शाहपुरा मूलचन्द पेसवानी
रोजी-रोटी की तलाश में घर से निकला एक युवा मजदूर कभी नहीं सोच सकता था कि रंग-रोगन का काम करते-करते उसकी जिंदगी यूं अधूरी रह जाएगी। शाहपुरा क्षेत्र के फुलियाकलां थाना अंतर्गत गणपतिया खेड़ा गांव में 10 जुलाई को हुए दर्दनाक हादसे में गंभीर रूप से घायल युवक ने आखिरकार इलाज के दौरान दम तोड़ दिया। युवक की मौत की खबर जैसे ही परिजनों और समाज के लोगों तक पहुंची, भीलवाड़ा जिला अस्पताल की मोर्चरी के बाहर आक्रोश फूट पड़ा। देखते ही देखते सैकड़ों लोग जमा हो गए और निष्पक्ष जांच, दोषियों पर सख्त कार्रवाई तथा मृतक परिवार को 10 लाख रुपये मुआवजा देने की मांग को लेकर धरने पर बैठ गए।
मामले की गंभीरता को देखते हुए जिला अस्पताल परिसर में तनावपूर्ण स्थिति बन गई। हंगामे की सूचना मिलते ही भीमगंज थाना पुलिस का जाप्ता मौके पर पहुंचा। किसी भी अप्रिय स्थिति से निपटने के लिए राजस्थान सशस्त्र कांस्टेबुलरी (आरएसी) के जवान भी तैनात किए गए। पुलिस अधिकारियों ने समाज के प्रतिनिधियों से लगातार संवाद कर माहौल शांत कराने का प्रयास किया।
रोजगार की तलाश में गया था, हादसे ने छीन ली जिंदगी–
जानकारी के अनुसार, भीलवाड़ा शहर के रामदेव मंदिर कोली मोहल्ला निवासी दीपक कुमार पुत्र नाथूलाल गैंडावध कोली गणपतिया खेड़ा गांव में एक मकान पर रंग-रोगन का कार्य कर रहा था। वह करीब 22 फीट ऊंचाई पर झूले के सहारे पेंटिंग कर रहा था। इसी दौरान वहां से गुजर रहे एक तेज गति के ट्रैक्टर ने कथित लापरवाही से झूले को अपनी चपेट में ले लिया। अचानक झूला असंतुलित हुआ और दीपक ऊंचाई से नीचे आ गिरा।
हादसे में गंभीर रूप से घायल दीपक को पहले शाहपुरा चिकित्सालय पहुंचाया गया, जहां प्राथमिक उपचार के बाद उसकी गंभीर हालत को देखते हुए भीलवाड़ा रेफर कर दिया गया। वहां सिम्स अस्पताल में पिछले कई दिनों से उसका उपचार चल रहा था। चिकित्सकों ने उसे बचाने का हरसंभव प्रयास किया, लेकिन आखिरकार बुधवार सुबह उसने जिंदगी की जंग हार दी।
मौत के बाद समाज में उबाल, पोस्टमार्टम से किया इनकार–
दीपक की मौत की सूचना मिलते ही कोली समाज में शोक के साथ आक्रोश भी फैल गया। समाज के बड़ी संख्या में लोग जिला अस्पताल की मोर्चरी पहुंच गए और शव का पोस्टमार्टम कराने से इनकार कर दिया। समाजजनों ने स्पष्ट कहा कि जब तक उनकी मांगों पर प्रशासन और संबंधित पक्ष सकारात्मक निर्णय नहीं लेते, तब तक शव नहीं उठाया जाएगा।
धरने पर बैठे कोली समाज विकास ट्रस्ट, भीलवाड़ा के सचिव मुरलीधर कोली और अध्यक्ष प्रकाश कोली ने कहा कि दीपक एक मेहनतकश युवक था, जो अपने परिवार का सहारा बनने के लिए गांव में मजदूरी कर रहा था। लेकिन एक ट्रैक्टर चालक की कथित लापरवाही ने उसकी जान ले ली। समाज ने मांग की कि मृतक के परिवार को 10 लाख रुपये का मुआवजा, परिवार के एक सदस्य को रोजगार तथा ट्रैक्टर चालक एवं मालिक के खिलाफ कड़ी कानूनी कार्रवाई की जाए।
