महर्षि दयानन्द सरस्वती ने उदयपुर की पावन धरा से किया था वेदों की पुनर्स्थापना का शंखनाद: प्रो. धर्मेन्द्र शास्त्री

उदयपुर के पिछौली स्थित आर्य समाज सभागार में त्रिदिवसीय वेद प्रचार कार्यक्रम का भव्य शुभारंभ
जयपुर के आचार्य अवनीश मैत्री के सानिध्य में हुआ ऋग्वेद शतक यज्ञ

 

उदयपुर, 11 सितम्बर 2026
स्मार्ट हलचल|शहर के पिछौली स्थित आर्य समाज सभागार में त्रिदिवसीय वेद प्रचार कार्यक्रम का भव्य शुभारंभ ऋग्वेद शतक यज्ञ के साथ हुआ। यज्ञ को जयपुर से पधारे सुप्रसिद्ध आचार्य अवनीश मैत्री ने पूरे विधि-विधान और वैदिक मंत्रोच्चार के साथ सम्पन्न कराया। इस आध्यात्मिक आयोजन के प्रथम दिन बड़ी संख्या में सनातनी और वेद प्रेमी उपस्थित रहे।संयोजक सत्यप्रिय आर्य के अनुसार कार्यक्रम के मुख्य वक्ता दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रोफेसर डॉ. धर्मेंद्र शास्त्री ने अपने ओजस्वी संबोधन में कहा कि उदयपुर की पावन धरा से महर्षि दयानंद सरस्वती ने ‘सत्यार्थ प्रकाश’ की रचना पूर्ण कर वेदों की पुनर्स्थापना का शंखनाद किया था। उन्होंने याद दिलाया कि उदयपुर का नौलखा महल ही वह ऐतिहासिक स्थान है, जहाँ बैठकर स्वामी जी ने इस कालजयी ग्रंथ का प्रणयन पूरा किया। इसी ग्रंथ को आधार बनाकर आधुनिक भारत में वैदिक मूल्यों की पुनर्स्थापना हुई और यह विधर्मियों द्वारा चलाए जा रहे धर्मांतरण के दुष्चक्र को रोकने के लिए एक अचूक अस्त्र सिद्ध हुआ।

प्रोफेसर शास्त्री ने वैश्विक स्तर पर आर्य समाज के प्रभाव को रेखांकित करते हुए मॉरीशस का उदाहरण दिया। उन्होंने बताया कि वर्तमान में मॉरीशस में लगभग 600 आर्य समाज कार्यरत हैं, जहाँ ‘सत्यार्थ प्रकाश’ और ‘ऋग्वेदादिभाष्य भूमिका’ के माध्यम से वेदों का व्यापक प्रचार-प्रसार हो रहा है
वेदों को सनातन धर्म का मूल आधार बताते हुए उन्होंने “स्तुता मया वरदा वेदमाता” मंत्र की व्याख्या की। उन्होंने कहा कि परमात्मा ने मनुष्य को सात अनमोल वरदान दिए हैं—आयु, प्राणशक्ति, उत्तम संतान, पशुधन, यश, धन-संपत्ति और ईश्वर की कृपा। एक धार्मिक मनुष्य ईश्वर की भक्ति से इन्हें प्राप्त कर लौकिक जीवन में सफल होता है। वेदवाणी के अनुसार, जीवन के अंतिम समय (मोक्ष प्राप्ति के वक्त) मनुष्य को इन सात वस्तुओं को पुनः परमात्मा को समर्पित करते हुए मुक्ति का प्रयास करना चाहिए।

मुख्य व्याख्यान से पूर्व इंद्रदेव पीयूष ने अपनी सुमधुर आवाज में ईश्वर भक्ति के मनभावन भजन प्रस्तुत कर माहौल को पूरी तरह आध्यात्मिक बना दिया। भजनों पर तबले की शानदार संगत कलाकार अखिलेश शर्मा ने की।
कार्यक्रम के समापन सत्र में आर्य समाज के मंत्री सत्यप्रिय ने दूर-दराज से आए अतिथियों, वक्ताओं और श्रद्धालुओं का आभार व्यक्त किया। आर्य समाज प्रबंधन ने बताया कि यह त्रिदिवसीय आयोजन प्रतिदिन प्रातः और सायं कालीन सत्रों में पिछौली स्थित सभागार में संचालित रहेगा, जिसका औपचारिक समापन 13 सितंबर 2026 को मध्यान्ह में होगा।