(डॉ. शैलेश शुक्ला)
स्मार्ट हलचल|भारत में हर चार महीने में मौसम बदलता है। गर्मी आती है, फिर बारिश और उसके बाद सर्दी। यह कोई नई बात नहीं है। सदियों से लोग मौसम के इन बदलावों के साथ जीवन जीते आए हैं। लेकिन आज सवाल यह है कि विज्ञान और तकनीक के इस दौर में भी हर मौसम जनता के लिए परेशानी और खतरे का कारण क्यों बन जाता है? गर्मी आते ही पानी की कमी, बिजली की परेशानी और स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं बढ़ जाती हैं। बारिश आते ही सड़कों पर पानी भर जाता है, नालियां बंद हो जाती हैं और कई जगह घरों तथा दुकानों में पानी घुस जाता है। सर्दी आते ही गरीब, बेघर और खुले में काम करने वाले लोगों की मुश्किलें बढ़ जाती हैं। सबसे दुखद बात यह है कि इनमें से बहुत-सी परेशानियां अचानक नहीं आतीं। प्रशासन को इनके आने का अनुमान पहले से होता है, फिर भी तैयारी अक्सर समय पर नहीं होती।
मौसम की मार को पूरी तरह रोका नहीं जा सकता। तेज गर्मी, भारी बारिश, शीतलहर या बाढ़ प्रकृति का हिस्सा हैं। लेकिन इनसे होने वाले नुकसान को कम किया जा सकता है। यही प्रशासन की सबसे बड़ी जिम्मेदारी है। यदि किसी क्षेत्र में हर साल गर्मी में पानी की समस्या होती है, तो गर्मी शुरू होने से पहले वहां पानी की व्यवस्था होनी चाहिए। यदि किसी सड़क पर हर वर्ष बारिश में पानी भरता है, तो बारिश से पहले उसकी जल निकासी की समस्या दूर होनी चाहिए। यदि किसी इलाके में सर्दी के दौरान बड़ी संख्या में गरीब और बेघर लोग खुले में रहते हैं, तो ठंड शुरू होने से पहले उनके लिए सुरक्षित स्थान तैयार होने चाहिए। लेकिन अक्सर इसके उलट होता है। समस्या पहले आती है और तैयारी बाद में शुरू होती है।
भारत में मौसम की जानकारी देने वाली संस्थाएं लगातार पूर्वानुमान जारी करती हैं। भारत मौसम विज्ञान विभाग गर्मी, भारी बारिश, शीतलहर और अन्य मौसम संबंधी खतरों की चेतावनी देता है। इसके बावजूद केवल चेतावनी जारी कर देना पर्याप्त नहीं है। चेतावनी का असली महत्व तब है जब प्रशासन उस सूचना के आधार पर समय रहते काम शुरू करे। यदि मौसम विभाग कहता है कि अगले कुछ दिनों में अत्यधिक गर्मी पड़ सकती है, तो उसी समय अस्पतालों, पानी की व्यवस्था और सार्वजनिक स्थानों की तैयारी शुरू हो जानी चाहिए। यदि भारी बारिश का अनुमान है, तो नालियों की सफाई, जल निकासी, पंप और बचाव दल पहले से तैयार होने चाहिए। यदि शीतलहर की संभावना है, तो रैन बसेरों और गरीबों के लिए जरूरी सामान की व्यवस्था पहले से होनी चाहिए।
गर्मी के मौसम को ही लें। गर्मी बढ़ने के बाद प्रशासन अक्सर लोगों से पानी पीने, धूप से बचने और दोपहर में बाहर न निकलने की सलाह देता है। यह सलाह जरूरी है, लेकिन केवल सलाह से समस्या हल नहीं होती। उन लोगों के बारे में भी सोचना होगा जो रोज कमाने के लिए धूप में काम करने को मजबूर हैं। निर्माण मजदूर, सड़क कर्मचारी, रिक्शा चालक, ठेला लगाने वाले, डिलीवरी कर्मचारी और खेतों में काम करने वाले लोगों के लिए घर में रहना संभव नहीं होता। ऐसे लोगों के लिए काम के समय में उचित बदलाव, पीने के पानी, छाया और प्राथमिक स्वास्थ्य सहायता की व्यवस्था पहले से होनी चाहिए।
