लीकेज ही लीकेज: जब रिसाव पाइपलाइन से निकलकर व्यवस्था तक पहुंच जाए

पानी की एक बूंद का रिसाव दिखाई देता है, लेकिन व्यवस्था, राजनीति, समाज और रिश्तों से रिसता भरोसा अक्सर तब दिखता है, जब बहुत कुछ बह चुका होता है….

महेन्द्र नागौरी

स्मार्ट हलचल\लीकेज शब्द सुनते ही सबसे पहले आंखों के सामने पानी की टूटी पाइपलाइन आती है। सड़क पर बहता पानी, गड्ढों में जमा होता कीचड़, घरों तक कम पहुंचता पानी और शिकायतों के बावजूद टपकती पाइपलाइन—यह हमारे शहरों की जानी-पहचानी तस्वीर है।
लेकिन क्या लीकेज केवल पाइपलाइन में होता है?
नहीं।
लीकेज एक पाइप से निकलकर अब हमारी पूरी व्यवस्था में फैल चुका है। राजनीति में विश्वास का लीकेज है, प्रशासन में जवाबदेही का लीकेज है, अर्थव्यवस्था में संसाधनों के उपयोग का लीकेज है, सामाजिक जीवन में संवेदनाओं का लीकेज है और परिवारों में संवाद का लीकेज है।
फर्क सिर्फ इतना है कि पानी का लीकेज सड़क पर दिखाई देता है, जबकि व्यवस्था का लीकेज आंकड़ों, फाइलों, व्यवहार और लोगों के घटते भरोसे में दिखाई देता है।
सबसे बड़ा रिसाव पानी का नहीं, भरोसे का है
किसी लोकतांत्रिक व्यवस्था की सबसे बड़ी पूंजी क्या है?
सड़कें, इमारतें, योजनाएं और बजट निश्चित रूप से महत्वपूर्ण हैं, लेकिन इनके ऊपर एक अदृश्य पूंजी खड़ी होती है—जनता का भरोसा।
जब नागरिक को लगता है कि उसकी शिकायत सुनी जाएगी, नियम सभी के लिए समान हैं, सार्वजनिक धन का उपयोग निर्धारित उद्देश्य के लिए होगा और जिम्मेदार व्यक्ति से जवाब मांगा जाएगा, तब व्यवस्था मजबूत होती है।
लेकिन जब शिकायत बार-बार करने के बावजूद समाधान नहीं मिलता, जिम्मेदारी इधर से उधर जाती रहती है और गलती के बाद भी जवाबदेही तय नहीं होती, तब भरोसा थोड़ा-थोड़ा रिसने लगता है।
यह रिसाव अचानक दिखाई नहीं देता।
यह बूंद-बूंद होता है।
और एक दिन पता चलता है कि टैंक खाली है।
राजनीति में घोषणाओं की पाइपलाइन, उम्मीदों का लीकेज
लोकतंत्र में राजनीति जनता की आकांक्षाओं को शासन तक पहुंचाने का माध्यम है। चुनाव घोषणाएं, नीतियां और विकास के वादे इसी प्रक्रिया का हिस्सा हैं।
लेकिन असली कसौटी घोषणा नहीं, उसका क्रियान्वयन है।
कागज पर बनी योजना जमीन तक पहुंचते-पहुंचते कमजोर पड़ जाए, नागरिक को बार-बार एक ही कार्यालय के चक्कर लगाने पड़ें या वादा और परिणाम के बीच लंबी दूरी पैदा हो जाए तो सवाल सिर्फ सरकार या किसी दल का नहीं रहता।
सवाल पूरी सार्वजनिक व्यवस्था की कार्यक्षमता का बन जाता है।
घोषणा करना आसान है, उसकी अंतिम बूंद तक लाभ पहुंचाना कठिन।
यही वह जगह है जहां व्यवस्था को अपने ‘लीकेज प्वाइंट’ तलाशने पड़ते हैं।
प्रशासन में सबसे खतरनाक लीकेज—जवाबदेही का
एक नागरिक शिकायत करता है।
शिकायत आगे भेजी जाती है।
फिर निरीक्षण होता है।
फिर रिपोर्ट बनती है।
फिर फाइल आगे बढ़ती है।
फिर टिप्पणी आती है—‘आवश्यक कार्रवाई की जाए।’
लेकिन नागरिक का सवाल वहीं खड़ा रहता है—कार्रवाई हुई कब?
