महापौर जसवंत कंवर शहर के वार्डों में कर रही निरीक्षण, अधिकारियों को दे रही सुधार के निर्देश; इधर निगम परिसर के शौचालयों की हालत ने स्वच्छता व्यवस्था पर खड़े किए सवाल
भीलवाड़ा|स्मार्ट हलचल|शहर को स्वच्छ और सुंदर बनाने के दावे, वार्डों में निरीक्षण का दौर और समस्याओं के समाधान के निर्देश… लेकिन इन तमाम कवायदों के बीच नगर निगम के अपने ही शौचालयों की बदहाल स्थिति व्यवस्था को आईना दिखा रही है। जिस नगर निगम पर पूरे शहर की सफाई और सार्वजनिक शौचालयों के रखरखाव की जिम्मेदारी है, उसी के परिसर में टॉयलेट की हालत देखकर स्वच्छता के दावों पर सवाल उठने लगे हैं।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब महापौर जसवंत कंवर खुद शहर के अलग-अलग वार्डों में पहुंचकर सफाई, सड़क, नाली और दूसरी जनसमस्याओं का निरीक्षण कर रही हैं, अधिकारियों को व्यवस्थाएं सुधारने के निर्देश दिए जा रहे हैं, तो फिर निगम के अपने परिसर के शौचालयों की बदहाली पर प्रभावी कार्रवाई क्यों नजर नहीं आ रही? क्या निरीक्षण का दायरा शहर के वार्डों तक ही सीमित है, या निगम के अपने परिसर की व्यवस्था भी इसकी प्राथमिकता में शामिल है?
महापौर के निरीक्षण जारी, निगम के टॉयलेट पर सवाल बरकरार
महापौर जसवंत कंवर वार्डों में पहुंचकर स्थानीय लोगों की समस्याएं सुन रही हैं। सफाई व्यवस्था का जायजा लेने और मूलभूत सुविधाओं में सुधार के लिए अधिकारियों को निर्देश देने की कवायद भी की जा रही है। नगर निगम की ओर से शहर को स्वच्छ और व्यवस्थित बनाने की मंशा जाहिर की जा रही है। लेकिन निगम परिसर के शौचालयों की स्थिति इस अभियान की प्रभावशीलता पर सवाल खड़े करती है।
सामने आए वीडियो में शौचालय के फर्श, टाइल्स, दीवारों और अन्य हिस्सों की खराब स्थिति दिखाई दे रही है। जगह-जगह गंदगी के निशान और मरम्मत की जरूरत व्यवस्था के नियमित रखरखाव पर सवाल उठाते हैं। यह स्थिति बताती है कि केवल निरीक्षण करना पर्याप्त नहीं है, बल्कि निरीक्षण के बाद कमियों को दूर करना भी उतना ही जरूरी है।
जब अपने ही परिसर में व्यवस्था दुरुस्त नहीं, तो शहर का क्या हाल?
नगर निगम की जिम्मेदारी शहर के सार्वजनिक शौचालयों को साफ-सुथरा और उपयोग योग्य बनाए रखने की है। ऐसे में निगम के अपने टॉयलेट की हालत ही सवालों के घेरे में हो, तो आमजन के लिए उपलब्ध सार्वजनिक सुविधाओं की नियमित निगरानी पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
शहर में सार्वजनिक शौचालयों की साफ-सफाई, पानी की उपलब्धता, खराब फिटिंग की मरम्मत और नियमित रखरखाव जैसी व्यवस्थाएं नागरिकों की बुनियादी जरूरतों से जुड़ी हैं। यदि निगम परिसर में ही इन पहलुओं पर अपेक्षित ध्यान नहीं दिया जा रहा, तो शहर के दूसरे हिस्सों में व्यवस्था की निगरानी और जवाबदेही सुनिश्चित करना और भी जरूरी हो जाता है।
निरीक्षण की असली सफलता सुधार में
महापौर जसवंत कंवर के वार्ड निरीक्षणों से आमजन को समस्याओं के समाधान की उम्मीद है। लेकिन इस उम्मीद को मजबूत करने के लिए निगम परिसर की व्यवस्थाओं को भी प्राथमिकता देनी होगी। सफाई कर्मचारियों की जिम्मेदारी तय करने, शौचालयों की नियमित सफाई, टूटे हिस्सों की मरम्मत और समय-समय पर निगरानी की व्यवस्था से ही तस्वीर बदल सकती है।
सवाल महापौर के निरीक्षण करने का नहीं, बल्कि उन निरीक्षणों के जरिए व्यवस्था में कितना सुधार हो रहा है, इसका है। जब शहर के वार्डों में कमियां दूर करने के निर्देश दिए जा रहे हैं, तो निगम के अपने परिसर में भी उसी कसौटी पर व्यवस्थाओं को परखा जाना चाहिए।
महापौर और अधिकारियों से सीधे सवाल
निगम परिसर के शौचालयों की नियमित सफाई और रखरखाव की जिम्मेदारी किसकी है?
शौचालयों की आखिरी बार मरम्मत कब कराई गई?
क्या महापौर और निगम अधिकारियों के निरीक्षण में इन सुविधाओं की स्थिति की समीक्षा की जाती है?
शहर के सार्वजनिक शौचालयों की सफाई और रखरखाव की निगरानी के लिए क्या व्यवस्था है?
निगम परिसर के टॉयलेट की बदहाली दूर करने के लिए कब तक ठोस कदम उठाए जाएंगे?
अब निगम को खुद से करनी होगी शुरुआत
भीलवाड़ा को स्वच्छ और सुंदर बनाने का लक्ष्य तभी सार्थक होगा, जब स्वच्छता के मानक निगम के अपने परिसर में भी दिखाई देंगे। महापौर जसवंत कंवर के निरीक्षण और अधिकारियों के निर्देशों का असर जमीन पर दिखना चाहिए। निगम के शौचालयों की सफाई, मरम्मत और नियमित निगरानी को प्राथमिकता देकर व्यवस्था में तत्काल सुधार की जरूरत है।
क्योंकि शहर को स्वच्छता का संदेश देने वाले नगर निगम की शुरुआत उसके अपने परिसर से होनी चाहिए। जब निगम के टॉयलेट ही बदहाली के सवालों में घिरे हों, तो शहर के सार्वजनिक शौचालयों की व्यवस्था पर सवाल उठना लाजिमी है। अब देखना यह है कि निरीक्षणों के बाद निगम परिसर की तस्वीर बदलती है या बदहाली यूं ही बरकरार रहती है।