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भारत का अनोखा किला जहां दुश्मनों पर दागे गए थे चांदी के गोले,वो लड़ाई जिसने चूरू का नाम हमेशा के लिए अमर कर दिया

Churu Fort Immortal history :प्राचीन समय में राजा अपने राज्य या किले की रक्षा के लिए क्या कुछ नहीं करते थे। यहां तक कि वो सोने-चांदी, हीरे-जवाहरात की भी कीमत नहीं समझते थे। आज हम आपको एक ऐसे एतिहासिक किले के बारे में बताने जा रहे हैं, जो इतिहास में अमर है, क्योंकि वहां जो घटना घटी थी, वो न तो दुनिया में कहीं और घटी है और न ही कभी घटेगी। इस घटना की वजह से ही किले का नाम विश्व इतिहास में स्वर्णिम अक्षरों में लिखा गया है।आज हर देश के पास युद्ध लड़ने के लिए एक से बढ़ कर एक आधुनिक हथियार हैं. लेकिन इतिहास में जब आप झांकेंगे तो पता चलेगा कि पहले युद्ध तलवारों और तोपों से लड़ा जाता था. तोप चलाने के लिए गोले बारूद की जरूरत पड़ती थी. लेकिन भारतीय इतिहास में एक लड़ाई ऐसी भी हुई थी, जिसमें लोहे के गोले की जगह चांदे के गोलों का इस्तेमाल हुआ था. चलिए आज आपको इस युद्ध के बारे में विस्तार से बताते हैं.

आज हम बात करेंगे राजस्थान की धरती पर स्थित एक ऐसे किले की, जो अपने आप बेहद खास है। जिसका नाम स्वर्णिम अक्षरों में लिखा जाता है। शायद एक राजसी ठाठ को बयां करने का यह भी एक अनोखा अंदाज है। इस किले का नाम ‘चूरू का किला’…, जिसे ठाकुर कुशल सिंह ने बनवाया था। 17वीं शाताब्दी (1694 ईस्वी) में बने इस किले अपने दौर में यूं तो कई लड़ाईयां देखी लेकिन 19वीं सदी के शुरुआत में यहां एक ऐसी लड़ाई देखने को मिली, जिसने इसे इतिहास के पन्नों में हमेशा के लिए अमर कर दिया।वो लड़ाई जिसने चूरू का नाम हमेशा के लिए अमर कर दिया दरअसल, बात है 1814 ईस्वी की, जब चूरू किले पर बीकानेर रियासत के राजा सूरत सिंह ने आक्रमण कर दिया था। तब लड़ाई के दौरान चूरू की सेना का मनोबल टूटने लगा था, इसका कारण था किले में गोला-बारूद का खत्म होना। तब चूरू की प्रजा ने अपना धर्म निभाया और अपने तत्कालीन राजा शिवजी सिंह को एक अनोखा दान दिया, जिससे इतिहास में यह लड़ाई हमेशा के लिए यादगार बन गई। वह अनोखा दान था- जेवरों का…।
प्रजा ने अपने राज्य को बचाने के लिए अपने राजा के चरणों में सारा सोना-चांदी रख दिया, इसके बाद जो हुआ वो वाकई में जानने लायक है। प्रजा से आभूषण मिलने पर राजा ने तुरंत उन्हें गलवा कर गोले बनवाए और दुश्मनों पर दागने शुरू कर दिए और आक्रमणकारियों को घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया।चूरू किला, जिले के रतनगढ़ तालुका का किला है। रतनगढ़ को पहले कोलासर के नाम से जाना जाता था, जो अपनी विशाल हवेलियों के लिए काफी प्रसिद्ध है। इन हवेलियों में आपको भित्ति चित्र भी देखने को मिलेगी, जो शेखावाटी की एक विशेष वास्तुशिल्प है। इस किले की वास्तुकला देखने लायक है।

1857 की लड़ाई में महत्वपूर्ण भूमिका चूरू किले पर 2 बार (1815 व 1816 ईस्वी) ठाकुर पृथ्वी सिंह ने हमला किया था, जो राजा चूरू के पुत्र थे। इस दौरान उन्हें सीकर के महारावल लक्ष्मण सिंह ने समर्थन दिया था। 1857 की लड़ाई के दौरान ठाकुर शिव सिंह अंग्रेजों के खिलाफ खड़े हो गए और ब्रिटिश अधिकारियों का बहादुरी से सामना किया था।

चूरू में घूमने लायक जगहें 1. सालासर बालाजी मंदिर (सालासार धाम) 2. रानी सती मंदिर 3. खाटू श्यामजी मंदिर 4. कोठारी और सुराणा हवेलियां 5. सेठानी का जोहरा (जलाशय) 6. ताल छापर अभयारण्य

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