मानसून की विदाई या आखिरी इम्तिहान?

जाते-जाते भी तबाही मचा रहा मौसम, चार धाम यात्रा स्थगित, बादलों ने फिर याद दिलाई इंसान की औकात
@शाश्वत तिवारी

स्मार्ट हलचल|मानसून अब विदाई की तैयारी में है। लेकिन जाते-जाते उसका मिजाज कुछ ऐसा हो गया है, जैसे कोई मेहमान दरवाजे तक पहुंचकर अचानक पलट जाए और कहे, “जाने से पहले एक बात और कहनी थी,” और फिर वह बात खत्म होने का नाम ही न ले।
बादल लगातार बरस रहे हैं। पहाड़ों में रास्ते बाधित हैं, चारधाम यात्रा पर मौसम की मार पड़ी है, मैदानों में जलभराव है और शहरों की सड़कों पर यातायात की रफ्तार थम-सी गई है। आम आदमी आसमान की ओर देखकर बस इतना पूछ रहा है, “भाई, यह विदाई है या जाते-जाते आखिरी इम्तिहान?”
मानसून हमें हर वर्ष एक महत्वपूर्ण संदेश देता है।
प्रकृति को नियंत्रित करने की हमारी क्षमता सीमित है, लेकिन उसके प्रभावों से होने वाले नुकसान को कम करने की हमारी क्षमता बहुत बड़ी हो सकती है। बेहतर जलनिकासी व्यवस्था। नालों की समय पर सफाई। जलभराव वाले क्षेत्रों की वैज्ञानिक पहचान। मजबूत सड़कें। पर्वतीय क्षेत्रों में सुरक्षित यात्रा प्रबंधन। समय पर मौसम चेतावनी। स्थानीय प्रशासन की त्वरित प्रतिक्रिया। और सबसे महत्वपूर्ण, आम नागरिकों में जागरूकता। आपदा केवल प्रशासन की जिम्मेदारी नहीं और केवल नागरिक की भी नहीं।
सुरक्षित समाज प्रशासन और नागरिक, दोनों की साझी जिम्मेदारी से बनता है।
बारिश को रोका नहीं जा सकता। लेकिन बारिश के पानी को संकट बनने से काफी हद तक रोका जा सकता है।
बारिश प्रकृति का वरदान है। खेतों के लिए जीवन है, नदियों के लिए प्रवाह है और धरती के लिए नई ऊर्जा। लेकिन जब यही बारिश असामान्य रूप ले लेती है तो वरदान और संकट के बीच की दूरी बहुत छोटी रह जाती है। और इस बार फिर वही हुआ है। चारधाम की यात्रा किसी सामान्य पर्यटन यात्रा का नाम नहीं है। यह लाखों श्रद्धालुओं के लिए आस्था, तपस्या और वर्षों की प्रतीक्षा का विषय होती है। किसी ने महीनों पहले टिकट बुक कराया होगा। किसी ने छुट्टी की व्यवस्था की होगी। किसी ने यात्रा के लिए बचत की होगी। किसी बुजुर्ग ने मन में सोचा होगा, “जीवन में एक बार बद्रीनाथ के दर्शन हो जाएं।” किसी बच्चे ने घर से निकलते समय कहा होगा, “पापा, मेरे लिए खिलौने, प्रसाद जरूर लाना।” किसी परिवार ने बैग बांध लिए होंगे, किसी ने यात्रा का पूरा कार्यक्रम बना लिया होगा और किसी ने भगवान के दर्शन की कल्पना में ही आधी यात्रा पूरी कर ली होगी। लेकिन फिर मौसम ने करवट बदली और एक सरकारी सूचना आई,
“भारी बारिश के कारण यात्रा स्थगित।” एक वाक्य। लेकिन उस एक वाक्य के पीछे कितने लोगों की योजनाएं, उम्मीदें और भावनाएं ठहर जाती हैं, इसका हिसाब किसी मौसम विभाग के आंकड़े में नहीं मिलता। श्रद्धालु शिकायत भी करे तो किससे करे? वह तो भगवान के दर्शन के लिए जा रहा था। रास्ते में उसे मानसून मिल गया।
शहरों में बारिश होते ही एक दूसरा दृश्य सामने आता है। कल तक जिस सड़क पर विकास की रफ्तार दिखाई देती थी, आज उसी सड़क पर पानी का साम्राज्य दिखाई देता है। कहीं जलभराव, कहीं जाम, कहीं खुले मैनहोल का खतरा और कहीं गड्ढों में भरा इतना पानी कि सड़क और तालाब के बीच अंतर करना मुश्किल हो जाए। ड्राइवर अब सड़क पर यह नहीं देखता कि रास्ता कितना लंबा है। वह देखता है, “पानी कितना गहरा है?” जिस जगह कल गड्ढा था, आज वहां पानी है। और पानी ने गड्ढे को भी ऐसी पहचान दे दी है कि वह अब गड्ढा नहीं, एक “भौगोलिक रहस्य” लगता है। कोई पूछता है, “सड़क कहां है?” जवाब आता है, “पानी के नीचे है, भरोसा रखिए, सड़क अभी जिंदा है।”