इसी तरह जिन शहरों और गांवों में गर्मी के दिनों में पानी की कमी होती है, वहां गर्मी शुरू होने के बाद टैंकर भेजना स्थायी समाधान नहीं है। प्रशासन को पहले से पता होता है कि कौन-से इलाके पानी की कमी से प्रभावित होते हैं। वहां वैकल्पिक जल स्रोत, टैंकरों की व्यवस्था और पानी की नियमित आपूर्ति की योजना पहले बनाई जा सकती है। हर वर्ष वही संकट दोहराना और हर वर्ष उसी समय समाधान खोजने की कोशिश करना प्रशासनिक कमजोरी का संकेत है।
सर्दी में भी यही समस्या दिखाई देती है। ठंड बढ़ने के बाद रैन बसेरे खोजने या कंबल बांटने से बेहतर है कि सर्दी शुरू होने से पहले ही तैयारी पूरी कर ली जाए। फुटपाथ पर रहने वाले लोग, मजदूर, रिक्शा चालक, वृद्ध और गरीब परिवार ठंड से सबसे अधिक प्रभावित होते हैं। उनके लिए सुरक्षित और साफ रैन बसेरे, गर्म कपड़े, कंबल और जरूरी स्वास्थ्य सुविधाएं पहले से उपलब्ध होनी चाहिए। केवल रैन बसेरे खोल देना भी पर्याप्त नहीं है। यह भी देखना जरूरी है कि वे वास्तव में लोगों के लिए उपयोगी हैं या नहीं।
बारिश का मौसम प्रशासनिक तैयारी की सबसे बड़ी परीक्षा होता है। हर साल मानसून से पहले नालियों की सफाई की बातें होती हैं। फिर पहली तेज बारिश में कई शहरों की सड़कें पानी में डूब जाती हैं। यातायात रुक जाता है और लोगों को घंटों परेशानी होती है। कई जगह बिजली आपूर्ति बंद हो जाती है। निचले इलाकों में पानी घरों और दुकानों तक पहुंच जाता है।
भारी बारिश को रोका नहीं जा सकता, लेकिन शहर को पानी में डूबने से बचाने के लिए बहुत कुछ किया जा सकता है। नालियों की सफाई समय पर होनी चाहिए। जहां जलभराव की समस्या बार-बार होती है, वहां केवल बारिश के समय पानी निकालने के बजाय स्थायी समाधान खोजा जाना चाहिए। नालियों की क्षमता बढ़ाना, पानी के प्राकृतिक रास्तों को बचाना, जरूरी जगहों पर पंप लगाना और कमजोर सड़कों तथा पुलों की जांच करना बारिश से पहले किया जा सकता है।
यह समझना भी जरूरी है कि हर जलभराव केवल प्रकृति की गलती नहीं है। यदि नाली कूड़े से भरी है, पानी निकलने का रास्ता बंद है या किसी प्राकृतिक जलमार्ग पर गलत निर्माण हो गया है, तो इसके लिए प्रशासनिक व्यवस्था भी जिम्मेदार हो सकती है। यदि किसी एक जगह पर हर वर्ष पानी भरता है, तो उस समस्या को स्थायी रूप से हल करने की कोशिश क्यों नहीं होती? जनता को हर साल उसी सड़क पर पानी में चलने के लिए मजबूर करना किसी भी अच्छे प्रशासन की पहचान नहीं हो सकती।
शहरों के साथ गांवों में भी पहले से तैयारी जरूरी है। ग्रामीण क्षेत्रों में भारी बारिश से सड़क संपर्क टूट सकता है। नदियों और नालों का जलस्तर बढ़ सकता है। बिजली और संचार व्यवस्था प्रभावित हो सकती है। ऐसे क्षेत्रों की पहले से पहचान होनी चाहिए। जरूरत पड़ने पर लोगों को सुरक्षित स्थानों तक पहुंचाने की योजना पहले तैयार होनी चाहिए। स्थानीय प्रशासन और ग्राम पंचायतों को पता होना चाहिए कि संकट के समय किसे क्या करना है।
इस पूरी व्यवस्था में स्थानीय प्रशासन की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण है। मौसम की तैयारी केवल जिला अधिकारी या किसी एक विभाग की जिम्मेदारी नहीं हो सकती। नगर निकाय, स्वास्थ्य विभाग, जल विभाग, बिजली विभाग, लोक निर्माण विभाग, पुलिस, अग्निशमन विभाग और आपदा प्रबंधन से जुड़े अधिकारी मिलकर काम करें। हर विभाग के काम की समय सीमा तय हो और यह भी देखा जाए कि काम वास्तव में हुआ या नहीं।
