संक्रमण से जूझ रही ब्यावर निवासी मरीज को मिली नई जिंदगी, जयपुर-अजमेर में भी इलाज से इनकार के बाद कोटा के चिकित्सकों ने किया चमत्कार
राहुल पारीक
कोटा। स्मार्ट हलचल|राजस्थान के सरकारी चिकित्सा इतिहास में एक नया अध्याय जुड़ गया है,जो जयपुर,अजमेर के चिकित्सालय में संभव नहीं हो पाया वह कोटा के सुपर स्पेशलिटी हॉस्पिटल मिसाल पेश करते हुए प्रदेश के किसी सरकारी चिकित्सा संस्थान में पहली बार अत्याधुनिक लीडलेस पेसमेकर का सफलतापूर्वक प्रत्यारोपण किया गया। यह उपलब्धि उस महिला मरीज के लिए वरदान साबित हुई जिसे गंभीर संक्रमण के चलते जयपुर और अजमेर तक के चिकित्सकों ने पेसमेकर लगाने से मना कर दिया था। उल्लेखनीय है कि निजी अस्पतालों में इस प्रक्रिया की लागत 12 से 15 लाख रुपये तक होती है, किंतु RGHS योजना के अंतर्गत विशेष अनुमति प्राप्त कर यह जटिल उपचार पूर्णतः निःशुल्क संपन्न किया गया।
एक माह से बिस्तर पर थी मरीज, चलना-फिरना हो गया था बंद
ब्यावर निवासी शांति गर्ग को लगभग दो माह पूर्व जयपुर में पारंपरिक पेसमेकर लगाया गया था। परंतु प्रत्यारोपण स्थल पर गंभीर संक्रमण हो जाने के कारण एक माह पहले उसे निकालना अनिवार्य हो गया और अस्थायी पेसमेकर के सहारे जीवन चलाना पड़ा। संक्रमण इस सीमा तक बढ़ चुका था कि लगातार मवाद निकल रही थी और प्लास्टिक सर्जरी तथा गहन एंटीबायोटिक उपचार भी बेअसर साबित हो रहे थे। ऐसी विकट परिस्थिति में पुनः पारंपरिक पेसमेकर लगाना पूर्णतः असंभव था।
पिछले एक माह से शांति गर्ग अस्थायी पेसमेकर के सहारे बिस्तर पर थीं। उठना-बैठना, चलना-फिरना सब थम गया था और दैनिक दिनचर्या की क्रियाएं भी शय्या पर ही संपन्न करनी पड़ रही थीं। जब जयपुर और अजमेर के चिकित्सकों ने भी आगे उपचार करने में असमर्थता जता दी, तब परिजनों ने कोटा सुपर स्पेशलिटी हॉस्पिटल का रुख किया।
जांघ की शिरा से हृदय तक पहुंचाया उपकरण, नहीं लगाया सीने पर चीरा
हृदय रोग विशेषज्ञ डॉ. भंवर रणवाँ के कुशल नेतृत्व में चिकित्सकों की टीम ने लीडलेस पेसमेकर तकनीक का चयन किया। इस अत्याधुनिक प्रक्रिया में सीने पर कोई चीरा लगाने की आवश्यकता नहीं होती। जांघ की शिरा के माध्यम से कैथ लैब तकनीक द्वारा लघु उपकरण को सीधे हृदय की मांसपेशियों में स्थापित कर दिया जाता है। इस तकनीक में न तार होते हैं, न बाहरी बैटरी और न ही त्वचा के नीचे कोई उपकरण — जिससे संक्रमण का जोखिम लगभग नगण्य हो जाता है।
ऑपरेशन पूर्णतः सफल रहा और अगले ही दिन शांति गर्ग अपने पैरों पर खड़ी होकर चलने में सक्षम हो गईं। उन्हें शीघ्र ही अस्पताल से छुट्टी दे दी गई।
संभागीय आयुक्त की विशेष अनुमति से मिला निःशुल्क उपचार
इस उपचार को RGHS योजना के तहत संभव बनाने में संभागीय आयुक्त अनिल अग्रवाल की महत्त्वपूर्ण भूमिका रही। उन्होंने RMRS से पुनर्भुगतान की शर्त पर इस अत्यंत महंगी प्रक्रिया की विशेष स्वीकृति प्रदान की, जिससे आर्थिक रूप से असमर्थ परिवार को करोड़ों की कीमत वाला उपचार बिना एक पैसे के मिल सका।
पारंपरिक और लीडलेस पेसमेकर में क्या है अंतर?
पारंपरिक पेसमेकर में बैटरी और तार त्वचा के नीचे प्रत्यारोपित किए जाते हैं, जिससे संक्रमण और तकनीकी खराबी की आशंका बनी रहती है। इसके विपरीत लीडलेस पेसमेकर एक छोटे कैप्सूल के आकार का उपकरण है, जो सीधे हृदय की दीवार में स्थापित होता है। इसमें न बाहरी तार होते हैं और न कोई त्वचा के नीचे का उपकरण। यह तकनीक विशेष रूप से उन रोगियों के लिए जीवनरक्षक है जिनके पारंपरिक पेसमेकर में बार-बार संक्रमण होता हो।
पेसमेकर की आवश्यकता कब? जब हृदय की धड़कन 40 प्रति मिनट से कम हो जाती है, तो रोगी को चक्कर, कमजोरी और बार-बार बेहोशी आने लगती है। पेसमेकर हृदय को विद्युत संकेत देकर धड़कन को सामान्य बनाए रखता है। यह ‘हार्ट ब्लॉक’ की स्थिति है, जो हार्ट अटैक से सर्वथा भिन्न रोग है।
चिकित्सकों की टीम को श्रेय
इस ऐतिहासिक सफलता के पीछे डॉ. भंवर रणवाँ के निर्देशन में डॉ. संदीप सेठी और डॉ. यशवंत शर्मा की विशेषज्ञ टीम की अथक मेहनत रही। कैथ लैब प्रभारी मदन मोहन गुप्ता के साथ तकनीशियन एवं स्टाफ दीपक, गोविंद राठौड़, महेन्द्र शर्मा और सुनील बैस ने भी इस प्रक्रिया को सफलतापूर्वक अंजाम देने में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया।
