(विवेक वैष्णव)
स्मार्ट हलचल|वर्ष 2026 के आरंभिक महीनों ने यह तो स्पष्ट कर दिया है कि हम एक ‘अनिश्चितता के नए युग’ में प्रवेश कर चुके हैं। आज का वैश्विक परिदृश्य नई शक्ति संरचनाओं और तकनीकी क्रांतियों का एक जटिल मिश्रण है। ‘प्रतिद्वंद्विता’ आज के वैश्विक परिदृश्य का सबसे प्रभावशाली शब्द बन चुका है। यह केवल दो देशों के बीच की होड़ नहीं होकर प्रणालियों, विचारधाराओं और भविष्य की तकनीक पर वर्चस्व की लड़ाई बन चुका है। ‘‘लोकतंत्र बनाम अधिनायकवाद’’ के बीच विकासशील देश अब इस बात का आकलन कर रहे हैं कि उनके विकास के लिए कौन सा मॉडल बेहतर है। हरित ऊर्जा की ओर बढ़ती दुनिया में अब ’लिथियम’, ’कोबाल्ट’ और अन्य दुर्लभ खनिजों को हासिल करने की एक नई दौड़ शुरू हो गई है।
आज का वैश्विक परिदृश्य एक दोराहे पर खड़ा है। वैश्वीकरण का वह दौर पीछे छूट गया है जहाँ दुनिया एक ही बाजार थी। अब दुनिया ‘फ्रेंड-शोरिंग’ और क्षेत्रीय आर्थिक गुटों में बंट रही है। आज की दुनिया ‘बहुध्रुवीय’ होने की ओर अग्रसर है। ‘‘अमेरिका बनाम चीन’’ 21वीं सदी की सबसे बड़ी प्रतिद्वंद्विता है। यह केवल सैन्य शक्ति की नहीं, बल्कि दक्षिण चीन सागर से लेकर हिंद-प्रशांत क्षेत्र तक प्रभाव जमाने की होड़ है। भारत, तुर्की, सऊदी अरब और ब्राजील जैसे देश अब केवल मूकदर्शक नहीं हैं। वे अपनी शर्तों पर वैश्विक राजनीति में अपनी जगह बना रहे हैं जिससे पुरानी शक्तियों के साथ एक नई किस्म की ’सॉफ्ट’ प्रतिद्वंद्विता पैदा हो रही है। एक तरफ ‘‘आर्टेमिस द्वितीय’’ जैसे मिशनों के जरिए अंतरिक्ष में इंसानी पहुंच का नया अध्याय लिखा जा रहा है तो दूसरी तरफ धरती पर कट्टरता और भू-आर्थिक टकराव बढ़ रहे हैं। भविष्य इस बात पर निर्भर करेगा कि वैश्विक नेतृत्व ‘प्रतिद्वंद्विता’ और ‘सहयोग’ के बीच संतुलन कैसे बनाता है।
मौजूदा दौर में युद्ध की परिभाषा बदल गई है। अब युद्ध सीमाओं पर कम और लैब सें अधिक लड़े जा रहे हैं। ‘तकनीकी युद्ध’ 2026 की भू-राजनीतिक हकीकत है। यह पारंपरिक युद्धों से अलग है क्योंकि इसमें गोलियां नहीं, बल्कि ‘‘बाइट्स’’ और ‘‘चिप’’ हथियार के रूप में इस्तेमाल होते हैं। तकनीकी युद्ध अब धरती से ऊपर अंतरिक्ष तक फैल गया है। यूक्रेन और गाजा जैसे प्रत्यक्ष संघर्षों के साथ-साथ अब ‘ग्रे-ज़ोन’ चुनौतियां बढ़ गई हैं। साइबर हमले, अंतरिक्ष आधारित जासूसी और सूचना युद्ध अब देशों की रणनीति का हिस्सा हैं। चिप आधुनिक युग का ’नया तेल’ बन चुका हैं। अमेरिका और चीन के बीच की प्रतिद्वंद्विता अब केवल व्यापार तक सीमित नहीं है बल्कि यह ‘सेमीकंडक्टर, एआई और डेटा संप्रभुता’’ पर नियंत्रण की जंग बन चुकी है। तेल के खेल के रूप में हाल ही में अमेरिका व इजरायल का ईरान के साथ युद्ध ने संपूर्ण विश्व को एक चिंता में डाल दिया है। तकनीकी युद्ध के इस वैश्विक शतरंज पर भारत अपनी स्थिति को बहुत चतुराई से ‘रक्षात्मक’ और ‘आक्रामक’ दोनों स्तरों पर मजबूत कर रहा है। भारत का लक्ष्य किसी एक गुट का हिस्सा बनने के बजाय ‘तकनीकी संप्रभुता’ हासिल करना है। तकनीकी युद्ध का सबसे खतरनाक पहलू यह है कि इसकी कोई स्पष्ट ‘सीमा रेखा’ नहीं है। एक साधारण सॉफ्टवेयर अपडेट या साइबर घुसपैठ किसी भी देश की अर्थव्यवस्था को रातों-रात पंगु बना सकती है।
