कोटा।स्मार्ट हलचल|विशिष्ट रामकथाकार, अनुष्ठान–विशेषज्ञ, धर्म–चक्रवर्ती एवं ध्यानदिवाकर मुनिप्रवर श्री जयकीर्ति जी गुरुदेव के श्रीमुख से प्रवाहित जैन–रामायण कथा के नवम दिवस में भोगों से निवृत्ति और शाश्वत सुख की प्रवृत्ति हेतु उत्तम धर्म को जीवन का सार बताते हुए गुरुदेव ने कहा कि श्रेष्ठ कथा का श्रवण मनुष्य को जो आंतरिक सुख प्रदान करता है, वही आत्म–प्रयोजन तथा पुण्योपार्जन का वास्तविक कारण है। पीयूष बज एवं अनिमेष जैन ने बताया कि भक्ति भव से लोग पाण्डल में श्रीराम के जयकारे लगाते रहे। कथास्थल पर शिक्षाविद गोविंद माहेश्वरी ने रामकथा का श्रवण किया और प्रशंसा की। महेश गंगवाल गुलाबबाड़ी ने बताया कि राजकुमार,राजेन्द्र पापड़ीवाल, भागचंद लुहाड़िया, पारस पोरवाल, विनोद बज,सन्मति पाटनी,योगेश मित्तल,पंडित जगदीश जैन,ललित लुहाड़िया,चेतन प्रकाश जैन, हेमन्त निखी॔ आदि उपस्थित हुए चिन्मय जैन, देहरादून के पोमिल जैन आदि समाज श्रेष्ठी उपस्थित हुए ।
गुरुदेव ने श्रीराम के चरित्र को मोक्षपदरूपी मंदिर तक पहुँचने वाली सीढ़ी बताते हुए कहा कि इस चरित्र का स्थिरचित्त होकर श्रवण करना परम मंगलकारी है। कथा में कृतान्तवक्र सेनापति का प्रसंग वर्णित करते हुए बताया कि परतंत्र जीवन व्यक्ति को अन्यायपूर्ण आज्ञाओं का पालन करने को विवश कर देता है। अयोध्या पहुँचकर सेनापति जब वन की भयावहता और सीता-विरह का संदेश सुनाता है, तो राम अत्यंत व्यथित हो जाते हैं और लक्ष्मण धर्मयुक्त वचनों से उन्हें सांत्वना देते हैं।
गुरुदेव ने कहा कि संसार में सुख–दुःख किसी निमित्त से स्वयमेव ही प्राप्त होते हैं; प्राणी आकाश, वन और पर्वत—हर स्थान पर अपने पुण्य से ही रक्षित रहता है। उधर सचेत हुई सीता अपने दुःख का कारण पूर्वकृत अपराधों में तलाशती है।
इसी दौरान पुण्डरिकपुर के राजा वज्रजंघ सीता के विलाप से करुणित होकर उन्हें धर्म–बहन स्वीकार कर अपने साथ ले जाते हैं। श्रावण शुक्ला पूर्णिमा को सीता लवणांकुश एवं मदनांकुश दो तेजस्वी पुत्रों को जन्म देती हैं। विद्याध्ययन के समय महाविद्याधारी क्षुल्लक श्री सिद्धार्थ उनके गुरु रूप में उपस्थित होते हैं और शीघ्र ही दोनों बालकों को शस्त्र–शास्त्र में निपुण बना देते हैं।
नारदजी से पितृत्व का परिचय प्राप्त कर लव–कुश अन्याय के प्रतिकार हेतु राम–लक्ष्मण से युद्ध के लिए प्रवृत्त होते हैं। उनके अप्रतिम वीर्य एवं युद्धकौशल से राम भी आश्चर्यचकित हो उठते हैं। तत्पश्चात पिता–पुत्र का भावपूर्ण मिलन और अयोध्या में प्रवेश होता है। प्रजा के समक्ष अपनी निर्दोषता प्रमाणित करने हेतु राम द्वारा आग्रह किए जाने पर सीता अग्निपरीक्षा के लिए तत्पर होती हैं और कहती हैं—“यदि मैंने राम के अतिरिक्त किसी अन्य पुरुष का स्वप्न में भी चिंतन किया हो, तो यह अग्नि मुझे जला दे।” देवगणों द्वारा सीता की रक्षा के साथ ही सर्वत्र हर्षोल्लास व्याप्त होता है। पश्चाताप से दग्ध राम सीता से क्षमा याचना करते हैं। अंत में संसार–भोगों से विरक्त सीता, आर्यिका रूप में दीक्षा ग्रहण कर आध्यात्मिक उत्कर्ष प्राप्त करती हैं।


