ट्रैक्टरों के दौर में भी जिंदा है परंपरा: लाडपुरा के खेतों में लौटी रौनक, बैलों से ‘हलाई’ करने में जुटे अन्नदाता

लाडपुरा | पारंपरिक खेती | खरीफ बुवाई और हलाई 2026

मक्का, मूंगफली और सोयाबीन की बुवाई के बाद खेतों में निराई-गुड़ाई का काम शुरू; मिट्टी की उपजाऊ शक्ति बढ़ाने और नमी बनाए रखने के लिए बैल आज भी पहली पसंद
विशेष ग्राउंड रिपोर्ट: शिव जांगिड़ (लाडपुरा)

लाडपुरा (भीलवाड़ा), 11 जुलाई 2026। स्मार्ट हलहल|लाडपुरा गांव में इस बार पारंपरिक खेती की अनूठी झलक एक बार फिर देखने को मिल रही है। खरीफ फसलों की बुवाई संपन्न होने के साथ ही किसान बैलों की जोड़ी से खेतों में फसल की निराई-गुड़ाई (खरपतवार हटाना) यानी ‘हलाई’ करने में जुट गए हैं। सुबह-सुबह खेतों में बैलों के गले की घंटियों की आवाज और किसानों की कड़ी मेहनत का नजारा हर तरफ आम है।

आखिर क्यों मशीनी युग में भी जरूरी है बैलों से हलाई?

* कम खर्च और डीजल से मुक्ति: खेती में ट्रैक्टर की तुलना में लागत बेहद कम आती है, इसमें केवल बैलों की देखभाल और चारे का खर्च होता है।
* मिट्टी का बेहतर स्वास्थ्य: बैल के चलने से मिट्टी ज्यादा दबती नहीं है, जिससे जमीन भुरभुरी रहती है और फसलों की जड़ों तक हवा आसानी से पास होती है।
* नमी और पैदावार में वृद्धि: बीज बोने के तुरंत बाद हल चलाने से बीज मिट्टी में अच्छे से दब जाते हैं, जिससे वे पक्षियों से सुरक्षित रहते हैं और नमी बने रहने से अंकुरण बेहतर होता है।

इन फसलों की हुई है मुख्य रूप से बुवाई:

लाडपुरा और आसपास के क्षेत्रों में इस बार मानसून की शुरुआत के साथ मुख्य रूप से मक्का, मूंगफली, ज्वार, बाजरा, सोयाबीन, उड़द और मूंग की बुवाई बड़े पैमाने पर की गई है। खासकर छोटे खेतों और पथरीली जमीनों में ट्रैक्टरों के मुकाबले बैल सबसे भरोसेमंद साबित हो रहे हैं।

बुजुर्ग किसान बताते हैं कि यह पीढ़ी-दर-पीढ़ी चली आ रही परंपरा है। मशीनें अपनी जगह हैं, पर बैल से की गई हलाई में मिट्टी का मूल स्वभाव और उपजाऊपन बना रहता है। गांव में इन दिनों बुजुर्गों के साथ युवा पीढ़ी के किसान भी बढ़-चढ़कर हाथ बंटा रहे हैं। खेतों में इस वक्त मेहनत, बम्पर पैदावार की उम्मीद और मिट्टी की सोंधी खुशबू तीनों एक साथ बिखरी हुई है।