इसके लिए हर जिले में मौसम शुरू होने से पहले एक सरल तैयारी सूची होनी चाहिए। उसमें यह साफ लिखा हो कि गर्मी से पहले क्या करना है, बारिश से पहले क्या करना है और सर्दी से पहले क्या करना है। अधिकारियों को केवल कागज पर रिपोर्ट देने के बजाय मौके पर जाकर जांच करनी चाहिए। यदि किसी नाले की सफाई की रिपोर्ट है, तो यह भी देखा जाए कि नाला वास्तव में साफ है या नहीं। यदि रैन बसेरा तैयार बताया गया है, तो यह देखा जाए कि वहां पानी, शौचालय, रोशनी और सुरक्षा की व्यवस्था है या नहीं।
तकनीक का उपयोग भी इस काम में किया जा सकता है। मौसम की चेतावनी मोबाइल फोन और अन्य माध्यमों से लोगों तक पहुंचाई जा सकती है। लेकिन संदेश केवल इतना नहीं होना चाहिए कि “भारी बारिश की संभावना है” या “गर्मी बढ़ेगी।” लोगों को यह भी बताया जाना चाहिए कि उन्हें क्या करना है, किस इलाके में जाने से बचना है और जरूरत पड़ने पर सहायता कहां मिलेगी। स्थानीय भाषा में सरल संदेश अधिक प्रभावी होंगे।
जनता की भी कुछ जिम्मेदारी है। लोगों को नालियों में कूड़ा नहीं डालना चाहिए, पानी की बर्बादी रोकनी चाहिए और प्रशासन की चेतावनियों को गंभीरता से लेना चाहिए। लेकिन नागरिकों से जिम्मेदारी की अपेक्षा करने से पहले प्रशासन को अपनी जिम्मेदारी पूरी करनी होगी। जनता हर साल एक ही समस्या का सामना करती रहे और प्रशासन केवल लोगों को सावधानी बरतने की सलाह देता रहे, यह उचित व्यवस्था नहीं है।
मीडिया और नागरिक समाज को भी प्रशासन से सवाल पूछने चाहिए। बारिश के बाद केवल सड़क पर जमा पानी की तस्वीर दिखाना पर्याप्त नहीं है। यह भी पूछा जाना चाहिए कि बारिश से पहले नालियों की सफाई क्यों नहीं हुई? गर्मी के दौरान पानी की कमी वाले इलाके पहले से चिन्हित क्यों नहीं थे? सर्दी आने से पहले रैन बसेरों की तैयारी क्यों नहीं हुई? यदि किसी समस्या की जानकारी पहले से थी, तो उस पर समय रहते कार्रवाई क्यों नहीं हुई?
प्रशासन की सफलता केवल इस बात से नहीं मापी जानी चाहिए कि आपदा आने के बाद उसने कितनी तेजी से राहत पहुंचाई। असली सफलता यह है कि उसने आपदा आने से पहले कितना नुकसान रोक लिया। एक नाला समय पर साफ कर देना, एक कमजोर पुल की समय पर मरम्मत कर देना, एक गरीब परिवार को समय पर सुरक्षित स्थान दे देना या किसी इलाके में पहले से पानी की व्यवस्था कर देना छोटी बातें लग सकती हैं, लेकिन संकट के समय यही छोटे कदम बड़ी समस्या को रोक सकते हैं।
भारत को अब मौसम के साथ चलने वाली प्रशासनिक व्यवस्था की जरूरत है। गर्मी से पहले गर्मी की तैयारी हो, बारिश से पहले बारिश की और सर्दी से पहले सर्दी की। मौसम आने के बाद भाग-दौड़ करने के बजाय कई सप्ताह और कई महीने पहले काम शुरू होना चाहिए। इससे सरकारी धन की भी बचत होगी, जनता की परेशानी भी कम होगी और प्रशासन पर भरोसा भी बढ़ेगा।
प्रकृति को रोका नहीं जा सकता। गर्मी आएगी, बारिश होगी और सर्दी पड़ेगी। लेकिन प्रकृति की मार को प्रशासनिक लापरवाही से और बड़ा बनाना किसी भी स्थिति में उचित नहीं है। यदि खतरे का अनुमान पहले से है, तो तैयारी भी पहले से होनी चाहिए। जनता को हर मौसम में प्रकृति और व्यवस्था,दोनों से लड़ने के लिए अकेला नहीं छोड़ा जा सकता।
अब समय है कि प्रशासन अपनी सोच बदले। आपदा आने के बाद राहत पहुंचाना जरूरी है, लेकिन उससे कहीं अधिक जरूरी है आपदा आने से पहले तैयारी करना। यही जिम्मेदार शासन है, यही सुशासन है और यही जनता के प्रति सच्ची जवाबदेही है।
