चंदेरिया में 250 हेक्टेयर हरित क्षेत्र का दावा, लेकिन पर्यावरण को लेकर उठते सवाल भी नजरअंदाज नहीं
हिंदुस्तान जिंक-एएफआरआई एमओयू के बीच उर्वरक परियोजना की पर्यावरणीय प्रक्रिया और पुराने सवाल फिर चर्चा में
चित्तौड़गढ़, स्मार्ट हलचल। चंदेरिया स्मेल्टिंग कॉम्प्लेक्स में 250 हेक्टेयर क्षेत्र में हरित क्षेत्र विकसित करने के लिए हिंदुस्तान जिंक और अरिड फॉरेस्ट रिसर्च इंस्टीट्यूट (AFRI) के बीच तीन वर्षीय समझौता हुआ है। कंपनी इसे जैव विविधता संरक्षण और पर्यावरणीय पुनर्स्थापना की दिशा में बड़ा कदम बता रही है। हालांकि, इस घोषणा के साथ चंदेरिया औद्योगिक क्षेत्र में पर्यावरणीय प्रभाव, औद्योगिक गतिविधियों के विस्तार और प्रस्तावित उर्वरक परियोजना को लेकर उठे पुराने सवाल भी एक बार फिर चर्चा में हैं।
कंपनी के अनुसार प्रस्तावित परियोजना में स्थानीय प्रजातियों के पौधे, झाड़ियां, घास और अन्य वनस्पतियां विकसित की जाएंगी। मिट्टी एवं जल अध्ययन, पौधों की प्रजातियों का चयन, निगरानी तथा दीर्घकालीन रखरखाव के लिए एएफआरआई तकनीकी सहयोग देगा। कंपनी का दावा है कि यह पहल उसके ‘नो नेट लॉस ऑफ बायोडायवर्सिटी’ लक्ष्य को आगे बढ़ाएगी।
लेकिन बड़ा सवाल यह है कि औद्योगिक परिसर में हरियाली बढ़ाने की योजनाओं के साथ आसपास के क्षेत्र में औद्योगिक गतिविधियों के विस्तार के पर्यावरणीय प्रभाव का आकलन कितनी पारदर्शिता से हो रहा है।
औद्योगिक अपशिष्ट वाली जमीन पर हरित क्षेत्र का दावा
कंपनी पहले भी बता चुकी है कि चंदेरिया में औद्योगिक अपशिष्ट से प्रभावित जमीन के एक हिस्से को हरित क्षेत्र में बदला गया है। हिंदुस्तान जिंक के 2025 के दस्तावेजों के अनुसार चंदेरिया में जारोफिक्स यार्ड के 13 हेक्टेयर क्षेत्र को हरित क्षेत्र में बदलने का दावा किया गया था। कंपनी के 2024-25 के पर्यावरणीय दस्तावेज में चंदेरिया परिसर और नई अधिग्रहीत जमीन में 37 प्रतिशत से अधिक ग्रीन कवर होने का दावा भी किया गया है।
सवाल यहीं से शुरू होता है कि औद्योगिक गतिविधियों से प्रभावित भूमि पर बाद में पौधारोपण और पुनर्स्थापना को क्या पूरे पर्यावरणीय प्रभाव का विकल्प माना जा सकता है? विशेषज्ञ स्तर पर पर्यावरणीय पुनर्स्थापना और प्रदूषण नियंत्रण अलग-अलग विषय हैं। इसलिए केवल पौधारोपण के आंकड़ों से किसी औद्योगिक परियोजना के पर्यावरणीय प्रभाव का पूरा आकलन नहीं किया जा सकता।
उर्वरक परियोजना को लेकर पहले उठ चुके हैं गंभीर सवाल
चंदेरिया में प्रस्तावित उर्वरक परियोजना इस बहस को और महत्वपूर्ण बनाती है। उपलब्ध पर्यावरणीय रिकॉर्ड के अनुसार हिंदुस्तान जिंक की चंदेरिया क्षेत्र में उर्वरक परियोजना को लेकर पहले से पर्यावरणीय स्वीकृति प्रक्रिया चलती रही है। आधिकारिक रिकॉर्ड में परियोजना को अमोनियम फॉस्फेट फर्टिलाइजर कॉम्प्लेक्स के रूप में दर्ज किया गया है।
