पार्कों की बदहाली और ठेकेदार की मनमानी पर उठाए सवाल, भुगतान रोकने से लेकर ठेका निरस्त करने तक की मांग; सत्ता पक्ष के भीतर असंतोष के संकेत
भीलवाड़ा।स्मार्ट हलचल|नगर निगम में नई बोर्ड के गठन के बाद अब महापौर जसवंत कंवर को अपनी ही पार्टी के पार्षदों के सवालों का सामना करना पड़ रहा है। शहर के पार्कों की बदहाली, रखरखाव में कथित लापरवाही और श्रमिकों को महीनों से मानदेय नहीं मिलने के मुद्दे पर सत्ता पक्ष के पार्षदों ने महापौर को ज्ञापन सौंपकर कार्रवाई की मांग की है। इस घटनाक्रम ने निगम में सत्तारूढ़ दल के भीतर चल रहे असंतोष को लेकर राजनीतिक चर्चाओं को हवा दे दी है।
खास बात यह है कि पार्कों की दुर्दशा और रखरखाव व्यवस्था को लेकर सवाल विपक्ष ने नहीं, बल्कि महापौर की अपनी ही पार्टी के पार्षदों ने उठाए हैं। पार्षदों ने संबंधित संवेदक पर लापरवाही का आरोप लगाते हुए उसका आगामी भुगतान रोकने, अनुबंध की शर्तों के उल्लंघन पर कार्रवाई करने और जरूरत पड़ने पर ठेका निरस्त करने की मांग की है।
ज्ञापन में आरोप लगाया गया है कि शहर के विभिन्न पार्कों में नियमित सफाई, सिंचाई और पेड़-पौधों की कटाई-छंटाई नहीं होने से उनकी स्थिति लगातार खराब हो रही है। पार्कों के रखरखाव में अपेक्षित गंभीरता नहीं बरते जाने से आमजन को मिलने वाली सार्वजनिक सुविधाएं प्रभावित हो रही हैं। पार्षदों ने श्रमिकों को पांच से छह माह तक भुगतान नहीं मिलने का मुद्दा भी उठाया है। उनका कहना है कि जब रखरखाव के लिए जिम्मेदार संवेदक अपनी जिम्मेदारियों का समुचित निर्वहन नहीं कर रहा है, तो उसके खिलाफ ठोस कार्रवाई होनी चाहिए।
नगर निगम में नई व्यवस्था के बीच अपनी ही पार्टी के पार्षदों की ओर से महापौर को इस तरह ज्ञापन सौंपना राजनीतिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। सवाल यह है कि मामला केवल पार्कों के रखरखाव में लापरवाही तक सीमित है या इसके पीछे निगम के कामकाज को लेकर सत्ता पक्ष के भीतर पनप रही नाराजगी भी सामने आ रही है। आने वाले दिनों में महापौर और निगम प्रशासन का रुख इस पूरे घटनाक्रम की दिशा तय कर सकता है।
दीपावली जैसे बड़े त्योहार से पहले शहर की सफाई व्यवस्था, सार्वजनिक सुविधाओं और पार्कों की स्थिति को लेकर पहले ही सवाल उठ रहे हैं। ऐसे में सत्तारूढ़ दल के पार्षदों की शिकायत ने निगम प्रशासन की कार्यप्रणाली को भी सवालों के घेरे में ला दिया है। यदि शिकायतों पर समय रहते कार्रवाई नहीं होती है, तो यह मुद्दा शहर की राजनीति में और तूल पकड़ सकता है।
ज्ञापन पर सुभाष सोनी, नरवण जाट, बिलेश्वर बादल, सुरेंद्र सिंह राठौड़, खुशबू गुर्जर, संपत लाल गांधर्व, हेमराज आचार्य, शंकर जाट, महेंद्र सिंह और ममता सहित पार्षदों के हस्ताक्षर बताए गए हैं। हालांकि, उपलब्ध विवरण में 14 पार्षदों का उल्लेख है, जबकि नामों की सूची में इससे कम नाम दिए गए हैं।
अब निगाहें महापौर जसवंत कंवर के रुख पर टिकी हैं। पार्षदों ने सीधे महापौर से कार्रवाई की मांग की है। ऐसे में देखना होगा कि महापौर शिकायतों को गंभीरता से लेते हुए संबंधित संवेदक के खिलाफ कार्रवाई करती हैं और पार्षदों का भरोसा जीतती हैं या फिर यह मामला निगम में सत्ता पक्ष के भीतर असंतोष की नई बहस को जन्म देता है। फिलहाल, इस ज्ञापन को खुली बगावत कहना जल्दबाजी होगी, लेकिन इसे अपनी ही पार्टी के पार्षदों की ओर से महापौर के सामने उठाए गए असहज सवालों के रूप में जरूर देखा जा रहा है।