हल्दीघाटी युद्ध में हुई थी महाराणा प्रताप की स्पष्ट विजय, मुगलों को पड़ा था भागना: ओमप्रकाश

_समुत्कर्ष समिति की 147 वीं विचार गोष्ठी_

उदयपुर 16 जून
स्मार्ट हलचल।राष्ट्रवाद और वैचारिक चेतना को समर्पित अग्रणी संस्था ‘ समुत्कर्ष समिति ‘ की 147 वीं ऑनलाइन विचार गोष्ठी के मुख्य विषय ‘ हल्दीघाटी के अजेय योद्धा : वीर शिरोमणि महाराणा प्रताप’ पर बोलते हुए सुप्रसिद्ध मनीषी, प्रखर विचारक एवं ओजस्वी वाग्मी ओमप्रकाश ने कहा कि महाराणा प्रताप का चारित्रिक उत्कर्ष अत्यंत उज्ज्वल एवं अनुकरणीय था, जहाँ युद्ध की विभीषिका में भी नैतिक मूल्यों और मर्यादित आचरण को सर्वोपरि रखा गया। शत्रु पक्ष की महिलाओं के प्रति प्रदर्शित आदर-भाव उनके उदात्त चरित्र और भारतीय संस्कृति की पावन मर्यादा को उद्भासित करता है। वे आज महाराणा प्रताप की 486 वीं जयंती एवं हल्दी घाटी युद्ध के 450 वें स्मृति दिवस की पृष्ठभूमि में आयोजित गोष्ठी में बोल रहे थे।
उन्होंने कहा कियुद्ध कौशल की दृष्टि से वे विलक्षण गुरिल्ला (छापामार) युद्ध पद्धति के प्रणेता थे, जिसके चक्रव्यूह में फँसकर शत्रु की विशाल सैन्य वाहिनी भी छिन्न-भिन्न हो जाती थी। उनकी यही कालजयी युद्ध नीति, भीष्म प्रतिज्ञा और अभेद्य दूरदर्शिता उन्हें इतिहास के क्षितिज पर सदैव के लिए अमर और वंदनीय बनाती है।
ओमजी भाईसाहब के सारगर्भित पाथेय के अनुसार महाराणा प्रताप का संपूर्ण जीवन असीम शौर्य, अनन्य राष्ट्रभक्ति और अडिग स्वाभिमान की एक अनुपम साक्षात् गाथा है। वे केवल एक अद्वितीय योद्धा ही नहीं, अपितु एक अत्यंत *संवेदनशील प्रजापालक* थे, जिन्होंने अपनी *भीष्म प्रतिज्ञा* के अनुरूप राजप्रासादों के वैभव का परित्याग कर कंदराओं के कष्टप्रद जीवन को सहर्ष अंगीकार किया, किंतु राष्ट्र के गौरव को अक्षुण्ण रखा। समाज के अंतिम सोपान पर स्थित वनवासियों एवं भील सहोदरों को सस्नेह गले लगाकर, उन्हें राष्ट्र-रक्षा की मुख्यधारा में सम्मिलित करना उनके *सर्वसमावेशी एवं समरस नेतृत्व* का अप्रतिम परिचायक है।

मेवाड़ इतिहास के मर्मज्ञ ओमप्रकाश जी ने ऐतिहासिक तथ्यों के साथ प्रतिपादित किया कि *हल्दीघाटी युद्ध में महाराणा प्रताप की स्पष्ट विजय हुई थी* । हल्दीघाटी के मैदान में महाराणा प्रताप और उनके योद्धाओं के भयानक व भीषण आक्रमण के आगे मुगल सेना टिक नहीं सकी और वह पीठ दिखाकर भाग खड़ी हुई थी। इस युद्ध में सम्राट अकबर अपने *किसी भी मनसूबे में कामयाब नहीं हो सका* । वह न तो महाराणा प्रताप को पराभूत (पराजित) कर सका और न ही उन्हें बंदी बना पाया। युद्ध का परिणाम मुगलों के विपरीत आने के कारण अकबर अपने सेनापतियों से इतना नाराज हुआ कि उसने उनकी *ड्योढ़ी (दरबार में आना)* तक बंद कर दी थी। इसके चार महीने बाद अकबर को स्वयं विशाल सेना लेकर मेवाड़ पर चढ़ाई करने आना पड़ा था।

विचार गोष्ठी में शिक्षाविद् पीयूष दशोरा ने मंगलाचरण का पाठ किया l शिक्षाविद और विचारक सत्यप्रिय मैत्री ने प्रताप के जीवन वांग्मय एवं हल्दी घाटी युद्ध विजय का उल्लेख कर कहा कि महाराणा प्रताप के शौर्य और स्वाभिमान का इतिहास आज भी हर भारतीय की रगों में राष्ट्रप्रेम का संचार करता है l विचारक एवं विदुषी मंजू चौधरी ने भी इस अवसर पर अपने विचार व्यक्त किए l
समुत्कर्ष पत्रिका के उप संपादक गोविन्द शर्मा द्वारा ने मुख्य वक्ता ओमप्रकाश जी और ऑनलाइन जुड़े सभी संभागियों का धन्यवाद ज्ञापित करते हुए कहा कि गोष्ठी का यह विमर्श समाज को एक नई वैचारिक दिशा देगा। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि महाराणा प्रताप का यह जीवन संदेश जन-जन तक फैले। समुत्कर्ष विचार गोष्ठी का संचालन शिवशंकर खण्डेलवाल ने किया ।

इस ऑनलाइन विचार गोष्ठी में भागीरथ सिंह, मदन टांक, डॉ. परमेन्द्र दशोरा, अशोक पुरोहित, मगन जोशी, नन्द सिंह नरूका, दर्शना शर्मा, सोनल गांधी, लोकेश जोशी, प्रकाश चंद्र मेहता, नारायण उपाध्याय, हरीश बेरी, त्रिभुवन चौबीसा, डॉ. मृदुला तिवारी, गोपाल शर्मा, पृथ्वी राज राठी, दिनेश बंसल, भावना मोड, सुनील विश्नोई, गजेन्द्र आमेटा, रामेश्वर प्रसाद शर्मा, पुष्कर माली, वीणा जोशी, बंशीलाल, मुकेश मंत्री, नर्बदा देवी, संदीप आमेटा, हेमन्त सिंह, विनोद चपलोत तथा तरुण शर्मा सम्मिलित हुए।