मांडलगढ़ निकाय चुनाव: मुद्दों पर भारी पड़ती सियासी खींचतान

स्मार्ट हलचल|एंकर मांडलगढ़ चुनावी समर है और राजनीति का शोर चारों ओर सुनाई दे रहा है। लेकिन इस शोर के बीच जो सबसे ज्यादा अनसुना नजर आ रहा है, वह है—जनता के असल मुद्दे। निकाय चुनाव में राजनीतिक दल और प्रत्याशी अपने-अपने समीकरणों के साथ मैदान में हैं, लेकिन मतदाता के सामने सवाल अब भी वही हैं—शहर का विकास, साफ-सफाई, सड़कें, पानी, नालियां, यातायात और मूलभूत सुविधाएं।
मांडलगढ़ निकाय चुनाव में भाजपा और कांग्रेस के प्रत्याशियों के साथ निर्दलीय उम्मीदवार भी पूरी ताकत के साथ चुनाव मैदान में डटे हुए हैं। इस चुनाव की सबसे दिलचस्प तस्वीर यह है कि राजनीतिक दलों के अधिकृत प्रत्याशियों के अलावा बगावत और स्थानीय राजनीतिक नाराजगी भी चुनावी समीकरणों को प्रभावित करती दिखाई दे रही है।
राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि भाजपा के एक नेता के साथ राजनीतिक मनमुटाव के चलते उनके स्तर पर करीब 16 प्रत्याशी ‘व्यवस्था परिवर्तन’ के नारे के साथ चुनाव मैदान में उतरे हैं। इन प्रत्याशियों की मौजूदगी ने भाजपा के सामने नई चुनौती खड़ी कर दी है। कई वार्डों में बागी अथवा निर्दलीय प्रत्याशी भाजपा के वोट बैंक में सेंधमारी कर सकते हैं। यही वजह है कि भाजपा के कई दिग्गज नेताओं का सियासी पारा कभी ऊपर तो कभी नीचे होता दिखाई दे रहा है।
दूसरी ओर, विधायक गोपाल खंडेलवाल भाजपा प्रत्याशियों के पक्ष में लगातार डोर-टू-डोर संपर्क करते नजर आ रहे हैं। विकास के मुद्दे को सामने रखते हुए वे मतदाताओं से सीधे संवाद कर पार्टी प्रत्याशियों के पक्ष में माहौल बनाने का प्रयास कर रहे हैं। अब देखना यह होगा कि विधायक की यह सक्रियता पार्टी को कितना लाभ पहुंचा पाती है और बागी प्रत्याशियों से होने वाले संभावित नुकसान की कितनी भरपाई हो पाती है।
वहीं कांग्रेस की बात करें तो पूर्व में निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में प्रधान रह चुके पूर्व प्रधान जितेंद्र मूंदड़ा ने इस बार कांग्रेस की चुनावी कमान संभाल रखी है। कांग्रेस भी अपने प्रत्याशियों के जरिए मुकाबले को मजबूती देने की कोशिश में है। हालांकि निकाय चुनाव में कांग्रेस के कई स्थानीय नेताओं की सक्रिय भूमिका फिलहाल उतनी प्रभावी नजर नहीं आ रही, जितनी एक मजबूत चुनावी मुकाबले में अपेक्षित होती है।
अब सवाल सिर्फ यह नहीं है कि किस पार्टी के कितने प्रत्याशी जीतते हैं। असली सवाल यह है कि मांडलगढ़ की जनता किसे अपना भरोसा सौंपती है और किसके हाथ में शहर के विकास की कमान देती है।
चुनावी नारों, राजनीतिक मनमुटाव, बगावत और सियासी रणनीतियों के बीच जनता के मुद्दे कहीं पीछे नहीं छूटने चाहिए। आखिर निकाय चुनाव का उद्देश्य सत्ता की कुर्सी तक पहुंचना भर नहीं, बल्कि शहर की समस्याओं का समाधान और विकास की नई दिशा तय करना भी है।
इस बार मांडलगढ़ का मतदाता राजनीतिक समीकरणों से आगे बढ़कर क्या विकास के मुद्दे पर मतदान करेगा? या फिर बगावत, व्यक्तिगत प्रभाव और स्थानीय राजनीति चुनावी नतीजों की दिशा तय करेगी? इसका जवाब चुनाव परिणाम के साथ सामने आएगा।