टिकट की सियासत उफान पर, दावेदारों ने पहले ही बता दिया-‘हम तैयार हैं!’
बूथ खामोश, दावेदार मुखर, शाहपुरा में चुनाव से पहले ही भाजपा-कांग्रेस की परीक्षा शुरू!
शाहपुरा। मूलचन्द पेसवानी
स्मार्ट हलचल|नगर पालिका शाहपुरा के चुनाव की तारीख जैसे-जैसे नजदीक आ रही है, शहर की सियासत का पारा चढ़ता जा रहा है। 11 सितम्बर को होने वाले नगर पालिका चुनाव में 35 वार्डों के लिए 23,152 मतदाता अपने पार्षद चुनेंगे। इनमें 11,738 महिला और 11,414 पुरुष मतदाता हैं। यानी इस चुनाव में महिला मतदाताओं की संख्या पुरुषों से 324 अधिक है। आंकड़े साफ संकेत दे रहे हैं कि इस बार शाहपुरा की नगर सरकार बनाने में आधी आबादी की भूमिका भी निर्णायक रहने वाली है।
मतदाता वर्ग की उम्र का गणित भी राजनीतिक दलों के लिए खासा महत्वपूर्ण है। चुनाव आयोग के प्रारंभिक आंकड़ों के अनुसार 18 से 25 वर्ष आयुवर्ग के मतदाता 14.7 प्रतिशत, 26 से 35 वर्ष के 25.4 प्रतिशत, 36 से 50 वर्ष के 29 प्रतिशत, 51 से 59 वर्ष के 13.9 प्रतिशत तथा 60 वर्ष से अधिक आयु के मतदाता 17 प्रतिशत हैं। यानी करीब आधे से अधिक मतदाता युवा और मध्यम आयु वर्ग में हैं। ऐसे में इस बार चुनावी मुद्दों में विकास, रोजगार, सड़क, सफाई, पेयजल और शहर की बुनियादी सुविधाओं के साथ सोशल मीडिया और युवा मतदाताओं की पसंद भी राजनीतिक दलों की रणनीति को प्रभावित करेगी।
जिला बना तो बढ़ी कुर्सी, जिला गया तो फिर पालिका–
शाहपुरा की नगर पालिका का राजनीतिक सफर भी इस चुनाव को सामान्य निकाय चुनाव से अलग बनाता है। पूर्व में यहां भाजपा का बोर्ड रहा और रघुनंदन सोनी अध्यक्ष रहे। शाहपुरा को जिला बनाया गया तो नगर पालिका को नगर परिषद में क्रमोन्नत कर दिया गया और अध्यक्ष का पद सभापति में बदल गया। लेकिन करीब 17 माह बाद जिला समाप्त होने के साथ ही नगर परिषद फिर नगर पालिका में बदल गई।
इसी राजनीतिक घटनाक्रम के बीच पिछले नगर पालिका चुनाव के बाद विधानसभा चुनाव हुआ और लालाराम बैरवा भाजपा के विधायक निर्वाचित हुए। नगर पालिका बोर्ड के अंतिम कार्यकाल में अध्यक्ष और विधायक के बीच राजनीतिक संवाद की कमी से बनी दूरियां चर्चा का विषय रही थीं। स्थानीय राजनीतिक हलकों में माना जाता है कि उस समय पैदा हुई दूरी पूरी तरह खत्म नहीं हुई है। ऐसे में इस बार नगर पालिका चुनाव केवल बोर्ड बनाने का मुकाबला नहीं, बल्कि स्थानीय भाजपा की अंदरूनी राजनीतिक तस्वीर का भी इम्तिहान माना जा रहा है।
भाजपा ने संभाली कमान, लेकिन टिकट के भीतर ही असली मुकाबला–
