जयपुर में ‘मस्त महिला मंडली’ की स्क्रीनिंग, 10 महिलाओं ने सुनाई अपनी कहानी

स्मार्टफोन से बनाई 72 मिनट की सामुदायिक डॉक्यूमेंट्री, महिलाओं के आत्मविश्वास और अपनी कहानी खुद कहने के अधिकार पर हुआ संवाद

जयपुर, 23 अगस्त। स्मार्ट हलचल|मुंबई के चेंबूर क्षेत्र की 10 कामकाजी महिलाओं द्वारा स्मार्टफोन कैमरे से तैयार की गई 72 मिनट की सामुदायिक डॉक्यूमेंट्री फिल्म ‘मस्त महिला मंडली’ की स्क्रीनिंग रविवार को जवाहर कला केंद्र के रंगायन सभागार में हुई। स्क्रीनिंग के बाद फिल्म निर्माण के अनुभव, महिलाओं की भागीदारी, सामुदायिक सिनेमा और डिजिटल माध्यमों से अपनी कहानी स्वयं कहने की संभावनाओं पर संवाद किया गया।
फिल्म की खासियत यह है कि इसमें जिन महिलाओं के जीवन और अनुभवों को दिखाया गया है, वही महिलाएं इसके निर्माण में भी सक्रिय रूप से शामिल रही हैं। फिल्म निर्माता एवं निर्देशक अंजुम शेख, उनके साथ दर्शना मायकर, गौरी राणे, कविता खोमने, नाजनीन सिद्दीकी, रोहिणी कदम, रेहाना शेख, शीतल नवले, कविता घुग्गे और वैशाली माने ने कैमरा संभालने और अपनी कहानियां दर्ज करने की जिम्मेदारी निभाई।
इन महिलाओं ने टाटा सामाजिक विज्ञान संस्थान (TISS) के मीडिया एवं कल्चरल स्टडीज विभाग से फिल्म निर्माण का प्रशिक्षण लिया और करीब दो वर्षों तक हर शनिवार फिल्म निर्माण की प्रक्रिया में हिस्सा लिया। राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता फिल्म की सह-निर्देशक एवं TISS की प्रोफेसर शिल्पी गुलाटी के मार्गदर्शन में उन्होंने स्मार्टफोन कैमरा संचालन, ऑडियो रिकॉर्डिंग, इंटरव्यू और एडिटिंग जैसी तकनीकें सीखीं। शिल्पी गुलाटी फिल्म की सह-निर्देशक, सह-फैसिलिटेटर और संपादक भी हैं। कोरो इंडिया ने फिल्म के निर्माण में भूमिका निभाई।
*बस्ती की जिंदगी को सिर्फ संघर्ष के रूप में नहीं दिखाया*: फिल्म में महिलाओं के जीवन को केवल गरीबी और अभाव के नजरिए से नहीं दिखाया गया, बल्कि उनकी दोस्ती, हंसी-मजाक, सपने, इच्छाएं, आत्मविश्वास और रोजमर्रा की खुशियों को भी जगह दी गई है। फिल्म से जुड़ी नाजनीन सिद्दीकी ने कहा कि बस्ती की महिलाओं की जिंदगी को हमेशा दुख और संघर्ष की कहानी के रूप में देखने की जरूरत नहीं है। वे भी हंसती हैं, खेलती हैं, सपने देखती हैं और अपनी पसंद के अनुसार जीवन जीना चाहती हैं।
फिल्म में रेहाना शेख का रसोई में खाना बनाते हुए नृत्य करने का दृश्य दर्शकों के बीच चर्चित रहा। वहीं कविता द्वारा भारतीय संविधान पढ़ने की रुचि महिलाओं के अधिकार, समानता और संविधान के प्रति उनकी समझ को सामने लाती है। महिलाएं फिल्म में कबड्डी खेलती, बाइक चलाती और सामुदायिक गतिविधियों में हिस्सा लेती दिखाई देती हैं।
*‘राइट टू पी’ अभियान से शुरू हुई यात्रा*: कार्यक्रम में बताया गया कि फिल्म की यात्रा कोरो इंडिया के करीब 15 वर्ष पुराने ‘राइट टू पी—पेशाब का अधिकार’ अभियान से जुड़ी सामुदायिक पहल से शुरू हुई थी। शुरुआत में उद्देश्य स्वच्छता तथा सुरक्षित और सुलभ सार्वजनिक शौचालय के मुद्दे उठाना था। बाद में महिलाओं को स्मार्टफोन कैमरा देकर अपनी पसंद की तस्वीरें और वीडियो बनाने के लिए प्रोत्साहित किया गया। इसी प्रक्रिया में उन्होंने महसूस किया कि उनके जीवन, अनुभव, रिश्ते, सपने और रोजमर्रा की गतिविधियां भी महत्वपूर्ण कहानियां हैं।
फिल्म निर्माण की प्रक्रिया ने महिलाओं के आत्मविश्वास को मजबूत किया। शुरुआत में कई महिलाओं के लिए कैमरे के सामने आना सहज नहीं था, लेकिन प्रशिक्षण और सामूहिक सहयोग के बाद उन्होंने अपनी बात खुलकर रखी। कार्यक्रम में वक्ताओं ने कहा कि कहानी कहने का अधिकार केवल पेशेवर फिल्म निर्माताओं तक सीमित नहीं है। स्मार्टफोन और प्रशिक्षण के माध्यम से महिलाएं और समुदाय स्वयं अपनी कहानियों और स्थानीय मुद्दों को दुनिया तक पहुंचा सकते हैं।
स्क्रीनिंग के दौरान सामुदायिक सिनेमा, महिला नेतृत्व, डिजिटल कहानी कहने और महिलाओं द्वारा अपनी आवाज स्वयं दर्ज करने की संभावनाओं पर विस्तार से चर्चा हुई।