2026 वह वर्ष है जहाँ ‘एजेंटिक एआई’ ने मुख्यधारा में जगह बना ली है। यह केवल चैट करने वाला टूल नहीं रहा बल्कि निर्णय लेने और स्वायत्त कार्य करने वाला इंजन बन गया है। जहाँ इसने स्वास्थ्य और अंतरिक्ष विज्ञान में नई राहें खोली हैं, वहीं ‘डीपफेक’ और गलत सूचना ने लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं के लिए खतरा पैदा कर दिया है। देश अब अपना खुद का डिजिटल इकोसिस्टम बना रहे हैं ताकि वे बाहरी सूचनाओं और जासूसी से बच सकें। ऊर्जा सुरक्षा के नाम पर परमाणु ऊर्जा की ओर दुनिया का बढ़ता झुकाव एक नई बहस को जन्म दे रहा है। एआई-संचालित ड्रोन और लड़ाकू विमान अब इंसानी हस्तक्षेप के बिना निर्णय लेने में सक्षम हो रहे हैं। ‘‘स्टारलिंक’’ जैसे उपग्रह समूहों ने यह दिखा दिया है कि संचार पर नियंत्रण युद्ध के परिणामों को बदल सकता है। उपग्रहों को जाम करना या नष्ट करना अब देशों की सामरिक रणनीति का हिस्सा बन चुका है।
भारत इस तकनीकी युद्ध में केवल एक बाज़ार बनकर नहीं रहना चाहता बल्कि एक ‘क्रिएटर’ बनना चाहता है। भारत की रणनीति यह है कि वह तकनीकी रूप से इतना अनिवार्य हो जाए कि वैश्विक व्यवस्था उसके बिना अधूरी रहे। इस अस्थिरता के बीच भारत एक ‘विश्व मित्र’ और आर्थिक शक्ति के रूप में उभरा है। वैश्विक दक्षिण की आवाज बनने के साथ-साथ, पश्चिम और रूस के बीच कूटनीतिक संतुलन साधने की भारत की क्षमता इसे एक अनिवार्य वैश्विक खिलाड़ी बनाती है। भारत ने ’’’इंडिया स्टैक’ के जरिए दुनिया को दिखाया है कि तकनीक केवल मुट्ठी भर निजी कंपनियों के नियंत्रण में नहीं होनी चाहिए। अमेरिका और चीन के मॉडलों के बीच भारत का ’ओपन सोर्स’ मॉडल एक लोकतांत्रिक विकल्प के रूप में उभरा है।
चिप युद्ध में अपनी स्थिति मजबूत करने के लिए भारत ने आईएसएम (इण्डिया सेमीकंडक्टर मिशन) के तहत भारी निवेश किया है। भारत अमेरिका और उसके सहयोगियों के साथ ‘‘आईसीईटी’’ जैसी साझेदारियां कर रहा है। जिसका उद्देश्य अंतरिक्ष, एआई और जेट इंजन जैसी महत्वपूर्ण तकनीकों को साझा करना और विकसित करना है। यह भारत को पश्चिमी देशों की तकनीकी सुरक्षा घेरे का हिस्सा बनाता है जबकि भारत अपनी स्वायत्तता बनाए रखता है। भारत ने चीनी ऐप्स पर प्रतिबंध लगाकर यह स्पष्ट कर दिया था कि ‘डेटा सुरक्षा’ राष्ट्रीय सुरक्षा का हिस्सा है। भारत अब अपने नागरिकों के डेटा को देश की सीमाओं के भीतर सुरक्षित रखने के लिए कड़े कानून लागू कर रहा है। ‘‘साइबर कमांड’’ सेना के भीतर एक समर्पित साइबर कमांड का गठन युद्ध के नए मोर्चों के लिए तैयारियों को दर्शाता है।