यह स्थिति किसी एक विभाग या किसी एक शहर की कहानी नहीं है। जहां प्रक्रियाएं परिणाम पर भारी पड़ने लगती हैं, वहां प्रशासनिक लीकेज पैदा होता है।
इसका इलाज केवल नई समितियां या नए आदेश नहीं हैं।
जरूरत है स्पष्ट जिम्मेदारी, समयसीमा, निगरानी और परिणाम आधारित जवाबदेही की।
जिस अधिकारी या संस्था के पास निर्णय का अधिकार है, उसके पास परिणाम की जिम्मेदारी भी होनी चाहिए।
सार्वजनिक धन का लीकेज केवल भ्रष्टाचार नहीं
‘लीकेज’ शब्द को अक्सर सीधे भ्रष्टाचार से जोड़ दिया जाता है। लेकिन इसका दायरा इससे कहीं बड़ा है।
किसी परियोजना में अनावश्यक देरी से लागत बढ़ना भी संसाधनों का लीकेज है।
खराब निर्माण के कारण बार-बार मरम्मत पर पैसा खर्च होना भी लीकेज है।
ऐसी योजना बनाना जिसका उपयोग ही कम हो, सार्वजनिक संसाधनों का लीकेज है।
एक ही जानकारी कई कार्यालयों में बार-बार तैयार करना समय का लीकेज है।
और किसी योग्य व्यक्ति तक योजना का लाभ न पहुंच पाना अवसर का लीकेज है।
देश की प्रगति केवल यह देखने से नहीं मापी जा सकती कि कितना खर्च हुआ; यह भी देखना होगा कि खर्च का वास्तविक परिणाम कितना निकला।
समाज में संवेदनाओं का लीकेज
तकनीक ने हमें जोड़ा है, लेकिन क्या उसने हमें करीब भी किया है?
एक ही घर में बैठे लोग अलग-अलग स्क्रीन पर व्यस्त हैं। पड़ोसी का हाल जानने के लिए कभी-कभी सोशल मीडिया जरूरी हो गया है। समाज में संवाद की जगह प्रतिक्रिया ने ले ली है।
असहमति अब संवाद का कारण कम और टकराव का कारण अधिक बनती दिखाई देती है।
यह भी एक तरह का सामाजिक लीकेज है—संवाद का रिसाव।
जब बातचीत खत्म होती है, तो गलतफहमियां जगह भर देती हैं।
जब भरोसा कम होता है, तो संदेह बढ़ता है।
जब संवेदना कम होती है, तो समाज में दूरी बढ़ती है।
परिवार: सबसे छोटी इकाई, लेकिन सबसे बड़ा असर
परिवार समाज की पहली संस्था है।
यहीं से विश्वास, जिम्मेदारी, अनुशासन, संवेदना और संवाद सीखे जाते हैं।
लेकिन आज परिवारों में भी समय का लीकेज है।
समय कम नहीं हुआ है, समय का उपयोग बदल गया है।
घंटों स्क्रीन के लिए हैं, लेकिन बातचीत के लिए मिनट नहीं।
कमाई बढ़ सकती है, लेकिन साथ बैठने का समय घट सकता है।
सुविधाएं बढ़ सकती हैं, लेकिन संवाद कम हो सकता है।
यही वह लीकेज है जो किसी पाइप से नहीं, रिश्तों की दीवारों से रिसता है।
डिजिटल दौर का नया लीकेज—सूचना और निजता
आज सूचना सबसे मूल्यवान संसाधनों में से एक है।
गलत सूचना, अधूरी सूचना और निजी जानकारी का अनधिकृत प्रसार समाज और संस्थाओं दोनों के लिए चुनौती बन सकता है।
एक अफवाह कुछ मिनटों में हजारों लोगों तक पहुंच सकती है।
एक गलत संदेश सामाजिक तनाव पैदा कर सकता है।
एक लीक हुई संवेदनशील जानकारी किसी व्यक्ति या संस्था को नुकसान पहुंचा सकती है।
इसलिए आधुनिक समाज में लीकेज का अर्थ सिर्फ पानी या धन का रिसाव नहीं रह गया है।
अब सूचना भी रिसती है, निजता भी और कभी-कभी सत्य भी।
समाधान क्या है?
