विशेष विश्लेषणात्मक रिर्पोट-आकाश शर्मा
चित्तौड़गढ़ ।स्मार्ट हलचल|कानून की रक्षा की शपथ लेने वाली चित्तौड़गढ़ पुलिस की साख पर आज एक ऐसा ‘परमाणु बम’ फूटा है, जिसकी गूंज जयपुर के शासन सचिवालय तक सुनाई दे रही है। आरटीआई व सामाजिक कार्यकर्ता शांतिलाल छीपा द्वारा उजागर किया गया यह मामला महज़ एक विभागीय लापरवाही नहीं, बल्कि शासकीय अभिलेखों में हेराफेरी, गलत जांच रिपोर्ट पेश करने, अनुकंपा नियुक्ति में कथित फर्जीवाड़े को संरक्षण देने और भ्रष्टाचार पर पर्दा डालने का एक सुनियोजित खेल प्रतीत होता है। इसकी शिकायत करतें हुए उन्होनें मेंल द्वारा मुख्यमं मंत्री राजस्थान सरकार ,निदेशक स्वायत्त शासन विभाग, अतिरिक्त मुख्य सचिव,प्रमुख शासन सचिव,गृह विभाग,राजस्थान सरकार ,पुलिस महानिदेशक जयपुर,पुलिस महानिरीक्षक उदयपुर रेंज,महा निदेशक भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरों जयपुर, पुलिस अधीक्षक चित्तौड़गढ़ ,राजस्थान संपर्क प्रकोष्ठ, राजस्थान सरकार कों पूर्ण प्रकरण से अवगत करातें हुए कठोर कार्यवाही के साथ उदयपुर रेंज द्वारा निष्पक्ष उच्चस्तरीय स्वतंत्र जांच करायें जानें की मांग सरकार से की है ।
विरोधाभासी बयानों का भंवर और खुद बुना जाल !
पुलिस विभाग का खोखलापन देखिए सूचना के अधिकार (RTI) के तहत वृत्त चित्तौड़गढ़ के पुलिस उप अधीक्षक (पत्रांक 2437, दिनांक 19/08/2025) लिखित में दावा करते हैं कि रतनलाल चावला 3-4 साल पहले ही सेवानिवृत्त हो चुके हैं। लेकिन जब सच्चाई खंगाली जाती है और सलूंबर अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक कार्यालय से पत्रांक 580 (दिनांक 18/03/2026) आता है,तो सूचना देने से यह कहकर इनकार कर दिया जाता है कि यह ‘व्यक्तिगत जानकारी’ है। चौंकाने वाली बात तो यह है कि उस पत्र पर कथित रूप से हस्ताक्षर स्वयं रतनलाल चावला के ही बताए जा रहे हैं ! सवाल सीधा है क्या पुलिस महकमे में कागजों पर मुर्दा/सेवानिवृत्त बताकर अफसरों की कुर्सियाँ बचाई जा रही हैं? या सूचना छिपाने के लिए खुद अपने ही हस्ताक्षर से आदेश जारी किए जा रहे हैं ?
अनुकंपा नियुक्ति में नियम-कायदों की धज्जियां !
मामले की जड़ें और गहरी हैं । स्वर्गीय चुन्नीलाल चावला के पुत्र रमेश चंद्र चावला को नगर परिषद चित्तौड़गढ़ में अनुकंपा नियुक्ति किस आधार पर दी गई ? जब परिवार में पहले से एक पुत्र रतनलाल चावला पुलिस विभाग में और दूसरा पुत्र अध्यापक पद पर कार्यरत था, तो किस ‘गरीबी’ और किस ‘पात्रता’ के तहत अनुकंपा नियुक्ति बांटी गई? क्या राजकीय अभिलेखों और घोषणा-पत्रों में झूठ बोलकर सरकारी खजाने और हकदार युवाओं के अधिकारों पर डाका डाला गया ?
गलत जांच हो गई तो हो गई !
सबसे ज्यादा शर्मनाक और हैरान करने वाली बात तो तब सामने आती है जब शिकायतकर्ता 02 जुलाई 2026 को चित्तौड़गढ़ के जिला पुलिस अधीक्षक धर्मेंद्र सिंह यादव से व्यक्तिगत रूप से मिलकर गलत जांच रिपोर्ट पर कार्रवाई की गुहार लगाता है शिकायत के अनुसार, एसपी साहब का जवाब आता है। “गलत जांच रिपोर्ट हो गई तो हो गई, इसमें क्या हो गया है।” यह बयान नहीं, बल्कि कानून व्यवस्था और निष्पक्षता पर सीधा करारा थप्पड़ है ! पुलिस अधिकारियों की संदिग्ध भूमिका पर जांच बैठाने की बजाय, परिवाद को गेंद की तरह नगर परिषद के पाले में फेंक दिया गया। पुलिस विभाग के अधिकारियों (पूर्व डीएसपी विनय कुमार चौधरी, एएसआई देवीलाल व तत्कालीन थानाधिकारी) पर लगे गंभीर आरोपों को क्या इस तरह दबाया जाएगा ?
शिकायतों को ‘डस्टबिन’ में फेंकने की प्रशासनिक आदत !
25 जून 2026 को दिया गया परिवाद 02 जुलाई तक लटकाया जाता है। मुख्यमंत्री कार्यालय (CMO), गृह विभाग, डीजीपी और राजस्थान संपर्क पोर्टल (परिवाद सं. 072606727656347) तक गुहार लगाने के बावजूद भी अगर कार्रवाई सिफर रहती है, तो यह स्पष्ट करता है कि सिस्टम की नस-नस में भ्रष्टाचार का घुन लग चुका है।
प्रार्थी की स्पष्ठ मांग है कि
उच्चस्तरीय स्वतंत्र जांच करायें, पूर्व डीएसपी विनय कुमार चौधरी, एएसआई देवीलाल और संबंधित थानाधिकारियों की भूमिका की उदयपुर रेंज के किसी निष्पक्ष एवं वरिष्ठ अधिकारी से जांच कराई जाए । हस्ताक्षर सत्यापन (FSL Testing) किया जायें, पत्रांक 580 पर किए गए हस्ताक्षरों का फोरेंसिक (FSL) परीक्षण करवाकर फर्जीवाड़े का पर्दाफाश किया जाए । अनुकंपा नियुक्ति का पुनः परीक्षण किया जावें नगर परिषद में कार्यरत रमेश चंद्र चावला के नियुक्ति दस्तावेजों की गहनता से जांच की जाए । शासकीय रिकॉर्ड में कूटरचना (Forgery) और पद के दुरुपयोग के दोषी पुलिस अधिकारियों के खिलाफ तत्काल प्राथमिकी (FIR) दर्ज कर विभागीय अनुशासनात्मक कार्रवाई की जाए । यदि राज्य सरकार और गृह विभाग अब भी अपनी आंखें मूंदे रहता है, तो यह मान लिया जाएगा कि “कानून का राज” अब महज़ भाषणों तक सीमित रह गया है और राजस्थान पुलिस की वर्दी पर लगे इस दाग की चमक को छुपाना अब नामुमकिन है !