शाहपुरा पालिका में सत्ता का ‘खेला’ शुरू, भाजपा का एक खेमा सक्रिय तो कांग्रेस में तीन धड़े आमने-सामने; सामान्य वर्ग की कुर्सी के लिए तीन दावेदारों ने बढ़ाई धड़कनें
शाहपुरा | मूलचन्द पेसवानी
स्मार्ट हलचल|शाहपुरा नगर पालिका के निकाय चुनाव 2026 में अभी मतगणना का परिणाम सामने भी नहीं आया है, लेकिन पालिका की सत्ता की असली बाजी—अध्यक्ष की कुर्सी—को लेकर सियासी शतरंज की बिसात बिछ चुकी है। पार्षदों के चुनाव परिणाम आने से पहले ही राजनीतिक दलों में जोड़-तोड़, संपर्क साधने और अपने-अपने खेमे मजबूत करने का खेल शुरू हो गया है।
शाहपुरा की 35 वार्डों वाली नगर पालिका में इस बार मुकाबला केवल पार्षद बनने तक सीमित नहीं रहने वाला। असली रोमांच तो परिणाम के बाद शुरू होगा, जब यह तय करने की कवायद होगी कि पालिका की चाबी किसके हाथ में जाएगी और अध्यक्ष की कुर्सी पर कौन बैठेगा?
फिलहाल राजनीतिक तस्वीर में भाजपा एकजुट खेमे के रूप में दिखाई दे रही है, जबकि कांग्रेस में एक नहीं, बल्कि तीन अलग-अलग राजनीतिक धड़े सक्रिय नजर आ रहे हैं। कांग्रेस के भीतर अध्यक्ष पद की दावेदारी को लेकर अभी से जिस तरह की हलचल दिखाई दे रही है, उसने परिणाम से पहले ही सियासी तापमान बढ़ा दिया है।
कांग्रेस में तीन खेमे, तीन दावेदार और एक कुर्सी
शाहपुरा नगर पालिका अध्यक्ष का पद इस बार सामान्य वर्ग के लिए है। ऐसे में कांग्रेस के भीतर अध्यक्ष पद के लिए तीन प्रमुख दावेदारों के नाम सामने आने से पार्टी की अंदरूनी राजनीति गरमा गई है।
राजनीति का गणित बेहद सीधा है—कुर्सी एक है और दावेदार तीन।
यहीं से कांग्रेस के भीतर असली सियासी परीक्षा शुरू होती दिखाई दे रही है।
तीनों दावेदार अपने-अपने राजनीतिक संपर्क, समर्थक पार्षदों और संगठनात्मक पकड़ के सहारे अध्यक्ष पद की दौड़ में बढ़त बनाने की कोशिश कर रहे हैं। चुनाव परिणाम आने के बाद किसके पक्ष में कितने पार्षद खड़े होते हैं, यही इस पूरी कहानी का सबसे महत्वपूर्ण अध्याय होगा।
दिलचस्प बात यह है कि कांग्रेस के एक खेमे की ओर से तो बाड़ेबंदी की कवायद भी शुरू होने की चर्चा सामने आ रही है। यदि यह राजनीतिक कवायद आगे बढ़ती है तो परिणाम आने के बाद शाहपुरा की राजनीति में होटल, रिसोर्ट या सुरक्षित ठिकाने वाली पुरानी निकाय चुनावी रणनीति की तस्वीर भी देखने को मिल सकती है।
‘अपनों’ को संभालने की चिंता, विरोधियों को साधने की तैयारी
निकाय चुनाव में जीतने वाला हर पार्षद अपने वार्ड का प्रतिनिधि जरूर होगा, लेकिन अध्यक्ष चुनाव के समय वही पार्षद सत्ता के गणित का सबसे बड़ा मोहरा बन जाता है।
यही वजह है कि परिणाम आने से पहले ही संभावित विजयी पार्षदों पर राजनीतिक दलों और दावेदारों की नजरें टिक गई हैं।
किसके कितने पार्षद?
कौन किसके संपर्क में?
किसकी किससे पुरानी नजदीकी है?
कौन किस खेमे के साथ जा सकता है?
और सबसे बड़ा सवाल—किस समय कौन पाला बदल सकता है?
इन सवालों ने शाहपुरा की सियासत में नई हलचल पैदा कर दी है।
भाजपा फिलहाल एकजुट, लेकिन खेला यहां भी संभव
दूसरी ओर भाजपा का फिलहाल एक ही खेमा सक्रिय दिखाई दे रहा है। पार्टी के भीतर अध्यक्ष पद को लेकर कांग्रेस जैसी खुली खेमेबाजी अभी सामने नहीं आई है।
लेकिन राजनीति में परिणाम आने तक और परिणाम आने के बाद के हालात अलग हो सकते हैं।
यदि किसी दल को बहुमत के आंकड़े से कुछ सीटों की कमी रह जाती है तो निर्दलीय पार्षदों की भूमिका अचानक सबसे महत्वपूर्ण हो सकती है। ऐसे में भाजपा भी बोर्ड बनाने के लिए अपने राजनीतिक समीकरण साधने में पीछे नहीं रहने वाली।
अर्थात अभी भले ही भाजपा का खेमा एकजुट दिखाई दे रहा हो, लेकिन बोर्ड बनाने की जरूरत पड़ी तो ‘येन-केन-प्रकारेण’ बहुमत जुटाने का सियासी खेल शुरू होना तय माना जा रहा है।
35 वार्डों का गणित तय करेगा किसका राज
शाहपुरा नगर पालिका में कुल 35 वार्ड हैं। यही 35 वार्ड अध्यक्ष पद की पूरी कहानी लिखेंगे।
35 पार्षदों वाली पालिका में किसी एक दल को स्पष्ट बहुमत मिलता है तो अध्यक्ष पद का रास्ता काफी हद तक साफ हो जाएगा। लेकिन यदि परिणाम त्रिशंकु या कांटे के मुकाबले में आता है, तो तस्वीर पूरी तरह बदल जाएगी।
ऐसी स्थिति में एक-एक पार्षद की कीमत बढ़ जाएगी।
निर्दलीय पार्षद अचानक ‘किंगमेकर’ की भूमिका में आ सकते हैं और छोटे अंतर से जीतने वाला उम्मीदवार अध्यक्ष पद की दौड़ में बड़ा खिलाड़ी बन सकता है।
परिणाम से पहले ‘रिसॉर्ट पॉलिटिक्स’ की आहट?
