मोहरों की बिसात और कर्मठ कार्यकर्ताओं का शहादतनामा

*चित्तौड़गढ़ की राजनीति का खामोश क्रूर सच……..*
*​विशेष राजनीतिक रिपोर्ट # 9 -आकाश शर्मा*
चित्तौड़गढ़ lस्मार्ट हलचल|चित्तौड़गढ़ की माटी में इस समय लोकतंत्र का सबसे जीवंत और उथल-पुथल भरा अध्याय,जिला परिषद और पंचायत समिति चुनावों का तीसरा व चौथा चरण अपने चरम पर है। हर तरफ चुनावी शोर, सभाओं की गड़गड़ाहट और जीत के दावे हैं। दोनों ही प्रमुख दल अपनी पूरी ताकत झोंककर मतदाताओं को रिझाने में जुटे हैं। लेकिन इन चमकती हुई चुनावी सुर्खियों के पीछे एक ऐसी काली और खौफनाक परिपाटी जन्म ले चुकी है, जो आने वाले समय में जिले की राजनीति को अंदर से खोखला कर रही है। यह महज चुनाव नहीं, बल्कि उन कर्मठ कार्यकर्ताओं और उदीयमान नेताओं के राजनीतिक भविष्य का सुनियोजित कत्लेआम है, जिन्हें भविष्य की बड़ी लड़ाइयों से पहले ही शातिराना पैंतरों में उलझाकर नेस्तनाबूद किया जा रहा है।
*​कांग्रेस की प्रयोगशाला और भाजपा का अनुकरण*
​कहने को तो चित्तौड़गढ़ जिलें की पांचों विधानसभाओं में कांग्रेस व भाजपा के शीर्ष नेताओं ने अपनी सियासी जमीन और वर्चस्व को सुरक्षित रखने के लिए अनगिनत उन कार्यकर्ताओं और नेताओं का कद जमने से पहले ही कुचल डाला, जिनमें संगठन को बदलने का माद्दा था । चुनावी दौर में भले ही फोटो उन सब के साझा किये जा रहे हो लेकिन आज जिले की गलियों में ऐसे अनगिनत उदाहरण बिखरे पड़े हैं, जहां महत्वाकांक्षी नेताओं को आपसी कलह और चक्रव्यूह में उलझाकर हमेशा के लिए हाशिये पर धकेल दिया गया । ​विडंबना यह है कि मुख्य दल भारतीय जनता पार्टी भी अब इसी राह पर पूरी रफ़्तार से आगे बढ़ रही है। पिछले विधानसभा चुनावों के बाद से, जिले की राजनीति में भाजपा ने भी उन्हीं पुराने और कुटिल पैंतरों का आँख मूंदकर अनुसरण करना शुरू कर दिया है। निकाय चुनावों से लेकर पंचायती राज के रण तक, कई उभरते नेताओं को कोने में लगा दिया गया, तो कई को चुनावी मैदान में ‘बलि का बकरा’ बनाकर उनकी राजनीतिक बलि दे दी गई। पंचायत चुनावों के नाम पर अभी कई और चेहरों की बलि चढ़ना बाकी है, जिसकी आहट पंचायत समिति स्तर पर साफ सुनाई दे रही है । ​यह सब भले ही सियासी गलियारों के ‘सूत्रों’ के हवाले से चर्चा में हो, लेकिन इसकी सच्चाई जमीन पर लहूलुहान हो रहे कार्यकर्ताओं की आंखों में साफ पढ़ी जा सकती है।
*​2028 के रण की पटकथा और मैदान खाली करने की सियासत*
​यह कड़वा सच है कि कांग्रेस और भाजपा, दोनों ही दल आने वाले 2028 के विधानसभा चुनावों में अपने एकाधिकार और वर्चस्व को सुनिश्चित करने के लिए अभी से ‘राजनीतिक बलियों’ की पटकथा लिख चुके हैं। उस क्रूर पटकथा का अनुसरण भी तेजी से शुरू हो चुका है। दोनों ही दल सोची-समझी रणनीति के तहत मैदान को उन तमाम मजबूत और स्वतंत्र सोच वाले इमानदार चेहरों से खाली करवा रहे हैं, जो कल को शीर्ष नेतृत्व के लिए चुनौती बन सकते थे। यह केवल चुनाव जीतने की कवायद नहीं, बल्कि भविष्य के हर संभावित विकल्प को जड़ से उखाड़ फेंकने का एक गंदा खेल है।
*​निष्ठा और मजबूरी के बीच का दमघोंटू घुटन*
​इस पूरी बिसात पर सबसे ज्यादा दर्दनाक स्थिति उस साधारण, कर्मठ और समर्पित कार्यकर्ता की है, जो दोनों ही दलों की रीढ़ माना जाता है । ​एक तरफ वह कार्यकर्ता है जो अपनी वैचारिक निष्ठा और पार्टी के प्रति अटूट प्रेम के कारण पसीना बहाता है, और दूसरी तरफ वही कार्यकर्ता सिस्टम की इस क्रूर चक्की में पिसकर खुद को ठगा हुआ महसूस करता है । ​उसकी ईमानदारी को उसकी कमजोरी मान लिया गया है। चुनाव आते ही उसे नारों और भीड़ का हिस्सा बना लिया जाता है, और चुनाव बीतते ही उसे उपेक्षा के अंधेरे में धकेल दिया जाता है । ​आज कार्यकर्ता की यह मजबूरी और भीतर सुलगती पीड़ा साफ झलकती है,वह पार्टी के लिए जान लड़ाने को तैयार है, लेकिन उसे यह भी अहसास हो चुका है कि उसके पसीने की बूंदों का इस्तेमाल केवल बड़े नेताओं की ताजपोशी और उसके अपने ही भविष्य के कत्ल के लिए किया जा रहा है ।
*लोकतंत्र या मोहरों का खेल ?*
​चित्तौड़गढ़ जिलें की पांचों विधानसभाओं की यह राजनीतिक हवा अब चेता रही है। यदि दलों के भीतर यह आत्मघाती और तानाशाही परिपाटी नहीं रुकी, तो आने वाले समय में यहां सिर्फ चाटुकारिता बचेगी और जनता के असली मुद्दों की आवाज दबा दी जाएगी। राजनीति जनता और कार्यकर्ताओं के दम पर चलती है, मोहरों और बलियों के बूते नहीं। समय आ गया है कि कार्यकर्ता इस सुनियोजित छलावे को पहचानें, अन्यथा 2028 का राजनीतिक मैदान जीवंत इंसानों का नहीं, बल्कि सिर्फ और सिर्फ खंडहरों का मैदान बनकर रह जाएगा ।
*एक सवाल*
क्या आपको लगता है कि चित्तौड़गढ़ के इन स्थानीय चुनावों में युवा और जमीनी कार्यकर्ता इस दलीय चक्रव्यूह को तोड़ने के लिए कोई नया विकल्प तलाश पाएंगे या वे इसी व्यवस्था का हिस्सा बनकर रह जाएंगे ?