जन्माष्टमी केवल उत्सव नहीं, अपने भीतर के कृष्ण को खोजने का अवसर

✍️ विवेक वैष्णव

स्मार्ट हलचल|आधी रात होगी, मंदिरों के पट खुलेंगे। शंखनाद होगा, घंटियां एक साथ गूंज उठेंगी, हजारों कंठों से जयघोष होगा – ‘‘नंद के आनंद भयो, जय कन्हैया लाल की।’’ कहीं कृष्ण की बाल लीलाओं की झांकियां सजी होंगी, कहीं दही-हांडी फूटेगी और कहीं कान्हा के जन्म का इंतजार होगा। लेकिन उस आधी रात, जब पूरा वातावरण कृष्णमय होगा, क्या हम अपने भीतर भी एक सवाल उठाएंगे?
‘‘क्या कृष्ण इस बार हमारे भीतर भी जन्मेंगे ?’’
यह सवाल इसलिए जरूरी है क्योंकि कृष्ण को माखन चुराते देखना आसान है, उनकी बांसुरी सुनना सुखद है, उनकी झांकी सजाना आनंद देता है और उनके नाम का जयघोष करना आस्था का हिस्सा है। लेकिन ‘‘कृष्ण के विचारों को अपने जीवन में उतारना कठिन है।’’ क्योंकि वहां केवल भक्ति नहीं, विवेक चाहिए। केवल प्रेम नहीं, साहस चाहिए। केवल पूजा नहीं, कर्म चाहिए। और केवल बांसुरी नहीं, जरूरत पड़ने पर ’’सुदर्शन उठाने का संकल्प’’ भी चाहिए। यही जन्माष्टमी का सबसे बड़ा प्रश्न और शायद सबसे बड़ा संदेश है।

*‘‘जब जीवन कुरुक्षेत्र बन जाए’’*
अर्जुन के सामने कुरुक्षेत्र की युद्धभूमि थी। हाथ में गांडीव था लेकिन मन संशय से भरा था। आज का मनुष्य युद्धभूमि में नहीं खड़ा है फिर भी उसके भीतर एक अलग कुरुक्षेत्र लगातार चल रहा है। नौकरी का दबाव, आर्थिक असुरक्षा, रिश्तों की उलझन, प्रतिस्पर्धा, असफलता का भय, भविष्य की अनिश्चितता और हर पल दूसरों से आगे निकलने की बेचैनी – आज के मनुष्य का कुरुक्षेत्र यही है। तब अर्जुन युद्ध को लेकर विचलित था, आज मनुष्य जीवन को लेकर विचलित है। तब कृष्ण ने अर्जुन से कहा कि निर्णय से भागना समाधान नहीं है। आज भी यही संदेश उतना ही प्रासंगिक है।
हमने सफलता को इतना बड़ा बना दिया है कि असफलता हमें अपराध जैसी लगने लगी है। सोशल मीडिया ने दूसरों की उपलब्धियों को हमारी असफलताओं का आईना बना दिया है। ऐसे समय में कृष्ण का कर्मयोग हमें याद दिलाता है – ‘‘कर्म हमारे हाथ में है, परिणाम नहीं।’’ इसका अर्थ निष्क्रिय रहना नहीं, बल्कि परिणाम की चिंता में अपने वर्तमान को नष्ट न करना है। अपने हिस्से का कर्म पूरी ईमानदारी और क्षमता से करना ही वास्तविक साधना है।

*‘ कृष्ण केवल बांसुरी नहीं, सुदर्शन भी हैं*
हमने कृष्ण की छवि को अक्सर बांसुरी, मोरपंख और माखन की मटकी तक सीमित कर दिया है। यह कृष्ण का सुंदर रूप है लेकिन पूरा कृष्ण नहीं। कृष्ण प्रेम भी हैं और प्रतिरोध भी। कृष्ण करुणा भी हैं और रणनीति भी। कृष्ण मित्रता भी हैं और नेतृत्व भी। कृष्ण बांसुरी भी हैं और सुदर्शन भी। जहां प्रेम से बात बन सकती है वहां प्रेम का रास्ता चुनना कृष्ण की दृष्टि है। लेकिन जहां अन्याय व्यवस्था बन जाए वहां केवल मौन रहना भी समाधान नहीं। आज समाज में सुविधानुसार चुप रहना आसान होता जा रहा है। गलत देखकर आंखें फेर लेना, अन्याय पर यह सोचकर चुप रहना कि ‘‘हमें क्या लेना-देना’’, और अपने स्वार्थ के लिए सच से समझौता कर लेना – ये आज के समय के नए कंस हैं।
‘‘कंस अब किसी एक सिंहासन पर नहीं बैठा है।’’ वह कहीं अहंकार में है, कहीं लालच में, कहीं हिंसा में, कहीं नफरत में और कहीं उस खामोशी में, जो गलत होते देखकर भी हमें निष्क्रिय बनाए रखती है। इसलिए कृष्ण का जन्म केवल अत्याचार करने वाले कंस के अंत की कथा नहीं है। यह उस चेतना के जन्म की कथा भी है, जो अन्याय के सामने खड़े होने का साहस देती है।

