जयपुर|स्मार्ट हलचल।राजस्थान उच्च न्यायालय की जयपुर पीठ ने पंचायती राज व्यवस्था में प्रशासनिक शक्तियों के दुरुपयोग पर अंकुश लगाते हुए एक महत्वपूर्ण अंतरिम आदेश पारित किया है। माननीय न्यायमूर्ति आनंद शर्मा की एकल पीठ ने दौसा जिले के नांगल राजावातान के प्रशासक ओमप्रकाश मीणा को पद से हटाने के राज्य सरकार के एकतरफा आदेश पर आगामी आदेश तक अंतरिम रोक लगा दी है। न्यायालय का यह रुख स्पष्ट करता है कि बिना किसी विधिवत जांच और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का पालन किए बिना की गई कोई भी प्रशासनिक कार्रवाई कानून की नजर में टिक नहीं सकती।
बिना जांच के निष्कासन: नियमों और अधिनियमों की खुली अवहेलना
प्राप्त विवरण के अनुसार, याचिकाकर्ता ओमप्रकाश मीणा को राज्य सरकार के पंचायती राज विभाग द्वारा जारी एक आदेश दिनांक १८ जून २०२६ के माध्यम से प्रशासक के पद से हटा दिया गया था। इसके खिलाफ याचिकाकर्ता ने अपने अधिवक्ता रवि कुमार पलसानिया के माध्यम से उच्च न्यायालय में सिविल रिट याचिका संख्या ११०९०/२०२६ दायर की।
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता के अधिवक्ता ने तर्क दिया कि राजस्थान पंचायती राज अधिनियम, १९९४ की धारा ३८ तथा नियमों के नियम २२ के तहत किसी भी पदाधिकारी के खिलाफ कार्रवाई करने से पूर्व एक विधिवत और निष्पक्ष जांच की जानी अनिवार्य है। सरकार ने याचिकाकर्ता को अपना पक्ष रखने का कोई अवसर दिए बिना ही सीधे पदमुक्त कर दिया, जो भारतीय संविधान के अनुच्छेद १४ व २१ के तहत प्राप्त मौलिक अधिकारों का हनन है।
न्यायालय का रुख और जारी निर्देश:
एकतरफा आदेश पर रोक: माननीय न्यायमूर्ति ने प्रथम दृष्टया याचिकाकर्ता के पक्ष में मजबूत आधार पाते हुए निष्कासन आदेश के प्रभाव पर तत्काल प्रभाव से रोक लगा दी।
विपक्षीगण को नोटिस: मुख्य सचिव (पंचायती राज), अतिरिक्त आयुक्त, जिला कलेक्टर (दौसा) और मुख्य कार्यकारी अधिकारी को नोटिस जारी कर ३ सप्ताह में जवाब तलब किया गया है।
मामलों की टैगिंग: इस मामले को इसी प्रकृति के अन्य लंबित मामलों (S.B. CWP Nos. 6860/2026, 9020/2026) के साथ सूचीबद्ध करने का आदेश दिया गया है।
आदेश का दूरगामी असर:
विधिक विशेषज्ञों का मानना है कि यह आदेश उन प्रशासनिक अधिकारियों के लिए एक कड़ा सबक है जो बिना वैधानिक प्रक्रिया अपनाए एकतरफा निर्णय लेते हैं। यह फैसला कानून के शासन की संप्रभुता को पुनः स्थापित करता है।
