नियमों का पालन या रसूख का खेल? जिस राष्ट्रीय बागवानी बोर्ड के खुद उपाध्यक्ष हैं मंत्री भागीरथ चौधरी, उसी के खजाने से चमका निजी बिजनेस, विपक्ष ने पूछा- आम किसानों के लिए कब चलेगी ऐसी ‘बुलेट ट्रेन’ फाइल?
डेगाना|स्मार्ट हलचल।देश का आम और सीमांत किसान जब सरकारी योजनाओं या चंद हजार की सब्सिडी के लिए सरकारी दफ्तरों के चक्कर काट-काटकर चप्पलें घिस देता है, तब व्यवस्था की ‘सुपरफास्ट’ रफ्तार कैसी होती है, इसकी एक बानगी केंद्रीय कृषि और किसान कल्याण राज्य मंत्री भागीरथ चौधरी के प्रोजेक्ट में देखने को मिली है। यह प्रोजेक्ट डीडवाना जिले की परबतसर तहसील के गांव पीह में है। अजमेर से भाजपा सांसद और केंद्रीय मंत्री चौधरी को राजस्थान में उनके निजी ‘खीरा फार्म’ के लिए 99.60 लाख रुपये की भारी-भरकम सब्सिडी मंजूर की गई है।
खुद ही ‘बॉस’ और खुद ही ‘लाभार्थी’-
इस पूरे मामले में तकनीकी से ज्यादा नैतिक सवाल खड़े हो रहे हैं। यह सब्सिडी राष्ट्रीय बागवानी बोर्ड की ‘एकीकृत बागवानी विकास मिशन’ योजना के तहत जारी हुई है। गौर करने वाली बात यह है कि केंद्रीय कृषि राज्य मंत्री होने के नाते भागीरथ चौधरी खुद इस बोर्ड के पदेन उपाध्यक्ष हैं। यानी, जिस विभाग की कमान मंत्रीजी के हाथों में है, उसी विभाग के अधिकारियों ने अपने ‘बॉस’ के निजी बिजनेस को फायदा पहुँचाने वाली फाइल पर हस्ताक्षर किए हैं।
फाइल की ‘बुलेट ट्रेन’ रफ्तार-तारीख दर तारीख समझिए खेल
आम आदमी के लिए रेंगने वाली सरकारी फाइलें मंत्रियों के लिए कैसे उड़ने लगती हैं, इसकी क्रोनोलॉजी बेहद दिलचस्प है।
15 अप्रैल 2025मंत्री भागीरथ चौधरी ने सब्सिडी के लिए आवेदन किया।
29 अप्रैल 2025 महज 14 दिनों के भीतर प्रोजेक्ट को सैद्धांतिक मंजूरी मिल गई।
11 मार्च 2026प्रोजेक्ट को अंतिम रूप से स्वीकृत कर दिया गया।
30 मार्च 2026 99.60 लाख की राशि सीधे उनके एचडीएफसी बैंक के लोन खाते में ट्रांसफर कर दी गई।
अधिकारियों की मजबूरी या विशेष प्राथमिकता?-
कागजों पर इस प्रोजेक्ट को ‘प्रोजेक्ट अप्रूवल कमेटी’ के ब्यूरोक्रेट्स और एक्सपर्ट्स ने पास किया है, जिसमें मंत्री सीधे नहीं बैठते। नियमों के तहत जमीन का मालिक होने के नाते वे भी हकदार हैं। लेकिन सवाल यह है कि क्या विभाग का कोई अधिकारी अपने ही सबसे बड़े अधिकारी (बॉस) की फाइल को रोकने या खारिज करने की हिम्मत कर सकता था? आम किसान की फाइल 14 दिन में क्यों नहीं हिलती?
तीन चुभते सवाल, जिनका जवाब बाकी है-
1. समानता कहाँ है? राजस्थान समेत पूरे देश में लाखों किसानों के आवेदन महीनों और सालों से धूल खा रहे हैं। क्या मंत्रालय आम किसानों की फाइलों को भी 14 दिन में क्लियर करने का कोई ‘वीआईपी काउंटर’ खोलेगा?
2. नैतिकता का तकाजा: जब आप खुद उस बोर्ड के शीर्ष पद (उपाध्यक्ष) पर काबिज हैं, तो क्या आपको इस सब्सिडी को लेने से पहले पद से इस्तीफा नहीं देना चाहिए था या इसे ठुकराकर मिसाल नहीं पेश करनी चाहिए थी?
3. नो रिप्लाई क्यों? इस गंभीर मुद्दे पर जब मंत्री भागीरथ चौधरी से उनका पक्ष जानने के लिए संपर्क किया, तो उनका फोन ‘नो रिप्लाई’ आया। मंत्री जी की यह चुप्पी कई तरह के कयासों को जन्म दे रही है।
न खाऊंगा, न खाने दूंगा” के नारे के विपरीत काम-राठौड़
इस खुलासे के बाद राजनीतिक गलियारों में भी सरगर्मी तेज हो गई है। आरटीडीसी के पूर्व अध्यक्ष एवं कांग्रेस नेता धर्मेंद्र राठौड़ ने मामले पर चुटकी लेते हुए कहा:
”प्रधानमंत्री मोदी का नारा है कि ‘न खाऊंगा, न खाने दूंगा’, लेकिन जमीनी हकीकत इसके बिल्कुल उलट है। आज देश का अन्नदाता संकट में है, फसलों के दाम नहीं मिल रहे। दूसरी तरफ, मोदी सरकार के मंत्री महज 14 दिनों में अपने निजी फार्म के लिए करोड़ों की सब्सिडी डकार रहे हैं। सरकार अपने मंत्रियों की फिक्र छोड़ आम किसानों के लिए भी ऐसी ही त्वरित व्यवस्था बनाए। भाजपा का यह कदम साबित करता है कि वे पूरी तरह किसान विरोधी हैं।”
चौधरी बोले… मैंने कुछ नहीं छिपाया-
मैं किसान हूं। बचपन से ही उन्नत खेती करता आया हूं। मैंने गाइडलाइन का पालन करते हुए ही पॉली लगाया है। हजारों किसान सब्सिडी ले रहे हैं उसी के तहत मैंने ली थी। मैंने बाकायदा बोर्ड लगाकर पूरी जानकारी दी है। विपक्षी के आरोप निराधार है। उनके पास कोई मुद्दा नहीं बचा है। -भागीरथ चौधरी
