सियासत के बहुरूपिए चेहरे……….. कांग्रेस,भाजपा और बगावत का ‘फिक्स मैच’

विशेष राजनीतिक रिपोर्ट-आकाश शर्मा
चित्तौड़गढ़ ।स्मार्ट हलचल।विकास के मंचों पर जब नेताओं का जमावड़ा लगता है, तो ढोल-नगाड़ों और वादों के शोर के बीच सियासत का असली और बदरंग चेहरा सामने आ जाता है। जरा इन मंचों की ओर देखिए, यहाँ वे तमाम चेहरे भी पूरे शान से बैठे नजर आते हैं, जिनके राजनीतिक इतिहास में कभी भाजपा की जमानत जब्ती या कांग्रेस के दफ्तरों में हुई नारेबाजी के किस्से राजनीतिक गलियारों में कोहराम मचाते थे। राजनीति भी गजब की सौदागर चीज है। यहाँ न कोई स्थायी दुश्मन है और न ही कोई पक्का वैचारिक सिपाही! चुनाव के पहले तक जो नेता टिकट न मिलने पर पार्टी का सबसे बड़ा ‘गद्दार’ और ‘बागी’ करार दिया जाता है, चुनाव के नतीजे आते ही वही रातों-रात पार्टी का ‘सम्माननीय मार्गदर्शक’ या ‘जिताऊ चेहरा’ कैसे बन जाता है ? निकाय चुनाव में पूरे राजस्थान से चुनाव बागियों के जो आंकड़े आए, वे बेहद चौंकाने वाले थे, अब दोनों ही पार्टियों को आने वाले पंचायत चुनाव में फूंक-फूंक कर कदम रखना होगा, कहीं ऐसा न हो कि बागियों का यह बढ़ता ग्राफ पार्टियों के लिए फिर से बड़ी मुसीबत बन जाए। जरा सोचिए उस निष्ठावान कार्यकर्ता की मनोदशा पर, जो कल तक धूप और धूल में पार्टी का झंडा उठाए उसी बागी के खिलाफ गाल फाड़कर नारे लगा रहा था और आज? आज उसी बागी को मंच पर माला पहनाने और उसके साथ ठहाके लगाने की मजबूरी उसकी किस्मत बन चुकी है। कल तक जिस बागी ने पार्टी को चुनावी पटखनी देने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी, आज वह सत्ता के गलियारों में मलाई काट रहा है, और सच के लिए खून-पसीना बहाने वाला कार्यकर्ता ठगा सा सिर्फ किनारे खड़ा तमाशा देखता रह जाता है ।
चाहे बात कांग्रेस की गुटबाजी के अखाड़े की हो, जहाँ अपनों की ही पीठ में खंजर घोंपना पुरानी परंपरा है, या फिर भाजपा के अनुशासित होने के दावों की, जहाँ टिकट बंटते ही बागी-बागी खेल शुरू हो जाता है, सच्चाई दोनों तरफ एक जैसी ही है। वाह रे राजनीति! टिकट नहीं मिला तो बगावत, बगावत हुई तो चुनावी मुकाबला, चुनाव खत्म हुआ तो सौदेबाजी के समीकरण, और समीकरण बने तो फिर वही बागी अपने! आइडियोलॉजी, उसूल और विचारधारा सिर्फ चुनावी भाषणों के जुमले हैं, असली खेल तो कुर्सी और समझौतों का है!
वफादार का पसीना,सियासत का सबसे बड़ा मज़ाक !
जिस कार्यकर्ता ने पांच साल तक धूप-छांव में पार्टी के लिए नारे लगाए, बूथ संभाला, झंडा उठाया और नेताओं की रैलियों में भीड़ जुटाई वह जब अपने हक का टिकट मांगता है, तो उसे अनुशासन का पाठ पढ़ाया जाता है कि “संगठन बहुत बड़ा है, धैर्य रखो !” लेकिन जो सिरफिरा नेता टिकट न मिलने पर पार्टी को गालियां बकता है, बगावत का झंडा उठाता है और चुनावी चोट देता है, चुनाव के बाद उसी पर नुक्तों और समझौतों की बरसात कर दी जाती है। तब पार्टी के रणनीतिकार दलील देते हैं “राजनीति में सबको साथ लेकर चलना पड़ता है !”
अब वह बेचारा निष्ठावान कार्यकर्ता पूछे भी तो किससे पूछे, “साहब, यह अनुशासन का चाबुक सिर्फ वफादार के लिए है या बगावत करने वालों की सहूलियत के लिए भी कोई छूट है ?” विधानसभा से लेकर निकाय चुनावों तक, इस बगावत की मंडी ने पार्टियों के मुखौटे उतारकर रख दिए हैं । कहीं निर्दलीय बनकर अपनों की लुटिया डुबोई, कहीं अधिकृत प्रत्याशी के वोट काटे, तो कहीं चुनाव के बाद वही बागी सत्ता के गलियारों में सबसे खास बन बैठा। इस पूरे खेल में एक किरदार हमेशा खामोश रहता है वह है खून-पसीना बहाने वाला वह कार्यकर्ता, जो आज भी अपने ही नेताओं से कुढ़ते हुए सिर्फ इतना ही पूछ पाता है,”जब इसने पार्टी को रौंदा था, तब पार्टी ने इसे क्यों नहीं रोका था?”
