(अंजनी सक्सेना )
स्मार्ट हलचल|हिन्दी साहित्य के सूर्य,भक्ति के समुद्र और लोक चेतना के शिल्पी गोस्वामी तुलसीदास का नाम आते ही करोड़ों कंठों में केवल राम-राम ही गूंजता है। इस महान संत ने अपनी लेखनी से न केवल रामकथा को घर-घर पहुंचाया, बल्कि बिखरते समाज को एक सूत्र में भी बांधा। इस प्रतिभापुंज संत ने अपने जीवन और कृतित्व से कलियुग में राम नाम की पताका घर घर में फहराने का विलक्षण कार्य किया।
हमारे धर्म ग्रंथों में कहा जाता है कि जब जब भगवान पृथ्वी पर अनाचार-अत्याचार की बढ़ती हुई आंधी को देखते हैं, तब-तब वे किसी महापुरुष को पृथ्वी पर भेजते हैं। उन्हीं महापुरुषों में महान संत तुलसीदास का अवतरण हुआ। उनकी शीतल-शांत ज्योत्सना से स्नात होकर देश का हिन्दू समाज कलिमल रहित और दैहिक-दैविक तापों से मुक्त हो नई आभा से खिल उठा। लोकनायक तुलसी भारतीय साधना और संस्कृति की तपःपूत निधि थे। उनकी भक्ति रस-वाणी जैसी मंगलकारिणी मानी गई, वैसी किसी और की नहीं। आज भी राजा से रंक तक हर घर में गोस्वामी जी का रामचरित मानस विराजता है।
हिन्दी के गौरव तिलक तुलसी का जन्म, वंश सभी मत-मतांतरों के घटाटोप से आच्छादित है। शिवसिंह सरोज, रामगुलाम द्विवेदी, डॉ. ग्रियर्सन, डॉ. माताप्रसाद गुप्त आदि विद्वान तुलसीदास जी का जन्म संवत् पंद्रह सौ नवासी विक्रमी मानते हैं जबकि बाबा वेणी माधव दास तथा बाबा रघुवर दास ‘गुसाईं-चरित’ के आधार पर गोस्वामी तुलसीदास का जन्म संवत् पंद्रह सौ चौवन विक्रमी सिद्ध करते हैं, जो प्रसिद्ध है।
पन्द्रह सौ चौवन बिसै कालिंदी के तीर।
श्रावण शुक्ल सप्तमी तुलसी धरयो शरीर॥
इस महान संत के जन्म स्थान राजापुर (बांदा) अथवा सोरो (एटा) के संबंध में भी विवाद है। किंतु बहुमत राजापुर के ही पक्ष में है। इसी प्रकार कोई सरयूपारीण, कोई कान्यकुब्ज तथा कोई सनाढ्य ब्राह्मण बताते हैं। पिताश्री आत्माराम एवं माता हुलसी लोक प्रसिद्ध हैं। इसी को देखकर श्री रहीम ने अपने इस दोहे में उल्लेख किया है:
सुरतिय, नरतिय, नागतिय सब चाहत अस होय।
गोद लिये हुलसी फिरै तुलसी सो सुत होय॥
इसमें कोई संदेह की बात नहीं कि संत की माता हुलसी थी। तुलसी का बाल्यकाल बहुत कठिनाइयों में व्यतीत हुआ था। अनाथ बालक ने मुसीबतों भरे अपने दिन काटे थे। इसकी झलक इनकी रचनाओं में भी देखने को मिलती है।
1. जनक जननि तज्यो जनमि, करम बिनु विधिहु सृज्यो अब डैरे।
2. मातु-पिता जिय जाहि तज्यो, विधिहु न लिखी कछु भाल भलाई।
3. तनु तज्यों कुटिल कीट ज्यों, तज्यो मातु पिता हूं।
4. बारे ते ललात बिललात द्वार-द्वार दीन, जानत हौं चारि फल चारि ही चाम कौ।
5. मांगि के खाइबो, मसीद को सोइबो, लेने को एक न देइबो को दूजो॥
उपर्युक्त उदाहरणों से सिद्ध होता है कि इनका बाल्यकाल अत्यंत विषम परिस्थितियों में गुजरा। उन्होंने पेट भरने के लिए दर-दर की ठोकरें खाईं और भिक्षा मांगनी पड़ी। बाल्यावस्था में ही माता-पिता का निधन, अथवा अभुक्त मूल नक्षत्र में जन्म के कारण परित्याग सहना पड़ा। इसी असहाय परिस्थिति में बाबा नरहरिदास से भेंट हुई। इन्हीं महान विभूतियों नरहरिदास ने तुलसी के पालन-पोषण, शिक्षा-दीक्षा की व्यवस्था की। इन्होंने ही तुलसी के हृदय में राम नाम के प्रेम रूपी बीज बोए। जैसा कि गोस्वामी जी ने स्वयं स्वीकार किया है:
“मैं पुनि निज गुरू सन सुनी कथा जो सूकर खेत।
समुझी नहीं तसि बालपन, तब अति रहेउं अचेत॥”
चौपाई – “तदपि कही गुरू बारम्बारा।
समुझि परी कछु मति अनुसारा॥”
कुछ समय पश्चात बाबा नरहरिदास इन्हें लेकर काशी पहुंचे। पंचगंगा घाट पर स्वामी रामानंद के स्थान पर ठहरे। यहीं पर अपने समय के महान विद्वान शेष सनातन रहे थे। जिन्होंने गोस्वामी जी को वेद, वेदांग, दर्शन, पुराण और अन्य शास्त्रों की शिक्षा दी। अनवरत अध्ययन के बाद गोस्वामी जी अपने जन्म स्थान राजापुर लौट आए और दीनबंधु पाठक की पुत्री रत्नावली के साथ पाणिग्रहण कर गृहस्थाश्रम में प्रवेश किया। तुलसी अपनी पत्नी पर बेहद अनुरक्त थे। विदुषी पत्नी द्वारा एक बार काव्यमय भर्त्सना किए जाने पर विरक्त होकर काशी चले गए और सन्यास ग्रहण कर लिया। राम भक्ति साहित्य सृजन और तीर्थ यात्रा इनके प्रिय कार्य हो गए। चित्रकूट में हनुमान जी की कृपा से तुलसीदास जी को हुए राम दर्शन विख्यात है। 1631 विक्रमी में रामचरित मानस की रचना आरंभ हुई और दो वर्ष सात माह में यह ग्रंथराज पूर्ण हुआ। अपने जीवन के उत्तर काल में पर्याप्त सम्मान प्राप्त हुआ। जिसके बारे में उन्होंने स्वयं लिखा-
1. घर-घर मांगे टूक, पुनि भूपति पूजे पांव।
2. तुलसी गुसाईं भयो, भोरे दिन भूल गया।
इनके प्रशंसकों और स्नेहियों में अब्दुर्रहीम खानखाना, महाराज मानसिंह, टोडरमल, बीरबल, भक्त नाभादास, मधुसूदन सरस्वती आदि थे। किंतु इनका सर्वाधिक स्नेह भदैनी (काशी) के भूमिहार जमींदार टोडर को प्राप्त था। गोस्वामी जी ने उनकी मृत्यु पर कुछ दोहे लिखे जो अकल्पित घटना थी। उनमें से एक दोहा है:
“तुलसी राम सनेह को सिर पर भारी भारू।
टोडर कांधा नहिं दियो, सब कहि रहे उतारू॥”
गोस्वामी जी भावलोक के सम्राट थे। रसों के अधिपति, मौलिक उद्भावनाओं के धनी और कल्पना जगत के अधिष्ठाता थे। कौन-सा ऐसा क्षेत्र है जहां तुलसी की पहुंच नहीं, कौन सा जीवन का पक्ष है जिसको तुलसी की दृष्टि ने छुआ नहीं। काव्य विधा में व्यापक रूप से तुलसी छाए हुए हैं। तुलसी की संपूर्ण कविता भक्ति काव्य है। राम भक्ति तुलसी की श्वासों का धन है जो उनके जीवन और कृतित्व में स्थापित है। राम का गुणगान कर अपने दैन्य को अनेक प्रसंगों में अनेक प्रकार से व्यक्त किया है। दास्य भाव की भक्ति दैन्य और आत्मग्लानि की भावनाओं पर आधारित होती है। तुलसी उसमें अति सफल हैं। देखिए एक झलक –
“तुमसो बड़ो है कौन, मोसो कौन छोटो।
तुम सो खरो है कौन, मोसो कौन खोटो॥”
ईश्वर के महत्व और भक्त के दैन्य का इससे स्पष्ट वर्णन और क्या हो सकता है। वैसे तुलसी सभी देवी-देवताओं के प्रति विनीत थे परन्तु उनका मुख्य लक्ष्य था उनके माध्यम से राम कृपा की कामना। कृपासिंधु सर्वव्यापक गणपति की वंदना करते हुए भी कहते हैं:
“मांगत तुलसीदास कर जोरे।
बसहु रामसिय मानस मोरे॥”
तुलसी ने राम जन्म का कारण रामचरित मानस में स्पष्ट किया है:
“असुर मारि थापहिं सुरहिं, राखहिं निज श्रुति सेतु।
जग विस्तारहिं बिमल जस, राम जन्म कर हेतु॥”
ऐसे राम भक्त तुलसी की भक्ति स्वार्थ के लिए नहीं अपितु जन कल्याण सिद्धि और धर्म वृद्धि के लिए हुई। बहुजन हिताय है तुलसी की भक्ति। तुलसी धर्म के माध्यम से विराट हिन्दू जाति को संगठित करना चाहते थे। उस समय संपूर्ण हिन्दू जाति विश्रृंखलित, विच्छिन्न, आदर्शहीन और लक्ष्यहीन हो रही थी। धार्मिक, सामाजिक और दार्शनिक भेदभाव हिन्दू जाति को खंड-खंड में विभाजित करने को तत्पर थे। तुलसीदास ने इस फैलते-फूटते समाज को अपनी काव्यधारा से खींचकर संगठित कर दिया। तुलसी के समय शैव और वैष्णवों में परस्पर बैर था। दक्षिण में तो शिव कांची और विष्णु कांची के नाम से धार्मिक बंटवारा ही हो चुका था। तुलसी ने इस विद्वेष को प्रेम में बदलने का सफल प्रयत्न किया। राम को शिव भक्त बताकर तुलसी राम के शब्दों में कहलाते हैं:
शिव द्रोही मम दास कहावा।
सो नर सपनेहु मोहि न भावा॥
इसी प्रकार ब्रह्मा के लिए “अगुनहिं सगुनहिं नहि कछु भेदा” कहकर सगुण-निर्गुण के विवाद को समाप्त करने की चेष्टा की गई है। कहां तक कहा जाए, तुलसी का समन्वय क्षेत्र जीवन की तरह विशाल और व्यापक है। गोस्वामी तुलसीदास हिन्दी के सर्वश्रेष्ठ कवि हैं। उनमें यदि अपना पांडित्य, सार, गंभीर मननशीलता, उदारता और समन्वयवादिता है, तो कबीर जैसी सशक्तता, जायसी सी प्रबंध पटुता व कोमलता और सूरदास की सूक्ष्मदर्शिता भी है। हम उनके काव्य की भाषा पर दृष्टिपात करें तो तुलसी संस्कृत, अवधी और ब्रज भाषा में सफलता के साथ कविता करते दृष्टिगत होते हैं। संस्कृत उस समय पंडितों की भाषा थी। तुलसी का उस पर पूर्ण अधिकार था। यह मानस के हर कांड के प्रारंभिक श्लोकों से सहज ही ज्ञात होता है। तुलसी की भाषा ब्रज, सूर से अधिक कोमल, सानुप्रास और प्रौढ़ है। अवधी में मानस और बरवै रामायण की रचना हुई है तो कवितावली, गीतावली एवं विनय पत्रिका आदि ब्रज भाषा में रची गईं। वैसे तो तुलसी के काव्य ग्रंथों की संख्या सैंतीस को भी पार करती है। किंतु तुलसी के इन बारह ग्रंथों को ही प्रमाणित माना जाता है, वे हैं- (1) रामचरित मानस (2) विनय पत्रिका (3) कवितावली (4) गीतावली (5) दोहावली (6) रामलला नहछू (7) पार्वती मंगल (8) जानकी मंगल (9) बरवै रामायण (10) बैराग्य संजीवनी (11) कृष्ण गीतावली (12) रामाज्ञा प्रश्नावली। सम्वत 1680 वि. में भारत के भाग्य क्षितिज से यह दैदीप्यमान ज्योतिपुंज लुप्त हो गया।
संवत सोलह सौ असी, असी गंग के तीर।
श्रावण शुक्ल सप्तमी तुलसी तज्यो शरीर॥
लेकिन बाबा बेनीमाधव के गुसाईं चरित्र में दूसरी पंक्ति इस प्रकार है-
श्रावण श्यामा तीज शनि तुलसी तज्यो शरीर।
राजा टोडरमल के वंशज गोस्वामी जी की स्मृति में आज भी श्रावण कृष्ण तृतीया को ब्राह्मणों को सीधा दिया करते हैं इसलिए यही तिथि प्रमाणिक मानी जाती है
