राजनीति का ‘अदृश्य’ सिपाही… जहाँ पर्चा भले पत्नी का हो, पर मुहर ज़मीन के उस ‘सिपाही’ पर लगती है

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​विशेष राजनीतिक रिपोर्ट # 6 -आकाश शर्मा
चित्तौड़गढ़ lस्मार्ट हलचल|​लोकतंत्र की भट्टी में जब नेताओं की पीढ़ियाँ तपती हैं, तो कुछ नाम इतिहास बन जाते हैं और कुछ नाम महज़ ‘पात्र’। लेकिन इस जिले की राजनीति में एक ऐसा किरदार भी मौजूद है, जिसने अपने जीवन के पच्चीस से अधिक बसंत स्वर्णिम काल किसी लालबत्ती या महलों के सुख में नहीं, बल्कि पार्टी के झंडे को बुलंद करने में खपा दिया। छात्र जीवन से जिस शख्स ने अपने नाम की ऐसी अमिट छाप छोड़ी कि आज भी संगठन से लेकर सरकार तक, उसके नाम के दबदबे के बिना राजनीतिक समीकरण अधूरे माने जाते हैं और विडंबना देखिए कि यह सब उसने बिना कभी कोई चुनाव लड़े हासिल किया ! ​कहते हैं न कि सियासत के दांव-पेंच भले ही कितने ही जटिल हों, लेकिन जनता की अदालत में इंकार और अनदेखी की एक सीमा होती है। आखिरकार, पंचायती राज के इस रण में ऊपर वाले के यहाँ ‘देर’ का ताला खुला, और व्यवस्था को मजबूर होना पड़ा। पार्टी ने उनकी धर्मपत्नी को जिला परिषद के वार्ड नंबर 5 से मैदान में उतार दिया।
चुनावी शतरंज का वह दांव, जिसने जनता को और आक्रामक बना दिया
​लेकिन राजनीति भी अपने ही रंग दिखाती है। जब उस कर्मठ सिपाही की पत्नी को मैदान में उतारा गया, तो पार्टी के भीतर के ‘चाणक्यों’ ने एक और चाल चली,उनके पति को निकाय चुनाव से पूर्व ही दूसरे जिले के चुनावी प्रभार में उलझाकर मैदान से दूर करने की कोशिश कर दी गई, हालाकि यह पार्टी का फैसला हो सकता है लेकिन पटकथा लिखनें वाला कोई और है ? सोचा गया होगा कि सेनापति को दूर कर दो, तो किले की दीवारें कमज़ोर पड़ जाएंगी। ​लेकिन वे भूल गए कि यह रिश्ता टिकट या पद का नहीं, बल्कि पीढ़ियों के विश्वास का है ! ​जब हमारी टीम ने धरातल पर जाकर वार्ड नंबर 5 की एक-एक ईंट और एक-एक चौपाल को टटोला, तो जो सच सामने आया, उसने अच्छे-अच्छों के राजनीतिक गणित को हिला कर रख दिया ।
हमने बहू को नहीं, अपने कलेजे के टुकड़े को मैदान में उतारा है !
​गाँवों की धूल फांकती सड़कों और चौपालों पर जब हमने ग्रामीणों से बात की, तो जनता का गुस्सा, प्रेम और जोश एक साथ फूट पड़ा । वार्ड 5 की आठों पंचायत आवलहेड़ा,बल्दरखा,घोसुण्डी,बस्सी,सोकिया,पालका,सोनगर और नगरी के लगभग 34000 मतदाता ग्रामीणों ने दो टूक शब्दों में कहा,​”हमने अपनी बहू को जिला परिषद चुनाव लड़ने के लिए मैदान में नहीं उतारा है… हम तो उस सिपाही की पत्नि के सिर का ताज पहनाने जा रहे हैं, जिसने हमारे हर सुख-दुख में अपनी जवानी और जीवन खपा दीया है !” ​यह सुनकर हमारी टीम भी हैरान रह गई। एक ऐसा अद्भुत जनसमर्थन, जहाँ जाति, बिरादरी और राजनीतिक समीकरणों की दीवारें ढह चुकी थीं और केवल एक ही गूंज थी,’कर्मठ सिपाही का सम्मान’।
​ जनता के दिल का वह ‘डर’, जो राजनीतिक भूचाल लाने के लिए काफी है
​लेकिन इस अपार प्रेम के बीच, जनता के सीने में एक अजीब सा डर भी पल रहा है। ग्रामीणजन दबी जुबान में एक आशंका जता रहे हैं,कहीं ऐसा तो नहीं कि चुनाव जीतने के बाद, पार्टी का अनुशासन या आलाकमान का दबाव उस कर्मठ कार्यकर्ता सिपाही को इस कदर जकड़ ले कि वह जनता के बीच खुलकर न आ पाए ? कहीं ऊपर वाला या सिस्टम कोई ऐसा पेच न फंसा दे कि पार्टी की बात मानने की मजबूरी में यह ‘जनता का आदमी’ अपनों से ही दूर हो जाए ? ​यही वह कसक है, जो इस चुनाव को महज़ वार्ड नंबर 5 का चुनाव नहीं रहने देती, बल्कि यह वर्तमान राजनीति की व्यवस्था पर एक करारा तमाचा और एक बहुत बड़ा सवालिया निशान है।

अभी मतपेटियों में वोट पड़ना बाकी है, सियासी जाजमों के कई पन्ने पलटना अभी शेष है, और समीकरणों की हवा किस करवट बैठेगी,यह भविष्य के गर्भ में है। लेकिन वार्ड नंबर 5 के मतदाताओं के तेवर ने यह साफ कर दिया है कि जब ज़मीर और ज़मीन का रिश्ता मजबूत हो, तो बड़े-बड़े सियासी दिग्गजों के सिंहासन डगमगा जाते हैं ।​अब देखना यह है कि यह जन-आक्रोश और प्रेम जब वोटों की शक्ल में इवीएम में कैद होकर निकलेगा, तो राजनीति के किन-किन दिग्गजों के होश उड़ेंगे !