दिलजीत दोसांझ की फिल्म ‘सतलुज’ पंजाब का सबसे बड़ा विवाद,पंजाब पुलिस के बलिदान को छिपाने का आरोप

पंजाब में दिलजीत दोसांझ की फिल्म सतलुज पर सियासी विवाद खड़ा हो गया है। राजनीतिक बयानबाजी शुरू हो गई। मामला इतना बढ़ा कि भारतीय जनता पार्टी के बड़े नेताओं में से एक, इकबाल सिंह लालपुरा ने केंद्रीय मंत्री रवनीत सिंह बिट्टू को अपनी हद में रहने की चेतावनी दी है। इससे पता चलता है कि दिलजीत दोसांझ की फिल्म ‘सतलुज’ पर पार्टी के रुख को लेकर राज्य इकाई में बेचैनी है। इस सार्वजनिक विवाद की शुरुआत बिट्टू के उस बयान से हुई जिसमें उन्होंने विवादित फिल्म के इस दावे को चुनौती दी थी कि राज्य में उग्रवाद के दौर में 25,000 अज्ञात शवों का चुपचाप निपटान किया गया था।

केंद्रीय मंत्री ने इस हफ्ते की शुरुआत में कहा कि अगर कहीं भी 25,000… जिन अज्ञात शवों की उन्होंने बात की है, अगर वह डेटा सच है, तो उन्हें वह लिस्ट आपके सामने दिखानी चाहिए। 25,000 तो छोड़िए, मैं तो कहता हूं कि 5,000 का डेटा भी वे मीडिया के सामने, अपने आयोग के सामने और सुप्रीम कोर्ट या हाई कोर्ट में पेश करें।”सेंसर बोर्ड को कई अजीब आपत्तियां थी जिनमें- भारतीय झंडे को नहीं दिखा सकते, ‘पंजाब पुलिस’ नहीं बोल सकते, गुरुबाणी की आवाज़ नहीं सुना सकते, पंजाब के ज़िलों के नाम नहीं दे सकते, पंजाब 95 की जगह किसी काल्पनिक राज्य के नाम का इस्तेमाल किया जाए.”

“यहां तक कि जसवंत सिंह खालड़ा का नाम इस्तेमाल ना करने को भी कहा गया. ये सब ऐसी बातें थीं जिसे निर्माताओं ने मानने से इनकार कर दिया.”

जिस तरह ये फ़िल्म पहले सेंसर बोर्ड में फंसी और फिर बिना कुछ कहे ओटीटी से हटाया गया उससे फ़िल्म इंडस्ट्री में भी शंका बढ़ी है.

हमने मुंबई में कई फ़िल्मकारों, फ़िल्म ट्रेड एक्सपर्ट्स और इंडस्ट्री से जुड़े लोगों से बात की.

कई लोगों ने विवाद में पड़ने के डर से इंटरव्यू से इनकार कर दिया. ज़्यादातर का मानना है कि यह मामला देश के हर उस फ़िल्म निर्माता और निर्देशक के लिए खुली चेतावनी है जो किसी भी ऐतिहासिक या राजनीतिक घटना पर कहानी कहना चाहता है.

नाम ना छापने की शर्त पर एक फ़िल्म निर्माता ने कहा, “ओटीटी पर स्पष्ट नियम तो हैं नहीं. सवाल ये है कि कैसे निर्धारित करें कि जो हम दिखाएंगे उस पर विवाद नहीं होगा? ये हम सब प्रोड्यूसर्स के लिए बेहद डरावना है.”

उन्होंने कहा, “फ़िल्म मेकर्स को जो मैसेज भेजा जा रहा है वो लाउड एंड क्लियर है कि ऐसी कोई भी फ़िल्म ना बनाएं जिससे सरकार को कोई आपत्ति हो या जो उन्हें अच्छी ना लगे.”

बिना किसी स्पष्ट क़ानूनी आदेश के फ़िल्म का इस तरह स्ट्रीमिंग से ग़ायब हो जाना क्या भारतीय सिनेमा में ‘अघोषित सेंसरशिप’ के नए दौर की तरफ़ इशारा नहीं करता?
बेअंत सिंह के पोते ने उठाए सवाल
पंजाब के मारे गए मुख्यमंत्री बेअंत सिंह के पोते बिट्टू ने एक लिखित बयान में पूछा कि अगर यह आंकड़ा सिर्फ अंदाजे या आरोप पर आधारित है, तो इसे एक स्थापित ऐतिहासिक तथ्य के तौर पर क्यों दिखाया गया? दर्शकों को यह क्यों नहीं बताया गया कि यह संख्या किसी अंतिम न्यायिक फ़ैसले से पक्के तौर पर साबित नहीं हुई है?

पंजाब पुलिस के बलिदान को छिपाने का आरोप
मानवाधिकार कार्यकर्ता खालरा का अपहरण 31 अगस्त, 1995 को बेअंत सिंह की हत्या के पांच दिन बाद कर लिया गया था और बाद में उनकी हत्या कर दी गई थी। बिट्टू ने फिल्म में पंजाब के सबसे काले दौर को अधूरा दिखाने और चुनिंदा घटनाओं को ही पेश करने पर भी सवाल उठाए। उन्होंने पूछा कि आतंकवादियों द्वारा बेरहमी से मारे गए बेगुनाह हिंदुओं, बस यात्रियों, दुकानदारों, सरकारी कर्मचारियों, मजदूरों और आम नागरिकों के नरसंहार को उसी तीव्रता के साथ क्यों नहीं दिखाया गया? आतंकवाद से लड़ने वाले पंजाब पुलिस के जवानों, सुरक्षा बलों और अनगिनत बहादुर नागरिकों के भारी बलिदान को कम करके क्यों दिखाया गया?