विधायक लालाराम बैरवा की अगुवाई में भाजपा चुनावी मैदान में उतर चुकी है और तैयारियों के मामले में फिलहाल विपक्ष से आगे दिखाई दे रही है। संगठन ने दावेदारों से आवेदन मांगे हैं और वार्डवार समीकरणों पर काम शुरू हो गया है। लेकिन भाजपा के भीतर भी टिकट की दौड़ आसान नहीं है। कई वार्डों में एक से अधिक दावेदार सामने आने के कारण गुटीय समीकरणों की चर्चा शुरू हो गई है।
इस बार अध्यक्ष पद सामान्य वर्ग के लिए होने से सामान्य वर्ग के दावेदारों का उत्साह खासा बढ़ा हुआ है। कई चेहरे पहले ही अपने-अपने वार्डों में सक्रिय हो गए हैं। सोशल मीडिया पर बधाई संदेश, जनसंपर्क, समर्थकों की बैठकें और राजनीतिक गतिविधियां बढ़ने लगी हैं। प्रत्याशियों की आधिकारिक घोषणा के बाद ही यह स्पष्ट होगा कि संगठन ने किसके जनाधार, छवि और जीत की संभावना पर भरोसा जताया है।
कांग्रेस ने भी बिछाई बिसात, मगर कई खेमों की अपनी-अपनी चाल–
भाजपा के मुकाबले कांग्रेस की गतिविधियां देर से तेज हुईं, लेकिन अब पार्टी भी चुनावी मोड में आती दिखाई दे रही है। विधानसभा चुनाव में कांग्रेस प्रत्याशी रहे नरेंद्र कुमार रेगर और नवनियुक्त नगर अध्यक्ष रमेश सेन की अगुवाई में बैठकें हुई हैं और दावेदारों से आवेदन भी लिए गए हैं।
यह खेमा पूर्व मंत्री और कांग्रेस देहात जिला अध्यक्ष रामलाल जाट के समर्थक खेमे के रूप में देखा जा रहा है। रामलाल जाट शाहपुरा आकर बैठक भी कर चुके हैं। दूसरी ओर पूर्व मंत्री धीरज गुर्जर समर्थक खेमे की अलग राजनीतिक सक्रियता भी चर्चा में है। इसके अलावा अध्यक्ष पद सामान्य होने के कारण कांग्रेस में सामान्य वर्ग से जुड़े दावेदारों का एक नया राजनीतिक समूह भी सक्रिय होता दिखाई दे रहा है।
यानी कांग्रेस के सामने भाजपा से मुकाबले के साथ-साथ पहले अपने भीतर तालमेल बैठाने की चुनौती है।
जिला बहाली का मुद्दा भी चुनावी मैदान में–
इस चुनाव में एक महत्वपूर्ण राजनीतिक कोण जिला बहाली का भी रहने वाला है। जिला बहाल करो संघर्ष समिति बैठक कर यह ऐलान कर चुकी है कि वह जिला बनाने की मांग को लेकर चुनाव मैदान में उतरेगी। ऐसे में समिति समर्थित उम्मीदवार कई वार्डों में चुनावी समीकरण प्रभावित कर सकते हैं। वहीं एसडीपीआई ने बैठक के बाद 10 प्रत्याशियों की घोषणा कर दी है। दूसरी तरफ निर्दलीय उम्मीदवार भी अपनी ताकत आजमाने की तैयारी में हैं। ऐसे में यदि प्रमुख दलों के बागी या टिकट से नाराज दावेदार निर्दलीय मैदान में उतरते हैं तो कई वार्डों में मुकाबला त्रिकोणीय या बहुकोणीय हो सकता है।
सबसे बड़ा सवालकृटिकट किसे और टिकट कटने के बाद क्या होगा?
