मुकेश्या नंद महाराज ………………….
एक बेबाक राजनीतिक व्यंग्य # 8 — आकाश शर्मा
स्मार्ट हलचल|चित्तौड़गढ़ नगर परिषद के चुनाव निपटते ही शहर की हवा में एक ही सवाल तैर रहा है—आखिरकार सभापति की कुर्सी पर बैठेगा कौन? मतदान खत्म होते ही दोनों ही प्रमुख दलों ने अपने-अपने ‘जिताऊ मोहरों’ को ऐसा भूमिगत किया कि मानों कोई गुप्त मिशन चल रहा हो। बाडेबंदी में बडी पार्टीयों के अलावा तीन लोग और है जिन्होने भी बाडेबंदी कर दी है……………. वार्डों से लेकर चौराहों तक बस कयासों का बाजार गर्म है और हर आम नागरिक इसी पशोपेश में है कि उसने अपने वार्ड का भविष्य अगले 5 साल के लिए किसके हाथ में सौंप दिया है। इसी उधेड़बुन में जब दिमाग का दही होने लगा, तो अचानक कानों में गूंजी मुकेश्यानंद महाराज की वह जानी-पहचानी गंभीर आवाज “वत्स! क्यों परेशान है? क्या प्रश्न है तुम्हारा ?” हमने भी बिना वक्त गंवाए हाथ जोड़े और बोल पड़े, “बाबाजी, शहर में बस एक ही चर्चा है कौन बनेगा सभापति ?” बाबाजी मंद-मंद मुस्कुराए और बोले, “वत्स! अभी वक्त बहुत है, पर तेरी जिज्ञासा थोड़ी शांत कर देता हूँ। तेरे मन में अभी भी वही चल रहा है “पान का बीड़ा, काला चश्मा… और बाऊजी के बड़े सपने !” हमने ताली बजाते हुए कहा, “बिलकुल सही बाबाजी! सपने देखना तो सबका अधिकार है ।” बाबाजी ने गंभीर मुद्रा धारण करते हुए कहा, “सपने देखना और उन्हें ईमानदारी से पूरा करना अच्छी बात है, तब तो परमात्मा भी साथ देता है। लेकिन अगर सपने पूरे करने के चक्कर में दूसरों के सपनों और हक के साथ खिलवाड़ किया जाए, तो क्या भगवान ऐसी इच्छा पूरी करेगा? जवाब दे !”हम तुरंत बोल उठे, “बिलकुल नहीं, बाबाजी !” बाबाजी ने आगे कहा, “इसीलिए वत्स, कुछ बातें गर्भ में ही रहें तो सबका भला है। वार्ड का भोला-भाला मतदाता जब वोट देता है, तो उसे क्या पता कि जिसे वो चुन रहा है, उसकी नीयत दूसरों के प्रति क्या है? जब असलियत सामने आती है, तो मतदाता खुद को ठगा सा महसूस करता है और सोचता है ‘मैंने अपने वार्ड को अगले 5 साल के लिए किस गड्ढे में डाल दिया ?’ इसी को तो राजनीति कहते हैं, वत्स !”
बाबाजी की बात सुनकर हमारी जिज्ञासा शांत होने के बजाय और भड़क उठी। हमने तुरंत अगला सवाल दाग दिया, “बाबाजी, मेरी प्यास अभी बुझी नहीं है। जरा यह तो बताइए कि इन अक्षरों— ‘अ’, ‘स’, ‘श’, ‘ह’, ‘र’—से जुड़े नामों और इनकी राशियों में आने वाले दिनों में क्या बड़ी उठापटक होने वाली है ?”
यह सुनकर बाबाजी जोरों से हंसे और बोले,”चतुर वत्स ! तेरी भावना मैं अच्छी तरह समझ गया हूँ । अभी तो मैं तुझे बस इतना ही संकेत दे रहा हूँ कि इनमें से एक का राजयोग साफ़ बन रहा है, लेकिन दो राशियों पर शनि की भारी छाया पड़ चुकी है ! एक को तो इस पूरे ड्रामे से कोई मतलब ही नहीं है, जबकि बाकी दोनों के बीच बाड़ेबंदी के भीतर जबरदस्त मंथन और घमासान होने वाला है ।” हमने गिड़गिड़ाते हुए कहा, “बाबाजी, कम से कम राशियाँ और थोड़े इशारे तो खोलिए !” बाबाजी ने हाथ का इशारा करते हुए कहा, “बेटा, थोड़ा धैर्य रख ! किसके सिर पर ताज सजेगा, इसका पूरा कच्चा-चिट्ठा भी खोलूंगा । सही वक्त आने दे, राशियाँ भी बताऊंगा और पूरा नाम भी बेनकाब करूँगा। तब तक शहर की इस बाड़ेबंदी का लुत्फ उठा !”