आकाश शर्मा
चित्तौड़गढ़ l स्मार्ट हलचल|शौर्य, त्याग और इतिहास की धरा चित्तौड़गढ़ आज एक गंभीर पारिस्थितिक संकट और प्रशासनिक लाचारी के दौर से गुजर रही है। शहर की पहचान केवल इसके गौरवशाली अतीत तक सीमित नहीं है, बल्कि इसकी भौगोलिक बनावट और प्राकृतिक जल-प्रवाह इसके जीवन का मुख्य आधार रहे हैं। लेकिन विडंबना यह है कि अंधाधुंध विकास, राजनैतिक संकीर्णता और प्रशासनिक उदासीनता के चलते यह शहर लगातार एक बड़ी आपदा की ओर धकेला जा रहा है।
इस संकट का सबसे बड़ा प्रमाण शहर के पारंपरिक जल-ड्रेनेज सिस्टम और प्राकृतिक जल-मार्गों की वर्तमान बदहाली है। राजस्व अभिलेखों पर नजर डालें, तो ग्राम चित्तौड़गढ़ की साबिक आराजी नंबर 984, 985, 983 एवं 978 के मी. नंबरों में से सेटलमेंट के पश्चात नवीन आराजी नंबर 1722 (रकबा 0.32 हेक्टेयर, किस्म नाला) तथा नवीन आराजी नंबर 1723 (रकबा 0.37 हेक्टेयर, किस्म रास्ता) सृजित हुई है। यह अकाट्य सत्य है कि पुराने शहर और विश्व प्रसिद्ध किले से वर्षाकाल में आने वाला अपार जलसैलाब तथा घनी आबादी का सीवर का पानी इन्हीं दोनों प्रमुख आराजात से होकर गंभीरी नदी में विलीन होता है।
किंतु, शहर के व्यस्तम मार्ग गोल प्याऊ से सुभाष चौक के बीच स्थित सूचना एवं जनसंपर्क कार्यालय के बाहर चल रहा विवादित निर्माण कार्य इस प्रशासनिक मिलीभगत की कलई खोल देता है। पूर्व के अधिकारियों द्वारा नाले पर ही स्वीकृति दिए जाने के बाद, वर्तमान में नए मालिक द्वारा बिना वैध अनुमति के खुदाई कर निर्माण कार्य जारी है। हैरानी की बात यह है कि जनहित में शिकायत करने पर न केवल आयुक्त और कर्मचारी उदासीन बने हुए हैं, बल्कि सूत्रों के अनुसार, शिकायत की जानकारी फौरन निर्माणकर्ता तक पहुंचाकर मामले को दबाने और समझौते के प्रयास किए जा रहे हैं। हम वो नाम भी खोलेंगे जिसने हमें गाँधी छाप कागज के कुछ पन्नो से खरीदने की कोशिस की है l गौरतलब है की जब जब सरकारी छुट्टी या त्यौहार का मौका आया है तब तब यहां पर निर्माण कार्य किया जा रहा है वो भी प्रसासनिक मौन स्वीकृति पर, पिछले कुछ वर्षों से राजनैतिक संरक्षण और प्रशासनिक छत्रछाया ने इन जल-प्रवाह क्षेत्रों का भूगोल ही बदल दिया है। रसूखदार और धनबल के लोग सार्वजनिक भूमियों, नालों और रास्तों पर काबिज हो चुके हैं। जब कानून के रखवाले आंखें मूंद लेते हैं, तब भू-माफियाओं के हौसले बुलंद हो जाते हैं और जरा सी बारिश में चित्तौड़गढ़ की सड़कें दरिया बन जाती हैं।
यह आने वाली पीढ़ियों के भविष्य के साथ आपराधिक खिलवाड़ है। यदि समय रहते राजस्थान भू-राजस्व अधिनियम, 1956 की धारा 91 तथा राजस्थान नगरपालिका अधिनियम, 2009 के तहत अवैध कब्जों पर बुलडोजर नहीं चलाया गया, तो वह दिन दूर नहीं जब चित्तौड़गढ़ गंभीर पर्यावरणीय आपदा का केंद्र बन जाएगा।