डा. भीमराव अम्बेडकर युवा संगठन एवं दलित घुमंतू अधिकार मंच के पदाधिकारियों ने जुलूस में शामिल होकर दी मुबारकबाद
किशन खटीक/
स्मार्ट हलचल|रायपुर27 अगस्त पैगम्बर हजरत मोहम्मद साहब के जन्मदिवस की याद में मनाए जाने वाले ईद-ए-मिलाद-उन-नबी (मौलिद) के अवसर पर रायपुर कस्बे में मुस्लिम समाज की ओर से भव्य जुलूस निकाला गया। जुलूस में बड़ी संख्या में मुस्लिम समाज के लोग शामिल हुए। हाथों में धार्मिक झंडे लिए लोग उत्साह के साथ जुलूस में आगे बढ़े। इस दौरान पूरे कस्बे में धार्मिक उत्साह के साथ-साथ आपसी भाईचारे और सामाजिक सौहार्द का माहौल देखने को मिला।
जुलूस में डा. भीमराव अम्बेडकर युवा संगठन संस्था रायपुर एवं दलित घुमंतू अधिकार मंच राजस्थान की ओर से ज्ञानचंद खटीक अध्यक्ष डा भीमराव अम्बेडकर युवा संगठन रायपुर, पुनम नाथ सपेरा प्रदेश अध्यक्ष दलित घुमंतू अधिकार मंच राजस्थान,राजू भील कोशिथल, मुकेश बलाई,रोशन बैरवा,विनोल कुमार हरीजन,लाडुनाथ कालबेलिया,अनाड नाथ कालबेलिया,रामदेव सपेरा एवं नारायण रेगर बोराणा सहित अन्य सामाजिक कार्यकर्ताओं ने शिरकत की। उन्होंने मुस्लिम समाज के लोगों को ईद-ए-मिलाद-उन-नबी की मुबारकबाद देते हुए आपसी प्रेम, भाईचारे और सामाजिक एकता का संदेश दिया।
इस अवसर पर दरगाह अंजुमन कमेटी रायपुर के सदर वसीम अकरम पठान, पूर्व सदर हारून मोहम्मद छीपा, पूर्व सदर जमिल खां पठान, बाबू भाई मंसुरी एवं चांद खां पठान ,इरफान मंसुरी,इमरान पठान (बबलु)सहित समाज के अन्य प्रमुख लोगों की दस्तारबंदी की गई। उन्हें माला पहनाकर एवं केले वितरित कर सम्मान और मुबारकबाद दी गई। कार्यक्रम में मौजूद लोगों ने एक-दूसरे के साथ खुशियां साझा कीं और देश में अमन-चैन तथा खुशहाली की दुआ मांगी।
पैगम्बर हजरत मोहम्मद साहब के जीवन और संदेश को किया याद
ईद-ए-मिलाद-उन-नबी इस्लाम धर्म में पैगम्बर हजरत मोहम्मद साहब के जन्म की याद से जुड़ा अवसर है। इस दिन मुस्लिम समाज के लोग उनके जीवन, शिक्षाओं और मानवता के लिए दिए गए संदेशों को याद करते हैं। परंपरागत इस्लामी विवरणों के अनुसार हजरत मोहम्मद साहब का जन्म मक्का में लगभग 570 ईस्वी में हुआ था। उनका पूरा नाम मोहम्मद इब्न अब्दुल्लाह बताया जाता है।
इस्लामी परंपरा में उन्हें अल्लाह का अंतिम पैगम्बर माना जाता है। उनके जीवन का बड़ा हिस्सा लोगों को एकेश्वरवाद, इंसाफ, दया, ईमानदारी, जरूरतमंदों की मदद, पड़ोसियों के अधिकार और मानवता के प्रति जिम्मेदारी का संदेश देने में बीता। उनके संदेशों में समाज के कमजोर और जरूरतमंद लोगों के साथ न्यायपूर्ण व्यवहार तथा आपसी भाईचारे पर विशेष जोर दिया गया।
हजरत मोहम्मद साहब के जीवन से जुड़े प्रसंगों में सत्य, क्षमा, धैर्य, करुणा और न्याय को महत्वपूर्ण माना जाता है। उनके अनुयायी उनके जीवन और शिक्षाओं को अपने धार्मिक एवं सामाजिक जीवन में मार्गदर्शक मानते हैं।
ईद-ए-मिलाद-उन-नबी के अवसर पर कई स्थानों पर जुलूस, धार्मिक कार्यक्रम, नात, तकरीर और जरूरतमंदों की सहायता जैसे कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। हालांकि इस अवसर को मनाने की तारीख और तौर-तरीकों को लेकर मुस्लिम समुदाय की विभिन्न परंपराएं भी हैं। सुन्नी परंपरा में आम तौर पर 12 रबी-उल-अव्वल को पैगम्बर मोहम्मद साहब की पैदाइश से जोड़ा जाता है।
रायपुर में दिखा सामाजिक सद्भाव
रायपुर में निकले जुलूस के दौरान सामाजिक एकता और आपसी भाईचारे की तस्वीर भी देखने को मिली। अलग-अलग सामाजिक संगठनों से जुड़े लोगों ने जुलूस में शामिल होकर मुस्लिम समाज को शुभकामनाएं दीं। ज्ञानचंद खटीक सहित सामाजिक कार्यकर्ताओं ने कहा कि धार्मिक पर्व केवल धार्मिक आस्था से जुड़े अवसर ही नहीं होते, बल्कि इनके माध्यम से समाज में प्रेम, भाईचारे और एक-दूसरे के प्रति सम्मान की भावना को भी मजबूत किया जा सकता है।
उन्होंने कहा कि भारत की पहचान विभिन्न धर्मों, समुदायों और संस्कृतियों के साथ मिल-जुलकर रहने की रही है। सभी समुदायों को एक-दूसरे के धार्मिक आयोजनों का सम्मान करते हुए शांति, सद्भाव और सामाजिक एकता को मजबूत करने की दिशा में आगे बढ़ना चाहिए।
अमन-चैन की मांगी दुआ
कार्यक्रम के दौरान मौजूद लोगों ने देश और प्रदेश में शांति, खुशहाली एवं आपसी भाईचारे की कामना की। लोगों ने कहा कि समाज में नफरत और भेदभाव की जगह प्रेम, इंसानियत और सद्भाव को बढ़ावा दिया जाना चाहिए। जुलूस में मुस्लिम समाज के साथ सामाजिक कार्यकर्ता एवं अन्य लोग भी मौजूद रहे।
ईद-ए-मिलाद-उन-नबी के इस अवसर पर रायपुर में आयोजित कार्यक्रम ने धार्मिक आस्था के साथ सामाजिक भाईचारे और आपसी सम्मान का संदेश दिया। जुलूस के दौरान लोगों में उत्साह दिखाई दिया और पूरे आयोजन में अमन-चैन की दुआ के साथ एक-दूसरे को मुबारकबाद देने का सिलसिला चलता रहा।
