कागजों की पड़ताल या जमीनी सच की तलाश , हाईकोर्ट के आदेश के बाद जांच की निष्पक्षता पर भी उठे सवाल
✍🏻 पुनित चपलोत
मांडल /स्मार्ट हलचल|मांडल ग्राम पंचायत में निःशुल्क एवं रियायती दर पर आवासीय पट्टों के वितरण का विवाद अब महज प्रशासनिक जांच का मामला नहीं रह गया है। पट्टों की वैधता, पात्रता और प्रक्रिया को लेकर उठे सवालों के बीच मामला अब प्रशासनिक कार्रवाई, सियासी आरोप-प्रत्यारोप और न्यायिक दखल तक पहुंच चुका है।
मांडल की चौपालों से लेकर राजनीतिक गलियारों तक चर्चा का बाजार गर्म है—आखिर पट्टा प्रकरण में कागजों की जांच हुई है या जमीनी हकीकत की भी पड़ताल की गई। , जांच रिपोर्ट में अनियमितताओं का उल्लेख है, जबकि संबंधित पक्ष जांच की निष्पक्षता और उसके आधार पर हुई कार्रवाई पर सवाल खड़े कर रहे हैं।
जांच रिपोर्ट में पांच प्रमुख अनियमितताओं का उल्लेख
जिला परिषद प्रशासन की शिकायत के आधार पर गठित जांच समिति ने अपनी रिपोर्ट में पट्टा वितरण प्रक्रिया से जुड़ी पांच प्रमुख कमियां गिनाईं। रिपोर्ट के अनुसार—
सक्षम स्तर से नक्शा अनुमोदित नहीं था।
नक्शे का व्यापक प्रचार-प्रसार नहीं किया गया।
मौके पर नियमानुसार पत्थरगढ़ी नहीं मिली।
सड़क सीमा से निर्धारित दूरी संबंधी प्रावधानों की पालना नहीं मिली।
निःशुल्क एवं रियायती पट्टों में पात्रता संबंधी प्रमाण-पत्र संलग्न नहीं पाए गए।
जांच समिति ने इन बिंदुओं को राजस्थान पंचायतीराज नियम, 1996 की पालना से जोड़ते हुए अपनी रिपोर्ट जिला परिषद प्रशासन को सौंपी।
जांच रिपोर्ट में निरीक्षण के दौरान कुछ लाभार्थियों के पट्टा प्रकरणों में विधवा, दिव्यांग, परित्यक्ता अथवा अन्य पात्रता से जुड़े दस्तावेज उपलब्ध नहीं होने का भी उल्लेख किया गया। समिति ने इसे नियमों की पालना में कमी मानते हुए रिपोर्ट प्रस्तुत की।
*रिपोर्ट के बाद कार्रवाई और मुकदमा*
जांच रिपोर्ट के आधार पर पंचायतीराज विभाग ने तत्कालीन ग्राम सरपंच, ग्राम विकास अधिकारी तथा चयन समिति के तीन सदस्यों के विरुद्ध कार्रवाई के आदेश जारी किए। साथ ही संबंधित थाने में मुकदमा दर्ज कराया गया।
यहीं से यह मामला प्रशासनिक फाइलों से निकलकर राजनीतिक बहस के केंद्र में आ गया।
*“1992 से 2020 तक जिस प्रक्रिया से पट्टे दिए गए, उसी प्रक्रिया को अपनाया”*
*पूर्व सरपंच संजय भांडिया का जांच रिपोर्ट पर पलटवार*
मामले में निवर्तमान सरपंच संजय भांडिया ने जांच रिपोर्ट को एकतरफा बताते हुए उसकी निष्पक्षता पर गंभीर सवाल उठाए हैं। उनका दावा है कि जांच एजेंसी ने वास्तविक परिस्थितियों और पट्टा वितरण की पूरी प्रक्रिया को नजरअंदाज करते हुए अधूरी एवं त्रुटिपूर्ण रिपोर्ट तैयार की।
भांडिया के अनुसार राजस्थान सरकार के पंडित दीनदयाल उपाध्याय अन्त्योदय संबल पखवाड़ा अभियान के तहत 24 जून 2025 से 9 जुलाई 2025 तक आयोजित शिविरों में तत्कालीन उपखंड अधिकारी, प्रधान, विकास अधिकारी सहित जनप्रतिनिधियों की मौजूदगी में पात्र परिवारों को पट्टे वितरित किए गए थे।
