“लंबू-छोटू” की अमर जुगलबंदी और पर्दे के पीछे का ‘सद्भाव’

“लंबू-छोटू” की अमर जुगलबंदी और पर्दे के पीछे का ‘सद्भाव’

‘जानी दुश्मन’ या ‘दिल अजीज दोस्त’?

एक बेबाक राजनीतिक व्यंग्य 4 — आकाश शर्मा

निम्बाहेड़ा विधानसभा की आबो-हवा में इन दिनों चुनावी सरगर्मियां शबाब पर हैं। चाय की थड़ियों से लेकर चौपालों तक केवल एक ही सवाल तैर रहा है “इण बार कुण जीती?” लेकिन इस सवाल के जवाब से इतर, निम्बाहेड़ा की जनता बीते कई दशकों से जिस एक राजनीतिक धारावाहिक को लगातार देखती आ रही है, उसका नाम है “लंबू और छोटू की सुपरहिट जोड़ी”। कहने को तो एक श्रीमंत ‘लंबूजी’ भारतीय जनता पार्टी का केसरिया दुपट्टा ओढ़े घूमते हैं, और दूसरे श्रीमान ‘छोटूजी’ हाथ के पंजे की छाप वाली खादी शर्ट में सजते हैं। विचारधारा का फासला इतना गहरा बताया जाता है कि जैसे ‘उत्तर ध्रुव’ और ‘दक्षिण ध्रुव’। लेकिन पर्दे के पीछे की कहानी यह है कि यह जोड़ी निम्बाहेड़ा की सियासत में ‘शोले’ के जय-वीरू से भी एक कदम आगे निकल चुकी है।

पर्दे पर दुश्मनी, पर्दे के पीछे ‘अटूट तालमेल’

जनता के सामने जब माइक ऑन होता है, तो दोनों दिग्गजों के तेवर देखने लायक होते हैं। लंबू जी दहाड़ते हैं, “सामने वाली सरकार ने भ्रष्टाचार के सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए !” छोटू जी पलटवार करते हैं, “विपक्ष को विकास पच नहीं रहा है, आरोप लगाना ही इनकी आदत है !” सार्वजनिक मंचों से चलने वाले इन तीखे आरोप-प्रत्यारोपों को देखकर कोई भी नौसिखिया कह सकता है कि दोनों एक-दूसरे की शक्ल भी देखना पसंद नहीं करते होंगे। मगर राजनीति के पुराने खिलाड़ी जानते हैं कि यह सब निम्बाहेड़ा की चुनावी नौटंकी का एक बेहद ही सधा हुआ ‘ड्रामा Script’ है। असली वास्तविकता तो यह है कि जब-जब सत्ता का पहिया घूमता है, तब-तब दोनों का ‘गुप्त तालमेल’ शहर की शांति और व्यवस्था को बनाए रखता है।

पूर्ववर्ती बोर्ड की कथा, “तुम मुझे मत छेड़ो, मैं तुम्हें सहलाऊंगा”

अगर पिछले नगर पालिका बोर्ड और विधानसभा कार्यकाल के पन्नों को पलटें, तो इस ‘राजनीतिक जुगलबंदी’ की सबसे खूबसूरत मिसाल देखने को मिलती है। जब कांग्रेस का बोर्ड सत्ता में था और छोटू जी कमान संभाले हुए थे, तब विपक्ष में बैठे लंबू जी ने कभी कोई ऐसा उग्र आंदोलन या प्रदर्शन नहीं किया जिससे सत्ताधारी बोर्ड की सांसें फूल जाएं। विरोध के नाम पर गिने-चुने बयान जारी हुए और औपचारिकता पूरी कर ली गई। ठीक यही फॉर्मूला तब भी लागू हुआ था जब लंबू जी की सरकार थी। छोटू जी ने भी ‘भद्र विपक्ष’ का धर्म निभाते हुए विपक्ष के हंगामे को केवल सांकेतिक विरोध तक ही सीमित रखा। इस अंदरूनी अंडरस्टेंडिंग का नतीजा यह रहा कि सत्ता किसी की भी रहे, निम्बाहेड़ा में ‘बड़े साहबों’ के निजी समीकरण, व्यापारिक हित और व्यक्तिगत रसूख कभी प्रभावित नहीं हुए।

चुनावी मोड़ और इस बार की ‘नूरा-कुश्ती’

मौजूदा चुनावी माहौल में एक बार फिर से ‘लंबू-छोटू’ की जोड़ी मैदान में पूरी मुस्तैदी से डटी हुई है। एक तरफ से नारों की गूंज है, तो दूसरी तरफ से गारंटियों का पिटारा। लेकिन समझदार वोटर अब मुस्कुराकर कह रहे हैं कि चुनाव चाहे कोई भी जीते, निम्बाहेड़ा के सत्ता केंद्र की चाबी घूम-फिरकर इन्हीं दो उंगलियों के बीच ही रहनी है। जनता के लिए यह महज एक चुनाव है जहाँ वे अपनी किस्मत का फैसला दर्ज करने वोटिंग बूथ तक जाएंगे, लेकिन ‘लंबू और छोटू’ के लिए यह अपनी कई दशकों पुरानी ‘सद्भाव की दुकान’ को पांच साल और बिना किसी रुकावट के चलाने का एक वैध लाइसेंस है। अब देखना यह दिलचस्प होगा कि जनता इस बार इस ‘अदृश्य तालमेल’ पर मुहर लगाती है या फिर इस सुपरहिट जोड़ी के ड्रामे में कोई नया मोड़ आता है!

जनता की आंखों पर ‘विचारधारा’ की पट्टी

निम्बाहेड़ा के आम मतदाता बड़े भोले हैं। वे चुनाव आते ही कार्यकर्ताओं की तरह आपस में बहस करने लगते हैं, बैनर-झंडे लेकर सड़कों पर नारेबाजी करते हैं और अपनी-अपनी पार्टियों के प्रति वफादारी साबित करने में लग जाते हैं।……………………….