हर समस्या का समाधान केवल ‘लीकेज रोकने’ का आदेश जारी करना नहीं हो सकता।
जरूरत है एक ऐसी व्यवस्था की जिसमें लीकेज की पहचान हो, उसका स्रोत पता चले और उसके लिए जिम्मेदारी तय हो।
इसके लिए चार सूत्र महत्वपूर्ण हैं—
पहचान— लीकेज कहां है?
जिम्मेदारी— इसके लिए कौन उत्तरदायी है?
मरम्मत— अस्थायी नहीं, स्थायी समाधान क्या है?
निगरानी— यह दोबारा शुरू तो नहीं हुआ?
पाइपलाइन में लीकेज हो तो सिर्फ पानी पोंछने से समस्या खत्म नहीं होती। पाइप ठीक करनी पड़ती है।
इसी तरह व्यवस्था में समस्या हो तो केवल बयान, आदेश या कागजी कार्रवाई पर्याप्त नहीं।
सिस्टम की मरम्मत करनी पड़ती है।
लीकेज ऑडिट क्यों जरूरी है?
जिस तरह वित्तीय ऑडिट होता है, उसी तरह अब सार्वजनिक व्यवस्था में ‘लीकेज ऑडिट’ की सोच विकसित करने की जरूरत है।
कितना बजट आया?
कहां खर्च हुआ?
कितना काम हुआ?
उसका वास्तविक लाभ कितना मिला?
कितना समय लगा?
कहां देरी हुई?
किस स्तर पर समस्या आई?
और सबसे महत्वपूर्ण—एक ही समस्या बार-बार क्यों लौट रही है?
इन सवालों के जवाब व्यवस्था के वास्तविक स्वास्थ्य की तस्वीर दिखा सकते हैं।
आखिर रोकना क्या है?
हमें सिर्फ पानी का लीकेज नहीं रोकना।
हमें संसाधनों का लीकेज, समय का लीकेज, सूचना का अनियंत्रित रिसाव, जवाबदेही का रिसाव और सबसे बढ़कर भरोसे का रिसाव रोकना है।
क्योंकि किसी देश की ताकत केवल उसकी बड़ी परियोजनाओं, ऊंची इमारतों और तेज आर्थिक विकास में नहीं होती।
उसकी असली ताकत इस बात में भी होती है कि उसकी व्यवस्था में नागरिक का भरोसा कितना बचा है।
पाइपलाइन की मरम्मत इंजीनियर कर सकता है।
फाइल का लीकेज अधिकारी रोक सकता है।
सार्वजनिक संसाधनों का दुरुपयोग निगरानी व्यवस्था रोक सकती है।
लेकिन भरोसे का लीकेज रोकने के लिए पूरी व्यवस्था को मिलकर काम करना पड़ता है।
और यही सबसे बड़ा सवाल है—
पानी बहने से पहले पाइपलाइन की मरम्मत हो सकती है, लेकिन भरोसा बह जाने के बाद उसे वापस लाना इतना आसान नहीं।
इसलिए समय रहते हर व्यवस्था को खुद से पूछना होगा—
लीकेज कहां है?
कितना है?
क्यों है?
और उसे रोकने की जिम्मेदारी आखिर किसकी है?
क्योंकि देश की प्रगति सिर्फ नई पाइपलाइन बिछाने से नहीं होगी।
जरूरत यह भी देखने की है कि पुरानी पाइपलाइन में रिसाव कितना है।