मंच से ज्यादा मंच के पीछे का सच !
शुक्र है कि आज की जनता इतनी अंधी और भोली नहीं रही कि चुनावी पोस्टरों की सुंदर कहानियों पर आँख मूँदकर यकीन कर ले। जनता की निगाहें मंच पर खड़े नेताओं के भाषणों से ज्यादा, उनके मंच के पीछे के सौदों पर टिकी रहती हैं। जनता जानती है कि कल तक जो एक-दूसरे को फूटी आँख नहीं सुहाते थे, आज वे पर्दे के पीछे किसके साथ चाय की प्यालियाँ और सत्ता की मलाई बाँट रहे हैं। जनता पहचान चुकी है कि कौन चुनाव में पीठ में छुरा घोंप रहा था और आज किसके साथ मिलकर मंच पर मुस्कान बिखेर रहा है। जनता की यही तीखी नजर राजनीति के सबसे बड़े और कड़वे व्यंग्य को जन्म देती है चुनाव में बागी, सत्ता में साथी, और अगली बार फिर वही जनता से वफादारी का झूठा प्रमाणपत्र !
दीया और सफेद चींटी,खोखला होता तंत्र !
राजनीति में अब सिद्धांतों की उम्र छोटी हो गई है और समय बदलकर रंग बदलना ही सबसे बड़ा ‘फायदेमंद हुनर’ बन चुका है। यही वह नाजुक मोड़ है जहाँ ‘दीया’ और ‘सफेद चींटी’ का असली फर्क खुलकर सामने आता है। दीया वह होता है जो खुद जलता है, तपता है, पिघलता है और फिर भी चारों तरफ का अंधेरा दूर करता है। पार्टी का सच्चा और निष्ठावान कार्यकर्ता भी कुछ ऐसा ही है, जो अपने हिस्से का सुख, समय और सुकून त्याग कर संगठन के मजबूत खंभे की तरह खड़ा रहता है। सफेद चींटी वह न शोर मचाती है, न मंचों पर बड़े-बड़े भाषण देती है, और बाहर से दीवार को हमेशा सुंदर और सुरक्षित ही दिखने देती है; बस चुपचाप भीतर-ही-भीतर संगठन की जड़ों को खोखला करती रहती है ! इसलिए आज सत्ता के सिंहासन पर बेफिक्र बैठे नेताओं से सीधा और कड़वा सवाल है बागी को गले लगाने से पहले क्या आपने उस कार्यकर्ता का चेहरा भी देखा है, जिसने हर मौसम में आपके लिए पसीना बहाया था ? क्या उस पीड़ित नेता की चीख भी सुनी है, जिसे अपनों की बगावत ने बीच मझधार में चुनावी चोट दी थी ? जरा कभी उस कार्यकर्ता की आँखों में भी झाँककर देखिए, जिसने नगर निकाय चुनावों के बाद मलाईदार पदों के लिए बगावत नहीं की, पार्टी नहीं छोड़ी, बल्कि चुपचाप अपना हक और पद छोड़कर उसूलों की चादर ओढ़ ली। जनता की उस पैनी नजर को भी मत भूलिए, जो आज भले ही खामोश रहकर मुस्कुरा रही है, लेकिन जब वक्त आता है, तो वही मुस्कान आपके पूरे राजनीतिक गणित को जमींदोज कर देती है।
निकाय से पंचायत का सफर,अब फूंक-फूंक कर रखने होंगे कदम !
सत्ता के सिंहासन पर बैठे आखिर इन हुक्मरानों को कौन समझाए? कल का बागी आज अवसर बनकर गले मिलना राजनीति की तात्कालिक मजबूरी हो सकती है, लेकिन उसी बागी को बार-बार सिर आँखों पर बिठाना पार्टी के लिए खून बहाने वाले वफादारों की पीठ में छुरा घोंपने जैसा है । निकाय चुनावों में बागियों के जो आंकड़े सामने आए, वे बेहद चौंकाने वाले थे जहाँ अपनों की बगावत ने कई दिग्गजों के समीकरण बिगाड़ दिए और दलों को भीतर से खोखला कर दिया। इन नतीजों से सबक लेते हुए अब दोनों ही प्रमुख पार्टियों (कांग्रेस और भाजपा) को आने वाले पंचायत चुनावों में फूँक-फूँक कर कदम रखना होगा। यदि समय रहते इस अवसरवादी संस्कृति पर लगाम नहीं लगाई गई, तो बागियों का यह बढ़ता ग्राफ आने वाले चुनावों में पार्टियों केि तम्नना को पूरी तरह तहस-नहस कर देगा। याद रखिए, यह सवाल जितना ज्यादा दबाया जाएगा, कल यह उतना ही बड़ा और विस्फोटक बनकर फूटेगा !