30 साल से एक ही वर्ग के खाते में सीट आने का आरोप; टिकट से पहले ही भाजपा में उठने लगी अंदरूनी हलचल, “जब दूसरे वार्डों में OBC को मौका तो यहां क्यों नहीं?”
भीलवाड़ा |स्मार्ट हलचल|नगर निगम चुनाव की सरगर्मियों के बीच पुर क्षेत्र का वार्ड नंबर 3 टिकट की राजनीति को लेकर चर्चा में आ गया है। नए परिसीमन के बाद बदले वार्ड समीकरणों के बीच स्थानीय स्तर पर OBC मतदाताओं का दावा है कि वार्ड में करीब 80 प्रतिशत मतदाता OBC वर्ग से हैं, इसके बावजूद सीट लगातार सामान्य वर्ग के लिए आने से प्रतिनिधित्व को लेकर सवाल उठ रहे हैं।
स्थानीय दावेदारों और समर्थकों का कहना है कि वार्ड में वर्षों से सामान्य वर्ग के चेहरों को ही राजनीतिक प्राथमिकता मिलती रही है। ऐसे में इस बार टिकट वितरण से पहले ही OBC दावेदारों ने अपनी दावेदारी तेज कर दी है।
“80 प्रतिशत वोट हमारा, टिकट में हिस्सेदारी क्यों नहीं?”
वार्ड में OBC वर्ग से जुड़े लोगों के बीच सबसे बड़ा सवाल यही घूम रहा है—“जब मतदाताओं में हमारी संख्या इतनी अधिक है तो राजनीतिक प्रतिनिधित्व में हमारी हिस्सेदारी क्यों नहीं?”
स्थानीय लोगों के अनुसार नए परिसीमन के बाद वार्ड में करीब 3500 मतदाता रह गए हैं। इनमें OBC मतदाताओं की संख्या करीब 80 प्रतिशत होने का दावा किया जा रहा है, जबकि सामान्य और SC-ST वर्ग के मतदाताओं की संख्या अपेक्षाकृत कम बताई जा रही है।
हालांकि, इन आंकड़ों की आधिकारिक पुष्टि चुनावी मतदाता सूची के आधार पर ही होगी।
30 साल से सामान्य सीट—अब उठने लगे सवाल:-
स्थानीय दावेदारों का कहना है कि वार्ड में पिछले करीब 30 वर्षों से सामान्य वर्ग की सीट आने का सिलसिला बना हुआ है। इस बार भी वार्ड सामान्य घोषित होने के बाद OBC वर्ग के संभावित दावेदारों की नाराजगी सामने आने लगी है।
सियासी सवाल यह है कि “क्या टिकट केवल सीट की श्रेणी देखकर तय होगा या वार्ड के वास्तविक सामाजिक और राजनीतिक समीकरण को भी तवज्जो मिलेगी?”
यही सवाल अब भाजपा के भीतर टिकट की दौड़ को दिलचस्प बना रहा है।
“15 साल से एक ही परिवार का दबदबा क्यों?”
स्थानीय स्तर पर एक और मुद्दा भी जोर पकड़ रहा है। कुछ लोगों का आरोप है कि पिछले करीब 15 वर्षों से एक ही परिवार को लगातार राजनीतिक अवसर मिलता रहा है। इसे लेकर भी वार्ड के एक वर्ग में नाराजगी की चर्चा है।
OBC दावेदारों का कहना है कि यदि इस बार भी पुराने राजनीतिक चेहरे या उसी परिवार को प्राथमिकता दी गई तो “कार्यकर्ताओं की मेहनत और बदलते वार्ड समीकरणों का क्या होगा?”
दूसरे वार्डों का उदाहरण देकर घेरा:-
OBC वर्ग से जुड़े स्थानीय लोगों ने टिकट वितरण में कथित दोहरे मापदंड का सवाल भी उठाया है। उनका तर्क है कि पुर क्षेत्र के कुछ अन्य वार्डों में सामान्य सीट होने के बावजूद OBC वर्ग के प्रत्याशियों को राजनीतिक दलों की ओर से मौका मिलता रहा है।
उनका सवाल है—
“अगर OBC बहुल दूसरे वार्डों में सामान्य सीट पर OBC प्रत्याशी स्वीकार्य है, तो वार्ड नंबर 3 में यही फार्मूला क्यों नहीं?”
यही तुलना अब वार्ड की राजनीति में सबसे बड़ा मुद्दा बनती दिखाई दे रही है।
टिकट से पहले ही बगावत के संकेत?
भाजपा के भीतर टिकट वितरण को लेकर सबसे बड़ी चुनौती सिर्फ उम्मीदवार चुनने की नहीं, बल्कि टिकट से वंचित दावेदारों और उनके समर्थकों को साथ रखने की होगी।
यदि OBC वर्ग के किसी मजबूत दावेदार को टिकट नहीं मिलता है तो उसके बाद उसका रुख क्या होगा, यह चुनावी समीकरणों पर असर डाल सकता है। स्थानीय स्तर पर निर्दलीय विकल्प और बगावत की चर्चाएं भी इसी वजह से जोर पकड़ रही हैं।
राजनीतिक जानकारों के मुताबिक निकाय चुनाव में कुछ वार्डों में जातीय समीकरण के साथ-साथ व्यक्तिगत जनाधार, परिवार की पकड़, संगठन से जुड़ाव और टिकट से उपजा असंतोष जीत-हार में निर्णायक भूमिका निभा सकता है।
“टिकट का फैसला सिर्फ समीकरणों से होगा या जमीनी ताकत से?”
वार्ड नंबर 3 में फिलहाल सबसे बड़ा इंतजार भाजपा के टिकट की घोषणा का है। टिकट किसे मिलता है, इसके साथ ही यह भी साफ होगा कि पार्टी पुराने राजनीतिक समीकरणों पर भरोसा करती है या नए सामाजिक समीकरण को तवज्जो देती है।
एक तरफ वर्षों से स्थापित राजनीतिक दावेदारी है तो दूसरी तरफ OBC वर्ग के दावेदार संख्या के आधार पर प्रतिनिधित्व की मांग कर रहे हैं।
ऐसे में वार्ड नंबर 3 में मुकाबला केवल दो उम्मीदवारों के बीच नहीं, बल्कि “पुराने दबदबे बनाम नए प्रतिनिधित्व” की लड़ाई बनता नजर आ रहा है।
अब असली सवाल यही है—“क्या भाजपा वार्ड के बदलते समीकरणों को पढ़कर टिकट देगी या पुराने राजनीतिक समीकरणों पर ही दांव लगाएगी?”
टिकट की घोषणा के साथ इस सवाल का जवाब भी सामने आ जाएगा और तब तय होगा कि वार्ड नंबर 3 में नाराजगी सिर्फ चर्चाओं तक सीमित रहती है या चुनावी मैदान में इसका सीधा असर दिखाई देता है।