समाज के लोगों का कहना था कि मजदूरों की सुरक्षा को लेकर लगातार लापरवाही बरती जाती है। ऊंचाई पर काम करने वाले श्रमिकों के लिए पर्याप्त सुरक्षा इंतजाम नहीं होते और हादसे के बाद जिम्मेदारी से बचने की कोशिश शुरू हो जाती है। उनका कहना था कि यदि समय रहते सुरक्षा मानकों का पालन कराया जाता तो शायद दीपक आज जीवित होता।
मोरचरी परिसर बना आंदोलन का केंद्र–
मृतक के परिजनों और समाज के लोगों ने जिला अस्पताल की मोर्चरी के बाहर धरना देकर प्रशासन के खिलाफ जमकर नारेबाजी की। पुलिस और प्रशासनिक अधिकारियों ने कई दौर की वार्ता की, लेकिन समाजजन अपनी मांगों पर अड़े रहे। इस दौरान अस्पताल परिसर में भारी पुलिस बल तैनात रहा ताकि कानून-व्यवस्था प्रभावित न हो।
स्थिति तब बदली जब ट्रैक्टर संचालकों और समाज के प्रतिनिधियों के बीच वार्ता हुई। लंबी बातचीत के बाद दोनों पक्षों में सहमति बनी कि मृतक के परिवार को दो लाख रुपये आर्थिक सहायता दी जाएगी तथा उपचार में हुआ खर्च भी संबंधित पक्ष वहन करेगा। समझौते के बाद समाज के लोगों ने धरना समाप्त किया और पोस्टमार्टम की प्रक्रिया के लिए सहमति दी।
हालांकि कई समाजजनों का कहना था कि एक युवा की जान की कीमत केवल दो लाख रुपये नहीं हो सकती। उनका कहना था कि भविष्य में ऐसे हादसों की पुनरावृत्ति रोकने के लिए दोषियों पर कठोर कार्रवाई और श्रमिक सुरक्षा के प्रभावी इंतजाम जरूरी हैं।
पहले से दर्ज है मामला, अब मौत की धाराएं जुड़ेंगी–
फुलियाकलां थाना पुलिस के अनुसार, हादसे के तुरंत बाद मृतक के भाई सुनील कुमार की रिपोर्ट पर मुकदमा संख्या 158 दर्ज कर लिया गया था। अब घायल युवक की उपचार के दौरान मौत होने के बाद प्रकरण में विधिसम्मत कार्रवाई की जा रही है। पुलिस ने बताया कि मामले की जांच एएसआई सोराज कर रहे हैं तथा पोस्टमार्टम रिपोर्ट और अन्य साक्ष्यों के आधार पर आगे की कानूनी कार्रवाई की जाएगी।
सवाल सिर्फ एक हादसे का नहीं…
यह घटना केवल एक सड़क हादसा नहीं, बल्कि मजदूरों की सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल भी खड़े करती है। आखिर ऊंचाई पर काम कर रहे श्रमिकों के आसपास भारी वाहनों की आवाजाही कैसे हो रही थी? क्या सुरक्षा मानकों का पालन कराया गया था? क्या कार्यस्थल पर पर्याप्त सावधानियां बरती गई थीं? यदि इन सवालों के जवाब समय रहते तलाशे जाते तो शायद एक परिवार का इकलौता सहारा आज जिंदा होता।
दीपक की मौत ने एक बार फिर यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि मेहनतकश मजदूरों की जिंदगी आखिर कितनी सस्ती है? जब तक हादसा नहीं होता, सुरक्षा नियम कागजों में रहते हैं और जब किसी गरीब की जान चली जाती है, तब मुआवजे की रकम तय कर मामला शांत कराने की कोशिश शुरू हो जाती है।
अब सबकी निगाहें पुलिस जांच पर टिकी हैं। यदि जांच निष्पक्ष हुई और दोषियों पर सख्त कार्रवाई हुई, तभी दीपक के परिवार को न्याय मिलने की उम्मीद जगेगी। अन्यथा यह मामला भी उन अनगिनत हादसों की सूची में शामिल हो जाएगा, जहां कुछ दिन शोर मचता है और फिर सब कुछ खामोश हो जाता है।

