(संजय पराते की राजनैतिक टिप्पणियां)
स्मार्ट हलचल|लोकतंत्र में स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव के जरिए आम जनता द्वारा दिए गए बहुमत के आधार पर हमारे देश में सरकारें आती और जाती रही हैं। पांच साल पहले जनता जिस पार्टी को अपने सिर माथे पर चढ़ाकर नाचती है, वही पार्टी पांच साल बाद धूल फांकती नजर आती है, क्योंकि जनता अपनी नजरों से उसकी नीतियों और काम को असफलता की दृष्टि से देखती है और किसी और पार्टी को मौका देती है। यही लोकतंत्र है, जिसमें कोई पार्टी स्थाई रूप से सत्ता में काबिज नहीं हो पाती।
लेकिन जिस तरह चुनाव आयोग को पंगु बनाया गया है और वह संघी गिरोह की जेब का हथियार बन गई है, निष्पक्ष और स्वतंत्र चुनाव के दिन लद गए हैं। अब भाजपा और आरएसएस दोनों मिलकर सत्ता पर स्थायी कब्जा करने का सपना देख रहे हैं और इसे हकीकत में बदलने की जी तोड़ कोशिश कर रहे हैं। विपक्षी पार्टियों में जो तोड़-फोड़ हो रही है, वह संघी गिरोह की इसी कोशिश का नतीजा है। यह लोकतंत्र के लिए घातक है और हमारे संविधान की मूल भावना के ही खिलाफ है।
तृणमूल कांग्रेस खत्म होने के कगार पर है। हालत यह हो गई है कि आज पश्चिम बंगाल में भाजपा ही सत्ता पक्ष है, भाजपा ही विपक्ष है, और बेचारी ममता बनर्जी के लिए रोने वाला शायद ही कोई बचा है। आम आदमी पार्टी को तोड़ा जा चुका है। उद्धव ठाकरे की शिवसेना दो बार टूट चुकी है। एनसीपी को तोड़कर इतना कमजोर कर दिया गया है कि अब इसके पार्टी प्रमुख शरद पवार भाजपा खेमे में जाने में ही शायद अपनी भलाई देख रहे हैं। सपा और झारखंड मुक्ति मोर्चा भी भाजपाई मिशन के निशाने पर है। इस तोड़-फोड़ का एक ही मकसद है कि किसी भी तरह भाजपाई खेमे को दो-तिहाई बहुमत का वह चमत्कारिक आंकड़ा मिल जाए, जो उसे परिसीमन विधेयक के लिए जरूरी ताकत दे सके। परिसीमन विधेयक में ही संघी गिरोह की जान बसी है, क्योंकि इसके पारित होने से उसका सत्ता पर स्थाई कब्जा करने का सपना पूरा हो सकता है। इसके साथ ही वह संविधान की मूल भावना और उसके मूल्यों के साथ मनमाना खिलवाड़ भी कर सकती है। लोकसभा चुनाव में जिस आम जनता ने भाजपा को निर्णायक बहुमत से काफी दूर रखा था, वह उसे भी ठेंगा दिखा सकती है।
पिछले लोकसभा सत्र अप्रैल में महिला आरक्षण के साथ नत्थी करके बड़ी चालाकी से जो परिसीमन विधेयक पेश किया गया था, उसे सदन में उपस्थित 528 सांसदों में से आवश्यक 352 सांसदों का बहुमत नहीं मिल पाया था और यह विधेयक गिर गया था। विपक्ष को आशंका थी कि जिन राज्यों ने आबादी नियंत्रण के काम को सफलतापूर्वक लागू किया है, संसद में उनका प्रतिनिधित्व घट जाएगा और उन्हें उनकी विकासात्मक उपलब्धियों के लिए दंडित किया जाएगा। इससे संसदीय बहुमत का अंकगणित स्थाई रूप से हिंदी भाषी क्षेत्रों की ओर झुक जाएगा और इससे दक्षिण भारत का राजनीतिक वजन कम हो जाएगा।