राजस्थान की निकाय राजनीति में परिणाम के बाद पार्षदों की बाड़ेबंदी कोई नई बात नहीं है। लेकिन शाहपुरा में इस बार परिणाम आने से पहले ही जिस तरह खेमेबंदी के संकेत दिखाई दे रहे हैं, उससे यह संभावना मजबूत हो रही है कि परिणाम आने के बाद राजनीतिक गतिविधियां और तेज होंगी।
खासकर कांग्रेस में यदि तीन दावेदार अपने-अपने समर्थक पार्षदों को एकजुट करने में जुटते हैं तो पार्टी के भीतर अध्यक्ष पद की लड़ाई पार्टी बनाम पार्टी से ज्यादा ‘अपनों बनाम अपनों’ की लड़ाई बन सकती है।
कांग्रेस के लिए सबसे बड़ी चुनौती—अध्यक्ष कौन नहीं, किसे स्वीकार करेंगे बाकी?
कांग्रेस के सामने चुनौती केवल अपना अध्यक्ष चुनने की नहीं होगी। चुनौती यह भी होगी कि तीन दावेदारों में से जिस चेहरे को आगे किया जाएगा, क्या बाकी दोनों खेमे उसे स्वीकार करेंगे?
यदि सहमति बन गई तो कांग्रेस मजबूत स्थिति में आ सकती है।
लेकिन यदि टिकट, जीत और अध्यक्ष पद के बाद भी अंदरूनी मतभेद जारी रहे तो इसका सीधा असर बोर्ड के कामकाज पर पड़ सकता है।
यही वजह है कि कांग्रेस में इस समय सबसे ज्यादा चर्चा ‘कौन अध्यक्ष बनेगा?’ की नहीं, बल्कि ‘कौन कितने पार्षद अपने साथ लेकर चल रहा है?’ की है।
भाजपा की नजर कांग्रेस के ‘अंदरूनी खेल’ पर
भाजपा के लिए कांग्रेस की यह अंदरूनी खेमेबाजी किसी राजनीतिक अवसर से कम नहीं है।
यदि कांग्रेस अपने विजयी पार्षदों को एकजुट रखने में सफल नहीं रही तो भाजपा के लिए बोर्ड बनाने का रास्ता आसान हो सकता है। ऐसे में भाजपा कांग्रेस के भीतर चल रही हर गतिविधि पर नजर रखेगी और परिणाम के बाद अपने समीकरणों के अनुसार रणनीति बदल सकती है।
राजनीति में कहा जाता है—चुनाव मैदान में वोट से जीता जाता है, लेकिन बोर्ड सत्ता के गणित से बनता है।
शाहपुरा में इस बार यही गणित सबसे ज्यादा दिलचस्प होने वाला है।
अब निगाहें तीन चीजों पर
निकाय चुनाव 2026 में शाहपुरा की राजनीति का अगला अध्याय तीन सवालों के जवाब तय करेंगे—
पहला—35 वार्डों में भाजपा और कांग्रेस का आंकड़ा क्या रहता है?
दूसरा—निर्दलीय कितने पार्षद जीतकर आते हैं और वे किस तरफ जाते हैं?
तीसरा—कांग्रेस के तीन दावेदारों में से कौन अपने साथ ज्यादा पार्षद खड़े कर पाता है?
इन तीन सवालों के जवाब मिलते ही अध्यक्ष की कुर्सी का खेल साफ होने लगेगा।
फिलहाल तस्वीर यही है कि मतदान खत्म हो चुका है, लेकिन शाहपुरा की सत्ता की लड़ाई अभी शुरू हुई है।
नतीजे भले ही मतगणना के दिन सामने आएं, लेकिन अध्यक्ष की कुर्सी के लिए सियासी बिसात अभी से सज चुकी है।
अब देखना यह है कि 35 वार्डों की जनता किसे जीत का जनादेश देती है और जीतने वाले पार्षदों में से कौन अध्यक्ष की कुर्सी तक पहुंचने का जादुई आंकड़ा जुटा पाता है।
क्योंकि शाहपुरा में इस बार चुनाव सिर्फ पार्षद चुनने का नहीं है…
असली मुकाबला तो ‘पालिका की चाबी’ हासिल करने का है।