“आदेश सख्त,सिस्टम ढीला,सफाई बनी कमाई का जरिया”
टेंडर लाखों के होने के बावजूद गांवों में कचरा,कौन खा गया सफाई का पैसा….?
रिपोर्टर सुरज वर्मा
स्मार्ट हलचल|फूलियाकलां उपखंड क्षेत्र की ग्राम पंचायत में इन दिनों सफाई के नाम पर जो हो रहा है, वो किसी से छुपा नहीं है। कागजों में करोड़ों रुपए के टेंडर पास हो रहे हैं,लाखों-करोड़ों रुपए खर्च भी दिखाए जा रहे हैं,लेकिन अगर कोई गांवों में जाकर देख ले,तो सच्चाई साफ नजर आ जाती है जगह-जगह कचरे के ढेर, सड़कों पर भरा गंदा पानी और सफाई व्यवस्था नाम की कोई चीज नहीं। सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब हर ग्राम पंचायत में लाखों रुपए के टेंडर दिए गए हैं, तो फिर ये पैसा आखिर जा कहां रहा है? टेंडर की शर्तों में साफ है कि रोजाना सफाई होगी,कचरा उठाया जाएगा, गीला-सूखा कचरा अलग किया जाएगा और कचरा उठाने के लिए वाहन भी लगेगा। लेकिन जमीनी हकीकत ये है कि महीने में एक-दो दिन मजदूर लगाकर सिर्फ दिखावे की सफाई कर दी जाती है, ताकि फोटो खिंच जाए और कागज पूरे हो जाएं। बाकी दिनों में गांव गंदगी में ही पड़े रहते हैं। पंचायती राज मंत्री की और से कई बार साफ कहा गया है कि जहां लापरवाही मिलेगी, वहां संबंधित अधिकारी पर कार्रवाई होगी, सस्पेंड तक किया जाएगा। लेकिन इन आदेशों का असर फूलियाकलां कस्बे में कहीं दिखाई नहीं देता। उल्टा यहां तो मिलीभगत का खेल खुलकर चल रहा है। जिन फर्मों को टेंडर दिया गया है, वो काम कम और कागजी खानापूर्ति ज्यादा कर रही हैं। और सबसे बड़ी बात ग्राम पंचायतों की ओर से भी इनको पूरा सहयोग मिल रहा है। बिना काम के ही भुगतान कर दिया जाता है। इस पूरे मामले में पंचायत समिति के जिम्मेदार अधिकारी की जिम्मेदारी सबसे अहम होती है। नियम के अनुसार जितना काम होगा, उतनी ही एमबी भरी जाएगी और उसी हिसाब से भुगतान होगा। लेकिन यहां आरोप ये है कि एमबी भी फर्जी तरीके से भरी जा रही है। यानी काम जमीन पर नहीं, सीधे कागजों में हो रहा है। ग्रामीण लालाराम रावण, खुशाल सिंह, रमेश, मुकेश, अजुर्न सिंह, राकेश, बुद्धि प्रकाश ने बताया कि कहीं बार उपखंड अधिकारी व जिला प्रशासन को ज्ञापन देने के बाद भी पिछले दो वित्तीय वर्षों में लाखों रुपए का भुगतान हो चुका है, लेकिन गांवों की हालत जस की तस है। साफ दिखाई देता है कि जिम्मेदार अधिकारियों और ठेकेदारों की मिलीभगत से जनता के पैसों का खुला खेल हो रहा है। सूत्र तो यहां तक बताते हैं कि पूरा मामला “कमीशन सेटिंग” पर चल रहा है जिसके हिसाब से पेमेंट तय होता है। सबसे दुखद बात ये है कि जिस योजना का मकसद गांवों को साफ-सुथरा बनाना था, उसी को पलीता लगाया जा रहा है। सवाल ये है कि आखिर जिम्मेदार लोग कब तक आंखें मूंदे बैठेंगे और कब तक जनता के पैसे से कुछ लोगों की जेबें भरती रहेंगी। अगर यही हाल रहा, तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का स्वच्छ भारत मिशन सिर्फ कागजों तक ही सीमित रह जाएगा और जमीन पर गंदगी ही असली सच्चाई बनी रहेगी।
