तीन तलाक के बाद अब तलाक-ए-हसन की बारी? क्या होता है तलाक-ए-हसन?

2017 में शायरा बानो केस में सुप्रीम कोर्ट ने तत्काल तीन तलाक (ट्रिपल तलाक) को 3-2 के बहुमत से असंवैधानिक घोषित किया थाउसके बाद 2019 में संसद ने मुस्लिम महिला (विवाह पर अधिकार संरक्षण) कानून पारित किया, जिसके तहत तीन तलाक देना अब आपराधिक अपराध है। अब बारी तलाक-ए-हसन और अन्य एकतरफा तलाक प्रथाओं की है।
मुस्लिम समाज में एकतरफा तलाक की प्रथाओं को लेकर एक बार फिर देश की सर्वोच्च अदालत में बड़ी कानूनी लड़ाई शुरू होने जा रही है. सुप्रीम कोर्ट कल यानी मंगलवार 19 मई से तलाक-ए-हसन को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर अहम सुनवाई करेगा. इस प्रथा से पीड़ित कई मुस्लिम महिलाओं ने अदालत का दरवाजा खटखटाकर इसे पूरी तरह असंवैधानिक और लैंगिक न्याय के खिलाफ घोषित करने की मांग की है.

क्या होता है तलाक-ए-हसन?
मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत तलाक-ए-हसन को तलाक का एक प्रामाणिक या न्यायसंगत तरीका माना गया है, लेकिन इसके दुरुपयोग और एकतरफा स्वरूप पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं. इस सिस्टम के तहत पति अपनी पत्नी को एक-एक महीने के अंतराल पर यानी कुल तीन महीने की अवधि में तीन बार तलाक बोलकर, लिखकर या डिजिटल माध्यम से संदेश भेजकर शादी को पूरी तरह खत्म कर सकता है.
इस प्रक्रिया में हर एक तलाक के बाद एक महीने का समय (इद्दत की अवधि) दिया जाता है ताकि यदि दोनों पक्षों में समझौता हो सके तो शादी बच जाए. इस दौरान अगर दोनों में शारीरिक संबंध बन जाते हैं या वे सुलह कर लेते हैं तो तलाक अपने आप रद्द हो जाता है. लेकिन अगर लगातार तीन महीनों तक हर महीने एक बार तलाक कहा जाता है और कोई सुलह नहीं होती तो तीसरे महीने के बाद निकाह पूरी तरह टूट जाता है. पीड़ित महिलाओं का तर्क है कि यह प्रक्रिया पूरी तरह एकतरफा है और इसमें महिलाओं की सहमति या उनके अधिकारों का कोई सम्मान नहीं होता.