उनका कहना है कि लाभार्थियों में विधवा, तलाकशुदा, दिव्यांग, बीपीएल परिवार, खाद्य सुरक्षा योजना से जुड़े जरूरतमंद परिवार, अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, विस्थापित परिवार एवं लोक कलाकार सहित विभिन्न पात्र श्रेणियों के लोग शामिल थे।
भांडिया का दावा है कि 1992 से 2020 तक तत्कालीन सरपंचों द्वारा जिस नियमावली और प्रक्रिया के तहत पट्टे जारी किए जाते रहे, उसी प्रक्रिया और प्रोसेसिंग को आधार बनाकर पट्टे बनाए गए।
*“निजी स्वार्थ और राजनीतिक महत्वाकांक्षा के चलते षड्यंत्र” का आरोप*
पूर्व सरपंच ने आरोप लगाया कि कुछ लोगों की निजी स्वार्थपूर्ति नहीं होने, सामाजिक एवं पारिवारिक द्वेष तथा राजनीतिक महत्वाकांक्षा के चलते उनके खिलाफ सुनियोजित तरीके से माहौल बनाया गया और उनकी छवि धूमिल करने का प्रयास किया गया।
हालांकि इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है और मामले में अंतिम निष्कर्ष जांच एवं न्यायिक प्रक्रिया के बाद ही सामने आएगा।
*“क्या जनप्रतिनिधि का रिश्तेदार होना ही अपराध है?”*
वार्ड पंच मुकेश जोशी ने उठाए पात्रता और पारिवारिक संबंधों को लेकर सवाल
पट्टा प्रकरण में वार्ड पंच मुकेश जोशी ने भी अपना पक्ष रखते हुए कहा कि वर्तमान समय में अधिकांश परिवार अलग-अलग रह रहे हैं। ऐसे में केवल किसी वार्ड पंच से पारिवारिक संबंध होने के आधार पर किसी पात्र व्यक्ति को उसके अधिकार से वंचित करना उचित नहीं हो सकता।
उनका कहना है कि ग्राम पंचायत में पट्टा वितरण की प्रक्रिया कई चरणों से गुजरती है और आवश्यक प्रस्ताव एवं प्रक्रिया के बाद ही अंतिम निर्णय लिया जाता है।
*उन्होंने सवाल उठाया*
“आखिर किस वर्तमान कानून में लिखा है कि किसी वार्ड पंच का प्रत्येक रिश्तेदार स्वतः अपात्र हो जाएगा?”
उन्होंने यह भी सवाल किया कि यदि परिवार का कोई सदस्य किसी मामले में दोषी हो , तो क्या उसका प्रभाव पूरे परिवार या रक्त संबंधियों पर स्वतः लागू माना जा सकता है ।
जोशी का तर्क है कि पात्रता का निर्धारण व्यक्ति की वास्तविक स्थिति और लागू नियमों के आधार पर होना चाहिए।
*हाईकोर्ट पहुंचा पट्टा विवाद 17 अगस्त के आदेश में जांच पर रोक नहीं, लेकिन सुनवाई का अधिकार सुरक्षित*
मांडल पट्टा प्रकरण से जुड़ा विवाद अब राजस्थान हाईकोर्ट, जोधपुर तक पहुंच चुका है।
एस.बी. सिविल रिट याचिका संख्या 19715/2026 में याचिकाकर्ताओं नीलू भाट एवं अनुराधा शर्मा की ओर से विकास अधिकारी द्वारा की गई जांच की वैधता को चुनौती दी गई थी। मामले में याचिकाकर्ताओं की ओर से अधिवक्ता यशराज सिंह कनावत ने पक्ष रखा।
माननीय न्यायमूर्ति अनूप कुमार ढंड ने 17 अगस्त 2026 को आदेश पारित करते हुए जांच प्रक्रिया में सीधे हस्तक्षेप करने से इनकार किया।
अदालत ने कहा कि यदि किसी सक्षम प्राधिकारी द्वारा संबंधित कानून के प्रावधानों के तहत जांच की जा रही है तो सामान्यतः ऐसी जांच में न्यायालय हस्तक्षेप नहीं करेगा।
