बनास के आंचल में बजरी की चोट, बदल रहा ‘गंगा मां’ का स्वरूप!

 

जहाजपुर क्षेत्र में नदी के तटों तक पहुंची खुदाई, कहीं गहरे गड्ढे तो कहीं कटे हुए किनारे; आस्था और पर्यावरण दोनों की सुरक्षा पर उठे सवाल

जहाजपुर अलकेश पारीक

जहाजपुर। स्मार्ट हलचल।बनास नदी को जहाजपुर क्षेत्र में लोग सिर्फ एक नदी नहीं, बल्कि ‘गंगा मां’ के रूप में श्रद्धा से देखते हैं। इसी बनास के किनारे अगर बजरी की खुदाई के निशान दिखाई दें और नदी के प्राकृतिक तट जगह-जगह कटे नजर आएं तो चिंता होना स्वाभाविक है। सामने आई तस्वीरें इसी चिंता को और गहरा करती हैं। नदी के तटवर्ती हिस्सों में गहरी खुदाई और बड़े-बड़े गड्ढे दिखाई दे रहे हैं, जिससे बनास के प्राकृतिक स्वरूप में बदलाव नजर आ रहा है।

जहां आस्था से सिर झुकते हैं, वहां खुदाई के निशान क्यों?

बनास नदी क्षेत्र के लोगों के लिए सिर्फ पानी का बहाव नहीं, बल्कि वर्षों से आस्था, जीवन और प्रकृति से जुड़ी पहचान रही है। लोग इसके तटों से भावनात्मक लगाव रखते हैं। ऐसे में नदी के किनारों पर बजरी की खुदाई और उससे पैदा हुए कटाव के दृश्य लोगों को विचलित करने वाले हैं।

सवाल यह नहीं कि बजरी कितनी निकली, सवाल यह है कि क्या बजरी निकालते-निकालते बनास के प्राकृतिक तटों का स्वरूप भी बदला जा रहा है?

तटों पर गहरी खुदाई, जिम्मेदारों की निगरानी पर सवाल

मौके की तस्वीरों में कई स्थानों पर गहरी खुदाई और कटे हुए किनारे नजर आ रहे हैं। यदि यह खुदाई स्वीकृत क्षेत्र और निर्धारित नियमों के तहत हुई है तो उसकी सीमा और शर्तों की जांच होनी चाहिए। वहीं यदि कहीं नियमों का उल्लंघन हुआ है तो संबंधित विभागों को कार्रवाई करनी चाहिए।

बरसात के दौरान नदी में तेज बहाव आने पर कमजोर तटों पर कटाव बढ़ने की आशंका भी रहती है। इसलिए नदी के प्राकृतिक तटों की स्थिति को गंभीरता से लेने की जरूरत है।

‘गंगा मां’ के आंचल को बचाने की जिम्मेदारी किसकी?

स्थानीय लोगों का कहना है कि बनास को बचाना केवल प्रशासन की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि पूरे समाज की जिम्मेदारी है। लेकिन निगरानी और नियमों का पालन सुनिश्चित करना संबंधित विभागों का दायित्व है। ऐसे में खनन, राजस्व और प्रशासनिक अधिकारियों को मौके पर पहुंचकर स्थिति की जांच करनी चाहिए।

नदी के तट की पैमाइश, खनन अनुमति, निर्धारित क्षेत्र और वास्तविक खुदाई की स्थिति की जांच कर स्थिति सार्वजनिक की जानी चाहिए। नियमों का उल्लंघन मिले तो नियमानुसार कार्रवाई हो और संवेदनशील तटों पर निगरानी बढ़ाई जाए।

आज नहीं संभले तो कल सिर्फ तस्वीरें बचेंगी

बनास के प्रति लोगों की आस्था और नदी के प्राकृतिक महत्व को देखते हुए यह समय सवाल पूछने के साथ-साथ जिम्मेदारी निभाने का भी है। बजरी का कारोबार और नदी का संरक्षण—दोनों के बीच नियमों की स्पष्ट सीमा जरूरी है।

अब देखना यह है कि इन तस्वीरों के सामने आने के बाद शासन-प्रशासन ‘गंगा मां’ कहे जाने वाली बनास के तटों की सुध लेता है या नहीं।

क्योंकि नदी सिर्फ पानी नहीं होती… नदी अपने साथ लोगों की आस्था, खेतों की उम्मीद और आने वाली पीढ़ियों का भविष्य भी बहाकर ले जाती है।