सितंबर 2025 में परियोजना से जुड़े पर्यावरणीय मंजूरी संशोधन प्रस्ताव पर विशेषज्ञ मूल्यांकन समिति (EAC) के स्तर पर आपत्तियां सामने आई थीं। उपलब्ध रिकॉर्ड के अनुसार परियोजना की साइट में बदलाव, परियोजना के वर्गीकरण, पर्यावरणीय बेसलाइन डेटा और आवेदन प्रक्रिया सहित कई बिंदुओं पर सवाल उठाए गए तथा सार्वजनिक स्तर से भी कई आपत्तियां प्राप्त होने का उल्लेख किया गया।
इसका अर्थ यह नहीं है कि उर्वरक परियोजना स्थायी रूप से समाप्त हो गई है। बल्कि उपलब्ध रिकॉर्ड से इतना स्पष्ट है कि परियोजना की पर्यावरणीय प्रक्रिया में सवाल और आपत्तियां सामने आ चुकी हैं और आगे की स्थिति संबंधित स्वीकृतियों एवं प्रक्रिया पर निर्भर है।
2026 में परियोजना को लेकर हुई सार्वजनिक सुनवाई
मार्च 2026 में चंदेरिया में प्रस्तावित उर्वरक संयंत्र को लेकर राजस्थान राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की ओर से सार्वजनिक सुनवाई आयोजित होने की रिपोर्ट भी सामने आई। इसमें स्थानीय ग्रामीणों एवं अन्य लोगों से परियोजना को लेकर सुझाव और आपत्तियां दर्ज की गईं। कंपनी की ओर से परियोजना की क्षमता और संभावित लाभों के बारे में जानकारी दी गई।
यानी एक ओर कंपनी चंदेरिया में बड़े स्तर पर हरित क्षेत्र और जैव विविधता संरक्षण की तस्वीर पेश कर रही है, वहीं दूसरी ओर उसी औद्योगिक क्षेत्र में नए बड़े औद्योगिक प्रोजेक्ट को लेकर पर्यावरणीय प्रक्रिया और स्थानीय स्तर की चिंताएं भी सामने आती रही हैं।
हरियाली के आंकड़ों से आगे जमीनी निगरानी जरूरी
पर्यावरण विशेषज्ञों और स्थानीय लोगों के लिए असली सवाल सिर्फ यह नहीं है कि कितने पौधे लगाए गए या कितने हेक्टेयर में हरित क्षेत्र विकसित किया गया। महत्वपूर्ण यह भी है कि पौधों के जीवित रहने की दर कितनी है, मिट्टी और भूजल की वास्तविक स्थिति क्या है, हवा की गुणवत्ता पर औद्योगिक गतिविधियों का क्या प्रभाव है और औद्योगिक विस्तार के साथ इन सभी मानकों की स्वतंत्र निगरानी किस स्तर पर हो रही है।
हिंदुस्तान जिंक ने चंदेरिया में पर्यावरणीय सुधार और जैव विविधता संरक्षण के लिए कई योजनाओं का दावा किया है। वहीं कंपनी के अपने पर्यावरणीय रिकॉर्ड में भी पुराने औद्योगिक अपशिष्ट क्षेत्रों के पुनर्स्थापना कार्य का उल्लेख मिलता है।
ऐसे में एएफआरआई के साथ नया समझौता निश्चित रूप से एक सकारात्मक पहल हो सकता है, लेकिन इसकी वास्तविक सफलता का आकलन पौधारोपण की घोषणा से नहीं बल्कि स्वतंत्र निगरानी, पौधों की दीर्घकालीन जीवितता, जैव विविधता में वास्तविक सुधार और आसपास के पर्यावरणीय मानकों में दिखाई देने वाले बदलाव से होना चाहिए।
चंदेरिया में अब सवाल सिर्फ ‘कितने पेड़ लगाए जाएंगे’ का नहीं, बल्कि ‘औद्योगिक विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच वास्तविक संतुलन कितना कायम होता है’ का है। आने वाले समय में उर्वरक परियोजना सहित अन्य औद्योगिक गतिविधियों की पर्यावरणीय स्वीकृतियां और उनकी शर्तों का पालन इस दावे की वास्तविक परीक्षा होगी।
