प्रचार थमा, अब मतपेटी बताएगी जहाजपुर में किसका चलेगा सिक्का
सत्ता के मजबूत समीकरण के बावजूद भाजपा के सामने स्थानीय चुनौती, कांग्रेस की सीमित सक्रियता चर्चा में; 43 निर्दलीयों ने मुकाबले को बनाया दिलचस्प
अलकेश पारीक
जहाजपुर, स्मार्ट हलचल। नगर पालिका चुनाव का प्रचार अभियान बुधवार शाम 5 बजे थम गया। अब प्रत्याशियों के पास बड़े-बड़े चुनावी मंचों और प्रचार वाहनों का शोर नहीं, बल्कि मतदाताओं से व्यक्तिगत संपर्क का दौर है। 11 सितंबर को होने वाले मतदान से पहले जहाजपुर की सियासी तस्वीर पर नजर डालें तो मुकाबला किसी एक पार्टी के पक्ष में पूरी तरह झुका हुआ दिखाई नहीं दे रहा।
भाजपा के पास केंद्र और राजस्थान की सत्ता के साथ जहाजपुर के भाजपा विधायक का मजबूत राजनीतिक आधार है। इसके बावजूद स्थानीय चुनाव में भाजपा के सामने सबसे बड़ी चुनौती स्थानीय समीकरण और बड़ी संख्या में मैदान में उतरे निर्दलीय प्रत्याशी हैं।
43 निर्दलीयों ने बढ़ाई दोनों दलों की चिंता
इस बार नगर पालिका चुनाव में 43 निर्दलीय प्रत्याशी मैदान में हैं। इनमें करीब 20 प्रत्याशी अलमारी चुनाव चिह्न पर चुनाव लड़ रहे हैं। पूर्व नगरपालिका अध्यक्ष नरेश मीणा और कांता मीणा का नाम भी अलमारी चुनाव चिह्न से जुड़ी चुनावी चर्चा में प्रमुखता से सामने आया है।
निर्दलीयों की इतनी बड़ी संख्या ने भाजपा और कांग्रेस दोनों के सामने वोटों के बंटवारे का नया समीकरण खड़ा कर दिया है। कई वार्डों में मुकाबला पार्टी के नाम से ज्यादा प्रत्याशी की व्यक्तिगत पकड़, संपर्क और स्थानीय छवि पर निर्भर करता दिखाई दे रहा है।
भाजपा के पास सत्ता, लेकिन चुनाव में स्थानीय मुद्दे हावी
भाजपा के लिए परिस्थितियां कागज पर मजबूत हैं। केंद्र और राज्य में भाजपा की सरकार है और स्थानीय विधायक भी भाजपा से हैं। इसके बावजूद नगरपालिका चुनाव में मतदाता केवल सत्ता के समीकरणों के आधार पर फैसला करेंगे, यह कहना मुश्किल है।
नगरपालिका चुनावों में स्थानीय मुद्दे, वार्ड की समस्याएं, व्यक्तिगत रिश्ते और प्रत्याशी की पहुंच अक्सर बड़े राजनीतिक समीकरणों पर भारी पड़ जाते हैं। जहाजपुर में भी यही तस्वीर चुनाव प्रचार के दौरान देखने को मिली।
कांग्रेस की सक्रियता रही चर्चा का विषय
कांग्रेस के लिए भी यह चुनाव चुनौतीपूर्ण नजर आया। कांग्रेस नेता धीरज गुर्जर की जहाजपुर में करीब दो दिन की चुनावी सक्रियता राजनीतिक चर्चाओं का विषय रही। इसके बाद भी कांग्रेस पूरे चुनाव अभियान में भाजपा के मुकाबले कितना प्रभावी माहौल बना पाई, इसका फैसला अब मतदाता करेंगे।
कांग्रेस के सामने जहां भाजपा की सत्ता और संगठन की चुनौती है, वहीं निर्दलीयों की मजबूत मौजूदगी ने उसके पारंपरिक वोट बैंक के समीकरण को भी प्रभावित करने की संभावना पैदा की है।
असली खेल अब मतदान के बाद
जहाजपुर नगरपालिका चुनाव की सबसे दिलचस्प बात यह है कि यहां केवल भाजपा और कांग्रेस की जीत-हार पर नजर नहीं है। निर्दलीय कितनी सीटें जीतते हैं, यही आने वाले समय में बोर्ड गठन के गणित को प्रभावित कर सकता है।
यदि निर्दलीयों का प्रदर्शन मजबूत रहता है तो चुनाव परिणाम के बाद उनकी भूमिका अहम हो सकती है। ऐसे में आज प्रचार थमने के साथ ही असली राजनीतिक गणित शुरू हो गया है।
अब न नारों का शोर है, न रैलियों की भीड़। प्रत्याशी मतदाताओं के मन को पढ़ने की कोशिश कर रहे हैं और राजनीतिक दल अपने-अपने बूथों के गणित को मजबूत करने में जुटेंगे।
जहाजपुर में सत्ता का समीकरण भाजपा के पक्ष में जरूर है, लेकिन स्थानीय चुनाव की जमीन पर निर्दलीयों की मजबूत मौजूदगी ने मुकाबले को खुला रखा है। अब 11 सितंबर को मतदाता किसे अपना समर्थन देते हैं और किसके पक्ष में नगरपालिका का बोर्ड बनाने का रास्ता साफ होता है—इसका जवाब मतपेटियां ही देंगी