शाहपुरा चुनाव की सबसे दिलचस्प तस्वीर स्वघोषित उम्मीदवारों की है। पार्टियों की आधिकारिक सूची आने से पहले ही कई दावेदारों ने अपने-अपने वार्ड में खुद को प्रत्याशी के रूप में पेश करना शुरू कर दिया है। सोशल मीडिया कैंपेन, बैनर-पोस्टर, जनसंपर्क और समर्थकों की बैठकों के जरिए दावेदार पार्टी नेतृत्व को अपनी ताकत का संदेश देने में जुटे हैं।
राजनीतिक विश्लेषण के लिहाज से यह केवल उत्साह नहीं बल्कि टिकट के लिए दबाव बनाने की रणनीति भी हो सकती है। दावेदार यह संदेश देने की कोशिश कर रहे हैं कि वार्ड में उनका जनाधार मजबूत है और उन्हें नजरअंदाज करना पार्टी के लिए नुकसानदेह साबित हो सकता है। जातीय-सामाजिक समीकरण और स्थानीय प्रभाव का प्रदर्शन भी इसी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है।
लेकिन यही रणनीति पार्टियों के लिए दो धार वाली तलवार भी बन सकती है। टिकट कटने के बाद यही स्वघोषित उम्मीदवार बागी होकर मैदान में उतर गए तो पार्टी के अधिकृत प्रत्याशी की राह मुश्किल हो सकती है। संगठन के तय निर्णय से पहले खुद को प्रत्याशी घोषित करने की प्रवृत्ति समर्पित कार्यकर्ताओं में असंतोष भी पैदा कर सकती है।
बूथ की बैठकें नहीं, तो कार्यकर्ता की नाराजगी कहीं वोट में न बदल जाए!-
इस चुनाव का एक बड़ा राजनीतिक सवाल यह भी है कि चुनाव सिर पर होने के बावजूद अभी तक भाजपा और कांग्रेस ने व्यापक स्तर पर अपनी बूथ इकाइयों की बैठकें शुरू नहीं की हैं। चुनावी राजनीति में बूथ कार्यकर्ता ही पार्टी की असली ताकत होता है। टिकट की दौड़ में बड़े नेताओं और दावेदारों की सक्रियता तो दिखाई दे रही है, लेकिन बूथ स्तर के कार्यकर्ता की राय कितनी सुनी जा रही है, यह बड़ा सवाल है।
कार्यकर्ताओं को नजरअंदाज करने का मलाल कहीं मतदान के दिन नाराजगी में तब्दील न हो जाए, यह दोनों प्रमुख दलों के लिए चिंता का विषय हो सकता है।
बैनर नहीं, काम की कसौटी पर होगा फैसला–
शाहपुरा के मतदाताओं के सामने इस बार मुद्दे भी स्पष्ट हैं। सड़क, सीवरेज, स्ट्रीट लाइट, फेरोब्लॉक, पेयजल, सफाई और शहर के बुनियादी ढांचे से जुड़े सवाल लंबे समय से स्थानीय राजनीति का हिस्सा रहे हैं। मतदाता केवल सोशल मीडिया की चमक या बैनर-पोस्टर से प्रभावित होगा, यह मान लेना राजनीतिक दलों की भूल होगी।
इस चुनाव में दावेदारों की राजनीतिक महत्वाकांक्षा भले ही चरम पर हो, लेकिन अंतिम फैसला जनता की अदालत में ही होगा। पार्टी टिकट पर मुहर संगठन लगाएगा, मगर जीत की मुहर मतदाता लगाएंगे। यही वजह है कि शाहपुरा नगर पालिका चुनाव में फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यह नहीं कि कौन खुद को उम्मीदवार घोषित कर रहा है, बल्कि यह है कि पार्टी किसे टिकट देती है, टिकट कटने के बाद कौन बागी होता है और मतदान के दिन जनता किसके काम, छवि और व्यवहार पर भरोसा जताती है।
35 वार्डों की इस चुनावी शतरंज में पहली चाल दावेदारों ने चल दी है, अब पार्टियों की बारी है, किसे मोहरा बनाया जाता है और किसे बाजीगर, यही शाहपुरा की अगली नगर सरकार की तस्वीर तय करेगा।
