श्री कृष्ण भगवान मथुरा से द्वारिका जाते समय काछोला में किया था तीन दिन विश्राम
अस्थल – वैष्णव परिवार काछोला में दशहरा से ही 5 दिन का कार्यक्रम का करता है आयोजन
काछोला 28 अक्टूबर –
स्मार्ट हलचल|काछोला कस्बे में 3 दिवसीय रास महोत्सव मनाया जाता है जिसमें किंवदंती है कि भगवान श्री कृष्ण जब द्वारिका जा रहे थे तो उन्होंने यहां विश्राम किया था जिस जगह विश्राम किया गया वहा आज भी सामुदायिक हॉस्पिटल के मध्य चबूतरा निर्मित है इसी उपलक्ष में यहा रास का मेला भरता है जो अब दीपावली पर भरता है।भारत वर्ष में मथुरा, द्वारिका के बाद केवल काछोला कस्बा ऐसा है जहां प्रथम दिवस वराह अवतार ओर द्वितीयदिवस नृसिंह अवतार के रूप मुकुट धारण करते ही भगवान स्वयं प्रकट होते है और अपनी लीला दिखाते है।
भगवान श्रीकृष्ण ने मथुरा से द्वारिका पधारते समय काछोला में विश्राम किया था। श्री रघुनाथजी मंदिर के महंत कमल दास, डॉ कैलाशचंद्र वैष्णव, परमेश्वर, सत्यनारायण व ओमप्रकाश ने बताया कि पूर्वजों के अनुसार चली आ रही परंपरा के तहत दशहरे पर भगवान श्रीरघुनाथजी की शोभायात्रा के साथ दशहरा मैदान में रावण दहन किया जाता है। लौटते समय भजन-कीर्तन और जयकारों के साथ शोभायात्रा सदर बाजार से होते हुए अपने स्थान पर पहुंचती है।
अस्थल परिवार के डॉ कैलाश चंद्र वैष्णव ने बताया कि
प्रथम दिन- गांव के मध्य लक्ष्मीनाथ मंदिर से भगवान रघुनाथ जी की शोभायात्रा निकलती है जो रावण चौक पहुंच कर रावण का वध तीर बाण के माध्यम से करते हैं। रामायण में वर्णन आता है राम-रावण युद्ध कई दिनो तक चला लेकिन शिवजी के वरदान से रावण का कुछ नही बिगड़ता है
फिर महाराज् विभीषण जी के इसारे से रावण के नाभी में स्थित अमृत कुण्ड है वहां बाण लगावो तब रामजी नाभि मे बाण मारते है और रावण धाराशायी होकर मृत्यु को प्राप्त होता है
-दूसरे दिन
अस्थल में स्थित
रघुनाथ जी के मंदिर के सामने गणपति स्थापना लघु यज्ञ के माध्यम से की जाती है।
तीसरे दिन – अस्थल मंदिर से श्री वाराह भगवान की बाजे गाने के साथ शोभायात्रा निकलकर गांव के मध्य स्थित लक्ष्मीनाथ मन्दिर पहुचती है।
चौथ दिन कार्यक्रम अनुसार रात्रि में ही नृसिंह भगवान की शोभा यात्रा निकलती है, मन्दिर पर आरती होती है प्रसाद वितरण होता है।
पांचवें दिन – श्री कृष्ण भगवान (एक बच्चे को बनाया जाता है। लक्ष्मीनाथ मंदिर से शाम 4 बजे शोभा यात्रा निकलती है जो वर्तमान में सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र के परिसर में बना हुआ है ( जिसको रास का चबुतरा कहाँ जाता है ।
भगवान श्री कृष्ण अपने बाल गोपालो के साथ बाल लीला करते हैं. गेन्द खेलते आदि। रात को भजन कीर्तन के माध्यम से रासलीला की जाती है। हमारे पूर्वजो द्वारा बतलाया जाता रहा है कि भगवान श्री कृष्ण मथुरा से द्वारिका गये तब उनका 3 दिन के लिए यहा विश्राम किया गया था।
उसी सन्दर्भ में यह कार्यक्रम लगभग-700-800 वर्षा से वैष्णव ( अस्थल ) परिवार काछोला के द्वारा सम्पन्न कराया जाता है।