरी और गुजारे के लिए ज्यादा मदद की मांग की।

*सीपीआई(एम) की मांगें*

सीपीआई(एम) की निम्न मांगों को आम जनता का व्यापक समर्थन मिला है :

1. जिन लोगों ने बिना किसी समर्थित दस्तावेजों के फार्म 7 पर आपत्तियां जमा की हैं, उनके खिलाफ कानूनी कार्यवाही की जानी चाहिए। उन्हें गिरफ्तार किया जाना चाहिए। चुनाव आयोग को उन लोगों की भी पहचान करनी चाहिए, जिन्होंने कथित तौर पर इस कवायद की योजना बनाई, फॉर्म 7 के आवेदन बांटे और लोगों को आपत्तियां दाखिल करने के लिए कहा। ऐसे लोगों के खिलाफ आपराधिक मामले दर्ज करके उन्हें गिरफ्तार किया जाना चाहिए।

2. एसआईआर की प्रक्रिया को तुरंत खत्म किया जाना चाहिए।

3. ज्ञानेश कुमार को कथित तौर पर दी जा रही कानूनी सुरक्षा वापस ली जानी चाहिए, और उन्हें उनके पद से हटाया जाना चाहिए। उनके खिलाफ देशद्रोह का केस दर्ज किया जाए और उन्हें जेल भेजा जाए।

4. जिन मतदाताओं के नाम सूची से हटा दिए गए हैं, उन्हें मतदाता सूची में वापस जोड़ा जाना चाहिए।