व्यंग्य अपनी जगह है, लेकिन सवाल गंभीर है।
बारिश हर साल आती है। तो फिर हर साल जलभराव हमारे लिए नया संकट क्यों बन जाता है? क्या हमारी शहरी व्यवस्था वर्षा के पानी को संभालने के लिए पर्याप्त तैयार है? क्या नालों की नियमित सफाई होती है? क्या जलनिकासी व्यवस्था की वास्तविक क्षमता का आकलन किया जाता है? क्या सड़क निर्माण और जलनिकासी की योजना साथ-साथ बनाई जाती है? बारिश इन सवालों को नहीं पूछती। बारिश सिर्फ हमारी तैयारी की परीक्षा लेती है।
बारिश पर कविता लिखना आसान है। चाय की प्याली, खिड़की के बाहर गिरती बूंदें और पकौड़ों की खुशबू, बारिश का यह रूप बहुत सुंदर है।
लेकिन हर किसी की खिड़की के बाहर बारिश का यही दृश्य नहीं होता। एक दिहाड़ी मजदूर के लिए बारिश का अर्थ हो सकता है, आज काम नहीं मिला। आज काम नहीं मिला तो शायद आज की कमाई नहीं हुई। आज कमाई नहीं हुई तो कल का राशन प्रभावित होगा। कच्चे या कमजोर घर में रहने वाले परिवार के लिए बारिश का अर्थ हो सकता है, छत फिर टपकने लगी। किसी छोटे दुकानदार के लिए बारिश का अर्थ हो सकता है,
दुकान में पानी घुस गया। किसी सड़क किनारे रेहड़ी लगाने वाले के लिए बारिश का अर्थ हो सकता है, आज पूरा कारोबार बंद। यानी बादल ऊपर बरसते हैं, लेकिन उनकी सबसे भारी बूंदें कई बार गरीब आदमी के सीने पर गिरती हैं।
यहीं आकर बारिश का रोमांस समाप्त हो जाता है और वास्तविकता सामने खड़ी हो जाती है।

भारतीय मध्यमवर्ग भी बारिश को बहुत करीब से समझता है। बारिश शुरू हुई नहीं कि घर में अचानक आपातकाल लग जाता है। एक सदस्य कपड़े उठाता है। दूसरा खिड़कियां बंद करता है। तीसरा बिजली के बोर्ड बचाता है। चौथा छत देखने दौड़ता है। पांचवां मोबाइल पर मौसम का पूर्वानुमान देखता है, और छठा मन ही मन हिसाब लगाने लगता है, “बारिश बंद होने के बाद मरम्मत में कितना खर्च आएगा?” क्योंकि भारतीय परिवार बारिश से जितना नहीं डरता, कई बार उससे ज्यादा डरता है, बारिश के बाद आने वाले मरम्मत के बिल से।
और यदि उसी समय बिजली चली जाए तो आधुनिक जीवन की सारी चमक कुछ ही मिनटों में उतर जाती है। मोबाइल की बैटरी 6 प्रतिशत।
नेटवर्क गायब। इन्वर्टर आखिरी सांसों पर, तभी इंसान को एहसास होता है कि जिस तकनीक पर उसे इतना गर्व है, वह भी प्रकृति के सामने कितनी सीमित है। कल तक हम कह रहे थे, “टेक्नोलॉजी ने दुनिया बदल दी।” बारिश जैसे कहती है, “बहुत अच्छी बात है, पहले अपना घर तो बचा लो।”
इंसान ने अद्भुत वैज्ञानिक प्रगति की है। उपग्रह अंतरिक्ष में भेजे। समुद्र की गहराई मापी। पहाड़ों की ऊंचाई नापी। बादलों की गतिविधियों को समझने की कोशिश की। मौसम के पूर्वानुमान की तकनीक लगातार बेहतर हुई। लेकिन प्रकृति के सामने आज भी एक सीमा है। पूर्वानुमान हमें संभावना बता सकता है, प्रकृति की पूरी गारंटी नहीं। सुबह कोई कहता है, “आज ज्यादा बारिश नहीं होगी।” दोपहर तक वही व्यक्ति छत से पानी निकाल रहा होता है। पूछिए, “क्या हुआ?”
