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विशेष लेख-आकाश शर्मा
स्मार्ट हलचल|चित्तौड़गढ़ की माटी भी कितनी उर्वरा है और यहाँ का इतिहास कितना जीवंत! बरबस ही आज मेरी कलम भी छटपटाने लगी और कागद पर स्वतः ही चलने लगी। जिसने पूरे इस दुखद माहौल को अपनी आँखों से देखा था, जहाँ हर एक आँख नम होने के साथ-साथ अपने आँसुओं को रोक नहीं पा रही थी। वहीं, उस महान शख्सियत को श्रद्धासुमन अर्पित करने में राजस्थान ही नहीं, पूरे देश के कोने-कोने से राजनीतिक लोगों के आने का तांता लग गया, जो थमने का नाम ही नहीं ले रहा था। वही एक आँख बार-बार अपने दोस्त की तरफ बरबस ही उठ रही थी और आँसुओं को ला रही थी, मानो जैसे अपना दिल ही खो दिया हो…
आक्या गाँव के इसी माटी-पुत्र स्व. राम सिंह जी चौहान ने अपनी ही धरती पर राजनीतिक बिसात कुछ इस हुनर से बिछाई कि हर पार्टी, हर समाज और यहाँ तक कि अपने-पराए तमाम दिग्गज भी इस अजेयता को नमन करने को विवश हो गए। अजेयता जिनकी पहचान थी और राजनीतिक कौशल जिनकी थाती, उन्होंने इस बिछी हुई जाजम पर नेतृत्व की वह अमिट मिसाल पेश की, जो इतिहास के पन्नों पर हमेशा के लिए अमर हो गई। एक सशक्त और जुझारू नेता का वास्तविक कद क्या होता है, यह आक्या की इस पावन माटी ने भली-भांति दिखा दिया।
आज हमारे बीच स्व. राम सिंह जी नहीं हैं, लेकिन आक्या इन दिनों एक ऐसा अनूठा गांव बना हुआ है जहाँ किसी का भी पहिया रुकने का नाम नहीं ले रहा—बस कारवाँ चलता रहता है। कभी कोई तो कभी कोई, तो कभी हवा के मानिंद अपनों के आने-जाने का तांता लगा हुआ है। बस हर मन में एक ही तीव्र इच्छा है कि हम हमारे इस प्रिय नेता और वटवृक्ष रूपी शख्सियत को अपने श्रद्धासुमन अर्पित कर सकें।
दोस्ती, साया और छाँव की पहचान दादा-पोता
जब कोई विशाल वटवृक्ष उम्र के ढलान पर झुकने लगता है, तब उसकी अपनी ही शाखाएँ उसे नया संबल और सहारा देती हैं। उसी वटवृक्ष रूपी बुजुर्ग दादा के जीवन में छाँव बनकर खड़े पोते हरिओम का नाम आज हर आँख को नम कर रहा है। यह वही हरिओम है, जिसने अपने दादा-रूपी वटवृक्ष को एक गहरे दोस्त की तरह सहेजा, उनके साथ बेबाक हँसी-मज़ाक किए और हर घड़ी साए की तरह उनके साथ खड़ा रहा । ऐसे गाढ़े रिश्ते और बेइंतहा प्रेम की मिसाल सिर्फ वही दे सकता है जो सीधे दिलों के सबसे करीब हो यह दादा और पोते के बीच के उस पवित्र और अटूट प्रेम का जीवंत प्रमाण है, जो शब्दों की सीमाओं से परे है ।
संस्कारों से सींची गई मजबूत राजनीतिक विरासत
स्व.राम सिंह जी द्वारा जनसेवा का यह पौधा आज एक विशाल वटवृक्ष का रूप ले चुका है। जनसेवा के मूल्य परिवार की अगली पीढ़ी में गहराई से रचे-बसे हैं। उनके सुपुत्र,चंद्रभान सिंह आक्या आज उसी परंपरा को पूरी ईमानदारी ,आज वह राजनीतिक जीवन के उस पड़ाव पर है जहाँ वह अपने अनुभव को विधानसभा क्षेत्र की सेवा में समर्पित कर रहा है, तो उनकी बहू भी राजनीति में पीछे नहीं हैं। जब परिवार की तीसरी पीढ़ी यानी उनका पौत्र हरिओम दादा की जनसेवा के रास्ते को दोहराने का बीड़ा उठायेगा ?
शत-शत नमन ! आक्या की पावन माटी अपनी इस अपराजय, जिंदादिल और जुझारू शख्सियत के महान सपूत स्व. राम सिंह जी चौहान को हमेशा याद रखेगी। आक्या क्षेत्र की हवाओं में, हर जन-मानस की स्मृतियों में उनका अजेय प्रभाव हमेशा अमर रहेगा ।
हरि….ओम….
दोस्ती, साया और छाँव की पहचान दादा-पोता