*‘‘ कृष्ण किसी एक भूमिका में नहीं बंधे’’*
कृष्ण को समझना आसान नहीं है क्योंकि वे किसी एक भूमिका में सीमित नहीं होते। वे यशोदा के नटखट कान्हा हैं, ग्वाल-बालों के सखा हैं, राधा के कृष्ण हैं, सुदामा के मित्र हैं, अर्जुन के सारथी हैं और आवश्यकता पड़ने पर अन्याय के विरुद्ध रणनीतिकार भी हैं। यही कृष्ण की सबसे बड़ी खूबी है -‘‘परिस्थितियां बदलती हैं तो भूमिका बदल सकती है लेकिन मूल मूल्य नहीं।’’ जीवन में हर परिस्थिति का एक ही समाधान नहीं होता। कभी प्रेम की जरूरत होती है, कभी धैर्य की, कभी संवाद की और कभी कठोर निर्णय की। कृष्ण हमें यही विवेक देते हैं कि ‘‘परिस्थितियों के गुलाम मत बनो, उन्हें समझो और सही निर्णय लो।’’

*युवाओं को कृष्ण की दृष्टि चाहिए*
आज युवा के हाथ में स्मार्टफोन है। दुनिया उसकी हथेली पर है। सूचना पहले से कहीं ज्यादा है, अवसर पहले से कहीं ज्यादा हैं लेकिन दिशा का संकट भी उतना ही बड़ा है। हर दिन सफलता के हजारों मॉडल उसके सामने आते हैं। हर कोई कुछ बनना चाहता है लेकिन बहुत कम लोग यह सोचते हैं कि ‘‘उन्हें वास्तव में बनना क्या है।’’ कृष्ण अर्जुन से किसी और जैसा बनने के लिए नहीं कहते। वे उसे उसका अपना कर्तव्य पहचानने के लिए प्रेरित करते हैं। यही आज के युवा की सबसे बड़ी जरूरत है।
दूसरों की जिंदगी से अपनी जिंदगी की तुलना करने के बजाय अपनी क्षमता को पहचानना। असफलता से टूटने के बजाय उससे सीखना। कठिन परिस्थितियों से भागने के बजाय उनका सामना करना। और सफलता को केवल पैसा, पद या प्रसिद्धि से नहीं बल्कि अपने उद्देश्य और योगदान से मापना। कृष्ण का जीवन संघर्ष से भरा था, फिर भी कृष्ण परिस्थितियों के सामने झुके नहीं। ‘‘यही आज की पीढ़ी के लिए सबसे बड़ा संदेश है।’’

*‘‘आज फिर कृष्ण जन्मेंगे, लेकिन कहां…?*
कृष्ण हर उस दौर के लिए जरूरी हैं जिसमें मनुष्य सही और गलत के बीच खड़ा होकर निर्णय लेने में हिचकता है। आज भी हमें ऐसे कृष्ण की जरूरत है जो कहें – डरो मत, भागो मत, भ्रम में मत जियो, अपने कर्म को पहचानो, अन्याय के सामने मत झुको और परिणाम की चिंता में अपना वर्तमान मत खोओ। जन्माष्टमी ‘‘मनुष्य के भीतर विवेक के जन्म का अवसर’’ है। इस बार आधी रात को जब मंदिरों में कृष्ण जन्म का जयघोष हो तो एक सवाल अपने भीतर भी उठाएं – ‘‘क्या कृष्ण हर उस मनुष्य के भीतर जन्म लेने की प्रतीक्षा कर रहे हैं जो सत्य, कर्म और न्याय का रास्ता चुनने को तैयार है?’’