*कोर्ट का अहम निर्देश—प्रतिकूल आदेश से पहले सुनवाई जरूरी*
हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि जांच के आधार पर किसी व्यक्ति के विरुद्ध कोई प्रतिकूल आदेश पारित किया जाता है, तो संबंधित व्यक्ति जांच पूरी होने के बाद उस आदेश को उचित विधिक मंच के समक्ष चुनौती देने के लिए स्वतंत्र रहेगा।
साथ ही संबंधित प्राधिकारी से अपेक्षा की गई कि याचिकाकर्ता के विरुद्ध कोई भी प्रतिकूल आदेश पारित करने से पहले उसे उचित सुनवाई का अवसर यानी Due Opportunity of Hearing दिया जाए।
*आदेश का सीधा मतलब यह है कि*
हाईकोर्ट के 17 अगस्त 2026 के आदेश का सीधा अर्थ यह नहीं है कि जांच को रद्द कर दिया गया है अथवा उस पर रोक लगा दी गई है।
अदालत ने फिलहाल जांच प्रक्रिया में हस्तक्षेप नहीं किया है। *लेकिन यदि जांच के बाद किसी व्यक्ति के विरुद्ध प्रतिकूल कार्रवाई होती है तो उसे अपना पक्ष रखने और उचित कानूनी मंच पर उस कार्रवाई को चुनौती देने का अधिकार रहेगा।*
*अब सबसे बड़ा सवाल—कागज भारी या जमीन की हकीकत*
मांडल का पट्टा प्रकरण अब सिर्फ “पट्टा सही या गलत” की बहस तक सीमित नहीं रह गया है। मामला अब तीन मोर्चों पर खड़ा दिखाई दे रहा है—जांच रिपोर्ट, संबंधित पक्षों के पलटवार और न्यायिक प्रक्रिया।
एक तरफ जांच समिति ने नियमों की कथित अनदेखी के बिंदु गिनाए हैं, तो दूसरी ओर संबंधित पक्षों का दावा है कि पूर्व वर्षों की प्रक्रिया को ही आगे बढ़ाया गया और जांच में पूरे तथ्यों को नहीं देखा गया।
*यही वह बिंदु है जहां सबसे बड़ा सवाल खड़ा होता है*
क्या जांच सिर्फ फाइलों में दर्ज कागजों तक सीमित रही, या मौके की वास्तविक स्थिति, पूर्व वर्षों की पट्टा प्रक्रिया और सभी संबंधित दस्तावेजों की भी समान रूप से पड़ताल हुई ।
और दूसरा सवाल—
क्या 1992 से 2020 तक अपनाई गई पट्टा प्रक्रिया और वर्ष 2025 में अपनाई गई प्रक्रिया का तुलनात्मक परीक्षण भी जांच का हिस्सा बना?
इन सवालों का अंतिम जवाब फिलहाल जांच और उपलब्ध दस्तावेजों से ही सामने आएगा।
*सियासी शतरंज में कौन मोहरा, कौन खिलाड़ी*
मांडल में यह विवाद अब प्रशासनिक फाइल से निकलकर सियासी शतरंज की बिसात तक पहुंच चुका है। आरोपों के बीच राजनीतिक षड्यंत्र के दावे भी सामने आ रहे हैं, लेकिन इन दावों की पुष्टि जांच या न्यायिक निष्कर्ष के बिना नहीं की जा सकती।
फिलहाल हाईकोर्ट ने जांच का रास्ता खुला रखा है, लेकिन सुनवाई के अधिकार की ढाल भी सामने रख दी है।
*अब निगाहें जांच की अगली कार्रवाई पर टिकी हैं।*
क्योंकि मांडल के इस पट्टा प्रकरण में असली सवाल सिर्फ यह नहीं कि पट्टा किसका सही है और किसका गलत—बल्कि सवाल यह भी है कि जांच कितनी निष्पक्ष, कितनी व्यापक और कितनी जमीनी रही ।
जवाब 1992 से लेकर 2020 तक की जांच की अगली कड़ी देगी… और शायद उसी जवाब से तय होगा कि मांडल का पट्टा विवाद महज प्रशासनिक चूक की कहानी है या इसके पीछे सियासत की कोई दूसरी पटकथा भी लिखी जा रही थी।
