ठेकेदारों से नेताओं और अधिकारियों की कमाई के लालच से भ्रष्टाचार का पर्याय बना कानपुर नगर निगम

सुनील बाजपेई
कानपुर। स्मार्ट हलचल|यहां का नगर निगम भ्रष्टाचार का पर्याय बना हुआ है। जिसकी वजह है ठेकेदारों के माध्यम से नेताओं और अधिकारियों की कमाई का लालचl यह खेल करोड़ों रुपये के टेंडरों के माध्यम से चल रहा था, लेकिन रंग में भंग तब हो गया जब इस खेल की जानकारी मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को हो गई अधिकारियों के पेंच कस दिए। कुल मिलाकर उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की सख्ती के बाद नगर निगम की ठेकेदारी व्यवस्था की परतें खुलने लगी हैं।
जहां तक अब तक की गई कार्रवाई का सवाल है शुरुआती जांच में करीब 100 करोड़ रुपये से अधिक के टेंडर निरस्त किए जा चुके हैं। सात फर्मों को ब्लैकलिस्ट किया गया है और छह मुकदमे दर्ज हो चुके हैं। दो ठेकेदार गिरफ्तार किए जा चुके हैं, जबकि पूरे सिंडिकेट का कथित सरगना गोविंद शर्मा फरार है।
जांच में टेंडर हासिल करने के तरीके को लेकर भी चौंकाने वाली बातें सामने आई हैं ।
पुलिस के मुताबिक, ठेकेदारों का एक सिंडिकेट सक्रिय था । आरोप है कि इसी सिंडिकेट के जरिए तय किया जाता था कि किस काम का टेंडर कौन डालेगा और किस फर्म को काम मिलेगा. कई मामलों में करीब 15 फीसदी कम रेट पर टेंडर डलवाने और फिर तय फर्म को काम दिलाने का खेल होने की बात सामने आई है।
पुलिस के अनुसार, कुछ ठेकेदारों पर दबाव बनाया जाता था और दूसरे लोगों को टेंडर प्रक्रिया से दूर रखने की कोशिश होती थी. जांच में लकी ड्रॉ के नाम पर टेंडर मैनेज किए जाने की बात भी सामने आई है। हालांकि इन आरोपों की पूरी सच्चाई एसआईटी की जांच के बाद ही साफ होगी।
मामला सामने आने के बाद नगर निगम ने करीब 100 करोड़ रुपये के टेंडर निरस्त कर दिए हैं. विकास कार्यों से जुड़े भुगतान पर भी रोक लगाई गई है। नई फर्मों के पंजीकरण की प्रक्रिया पर भी रोक लगा दी गई है।
इस दौरान पुलिस ने दिलीप बाजपेई, अजय इंटरप्राइजेज, पारसनाथ बिल्डर्स, कैला इंटरप्राइजेज, तिरुपति ट्रेडर्स और जगदंबा इंटरप्राइजेज समेत फर्मों के खिलाफ मुकदमे दर्ज किए हैं. जगदंबा इंटरप्राइजेज के खिलाफ दो मुकदमे दर्ज हुए हैं।
एसआईटी अब सिर्फ ठेकेदारों तक सीमित नहीं है. नगर निगम के अधिकारियों और कर्मचारियों की भूमिका भी जांची जा रही है। टीम ने टेंडर, भुगतान, फर्म पंजीकरण और विकास कार्यों से जुड़ी फाइलें मांगी हैं। नगर निगम में अधिकारियों से पूछताछ कर यह जानने की कोशिश की जा रही है कि अगर टेंडर प्रक्रिया में गड़बड़ी हो रही थी तो जिम्मेदार अधिकारियों को इसकी जानकारी क्यों नहीं हुई। इस सवाल के जवाब मेंअधिकारियों की भी मिली भगत मानी जा रही है।