जवाब आता है, “पूर्वानुमान थोड़ा चूक गया।”
थोड़ा? भाई साहब, यहां तो कपड़े, गद्दे और घर का सामान तक पूर्वानुमान से बाहर हो गया।
यह मजाक जरूर है, लेकिन इसके भीतर एक महत्वपूर्ण बात छिपी है, मौसम की अनिश्चितता हमें अपनी तैयारी की निश्चितता बढ़ाने के लिए मजबूर करती है।
चार धाम की यात्रा फिर शुरू होगी। रास्ते खुलेंगे।
पहाड़ फिर यात्रियों का स्वागत करेंगे। मंदिरों में घंटियां फिर बजेंगी। श्रद्धालु फिर बद्रीनाथ, केदारनाथ, गंगोत्री और यमुनोत्री की ओर बढ़ेंगे।
लेकिन इस बारिश ने एक बार फिर इंसान को उसकी वास्तविक सीमा याद दिला दी है। हमने गगनचुंबी इमारतें बना लीं, लेकिन एक तेज बारिश हमें जलनिकासी की व्यवस्था याद दिला देती है। हमने लंबी यात्राओं की योजनाएं बना लीं, लेकिन मौसम की एक चेतावनी उन्हें रोक देती है।
हमने तकनीक को अपनी शक्ति समझ लिया, लेकिन बिजली और नेटवर्क चले जाने पर वही तकनीक कुछ घंटों के लिए बेबस हो जाती है।
प्रकृति हमें हर बार बताती है, शक्ति का अर्थ प्रकृति को जीत लेना नहीं, उसके साथ संतुलन बनाकर चलना है। मानसून अब विदा होने वाला है। जाते-जाते वह कहीं राहत दे रहा है, कहीं परेशानी, कहीं खेतों को जीवन और कहीं शहरों को चुनौती। इसलिए शिकायत कम और सीख ज्यादा जरूरी है। बस अब मानसून से एक छोटी-सी विनती है, भाई, अब सचमुच चले जाओ।
बहुत बरस लिए। अब गरीब को कमाने दो। मजदूर को काम करने दो। यात्री को चलने दो। बच्चों को स्कूल जाने दो। शहरों को सांस लेने दो। और घर वालों को चैन से सोने दो, और हां,
अगले साल आने से पहले बता देना, अतिथि बनकर आ रहे हो या फिर मकान मालिक बनकर। क्योंकि इंसान हर साल तुम्हारे स्वागत की तैयारी करता है, लेकिन तुम आते हो तो उसकी तैयारी की ही परीक्षा लेने लगते हो।
यही मानसून का सबसे बड़ा व्यंग्य है, इंसान भविष्य की योजनाएं वर्षों पहले बना लेता है, और प्रकृति कभी-कभी उन्हें कुछ घंटों की बारिश से बड़ी चुनौती में बदल देती है।
___
(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं)