हाईकोर्ट से पटवारी हरदेव लाल बैरवा को बड़ी राहत, बर्खास्तगी आदेश रद्द, बहाली का आदेश

शाहपुरा (भीलवाड़ा)-राजेन्द्र खटीक।

शाहपुरा / स्मार्ट हलचल|जोधपुर – राजस्थान हाईकोर्ट जोधपुर ने पटवारी हरदेव लाल बैरवा की बर्खास्तगी को रद्द करते हुए उन्हें नौकरी में बहाल करने का आदेश दिया है। कोर्ट ने विभागीय कार्यवाही में गंभीर कानूनी चूक मानते हुए यह फैसला सुनाया।
माननीय न्यायमूर्ति कुलदीप माथुर* ने 07 अक्टूबर 2026 को S.B. सिविल रिट याचिका संख्या 19047/2026 पर सुनवाई करते हुए यह आदेश दिया। [2026:RJ-JD:49046]
क्या था पूरा मामला?
याचिकाकर्ता हरदेव लाल बैरवा (53), निवासी रूपाहेली खुर्द, भीलवाड़ा की नियुक्ति 1997 में पटवारी पद पर हुई थी। वह शाहपुरा तहसील में लीव रिजर्व पटवारी के रूप में पदस्थ थे और उन्हें पटवार मंडल गिरडिया का अतिरिक्त प्रभार दिया गया था।
गांव नरसिंहपुरा में सरकारी जमीन आराजी नंबर 527 पर अतिक्रमण की रिपोर्ट नहीं देने और एक नाबालिग की हत्या कर शव को कोयले की भट्टी में जलाने की घटना से जोड़ते हुए उनके खिलाफ अनुशासनात्मक कार्यवाही शुरू की गई थी। 03 अगस्त 2023 को उन्हें निलंबित किया गया।
जांच अधिकारी SDO शाहपुरा ने 03 सितंबर 2024 की जांच रिपोर्ट में स्पष्ट कहा था कि याचिकाकर्ता पर लगे आरोप सिद्ध नहीं हुए और कार्यवाही समाप्त करने की सिफारिश की थी। इसके बाद 27 दिसंबर 2024 को निलंबन रद्द कर उन्हें तहसील कोटड़ी के पटवार मंडल बोर्डा में बहाल भी कर दिया गया था।
लेकिन बाद में 22 अप्रैल 2026 को फिर से जांच रिपोर्ट पर जवाब मांगा गया और 22 जुलाई 2026 को उन्हें सेवा से बर्खास्त कर दिया गया।
कोर्ट ने क्या कहा?
कोर्ट ने मुख्य रूप से राजस्थान सिविल सेवा (वर्गीकरण, नियंत्रण और अपील) नियम, 1958 के नियम 16(10A) के उल्लंघन को आधार बनाया।
कोर्ट ने कहा कि नियम 16(10A) सिर्फ औपचारिकता नहीं, बल्कि एक महत्वपूर्ण कानूनी सुरक्षा है। जब जांच अधिकारी ने कर्मचारी को निर्दोष माना, तो अनुशासनात्मक प्राधिकारी अगर उससे असहमत है तो उसे असहमति के कारण लिखित में दर्ज करके कर्मचारी को बताने होंगे, ताकि वह अपना पक्ष रख सके।
इस मामले में रिकॉर्ड से यह कहीं नहीं दिखता कि असहमति के कारण लिखित में दर्ज किए गए हों। बाद में दी गई व्यक्तिगत सुनवाई इस अनिवार्य प्रक्रिया का विकल्प नहीं हो सकती।
अंतिम आदेश –
कोर्ट ने 22 जुलाई 2026 का बर्खास्तगी आदेश निरस्त कर दिया। याचिकाकर्ता को सभी परिणामी लाभों के साथ बहाली का हकदार माना है। हालांकि कोर्ट ने कहा है कि यदि कानून अनुमति देता है तो विभाग नियमानुसार आगे कार्यवाही कर सकता है।
इस फैसले से यह साफ हो गया है कि जांच में निर्दोष पाए जाने के बाद बिना कारण बताए बर्खास्त नहीं किया जा सकता।