लेकिन पिछले तीन महीनों में गंगा में प्रदूषित पानी बहुत बह चुका है। गंगा जितनी मटमैली होगी, भाजपा उतनी ही मजबूत होगी। विपक्षी इंडिया समूह और कमजोर हुआ है और कांग्रेस इसकी जवाबदेही से बच नहीं सकती। उसने अपने बचकाने व्यवहार से द्रमुक को इस समूह से दूर किया है, सपा और झामुमो, राजद, माकपा सहित दूसरी विपक्षी पार्टियां भी नाराज है। वामपंथी पार्टियों को छोड़ दिया जाएं, तो शायद ही किसी पूंजीवादी पार्टी का धर्मनिरपेक्षता के लिए और भाजपा की सांप्रदायिक नीतियों के खिलाफ लड़ने का रिकॉर्ड बेदाग होगा। ये सभी अवसरवादी पार्टियां हैं। यह अवसरवाद कब किस पार्टी को भाजपा के गड्ढे में गिरा देगा, कहा नहीं जा सकता। भाजपा की नजर इन्हीं पूंजीवादी पार्टियों के अवसरवाद पर है।
इस लोकसभा सत्र में भाजपा फिर अपने गिरे हुए विधेयक को उठाने और उसे पारित करने के फिराक में है। उसे आशा है कि इंडिया समूह की कमजोरी, विपक्षी पार्टियों के अवसरवाद और अपनी तोड़ फोड़ की राजनीति के जरिए वह इस विधेयक के लिए आवश्यक 362 सांसदों का समर्थन जुटा लेगी।
यदि ऐसा होता है, तो यह इस देश का दुर्भाग्य ही होगा, क्योंकि यदि सभी राज्यों में समान अनुपात में सीटें बढ़ा भी दी जाएं, तो भी उत्तर भारत की कुल सीटों का आंकड़ा इस बात को सुनिश्चित करने के लिए पर्याप्त होगा कि अपनी सांप्रदायिक नीतियों और ध्रुवीकरण की राजनीति के साथ भाजपा संसद में स्थाई रूप से कब्जा कर लें। दक्षिण भारत जो आज पूरे देश की राजनीति में अहम भूमिका निभाता है और जहां अपना सिर फोड़ने के बाद भी भाजपा अपना कोई खास असर नहीं बना पाई है, हमेशा के लिए हाशिए पर ढकेल दिए जाएंगे। भाजपा यही चाहती भी है। लेकिन देश के एक हिस्से को अखिल भारतीय राजनीति में हाशिए पर धकेलने का देश की एकता और अखंडता पर कितना नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा, इसकी कल्पना शायद ही हम अभी कर सके।
लेकिन एक बात स्पष्ट है। परिसीमन विधेयक के पारित होने से न केवल संविधान में उल्लेखित देश का संघीय ढांचा कमजोर होगा, बल्कि हमारा देश को फासीवाद के और पास में चला जाएगा। हो सकता है कि चुनाव के रूप में छद्म लोकतंत्र जिंदा रहे, लेकिन न लोगों के लोकतांत्रिक अधिकार कायम रहेंगे, न मानवाधिकारों की कोई कद्र होगी। संघी गिरोह का दर्शन न केवल ईसाईयों, मुस्लिमों और कम्युनिस्टों के खिलाफ है, बल्कि वह उस प्रत्येक नागरिक के खिलाफ है, जो उसकी विचारधारा से सहमत नहीं है। एसआईआर की प्रक्रिया में इसकी झलक पूरा देश देख चुका है, जहां 10 करोड़ नागरिकों को छांट-छांट कर निशाना बनाया जा रहा है। पासपोर्ट को भी नागरिकता का प्रमाणपत्र न मानने की घोषणा करके इस दिशा में यह सरकार एक कदम और आगे बढ़ चुकी है। वास्तव में मोदी सरकार अब उन लोगों को ही इस देश का नागरिक बनाना चाह रही है, जो उसके फासीवादी यज्ञ में अपनी आहुति देने के लिए तैयार हैं। बाकी गैर-नागरिकों के लिए अरब की खाड़ी तो है ही!
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*2. और अब प्राथमिक स्कूलों को बंद करने की तैयारी!*
जिस नई शिक्षा नीति और उसके जरिए भारतीय मूल्यों के प्रचार-प्रसार का दावा नरेंद्र मोदी की संघी सरकार कर रही है, उसकी पोल अब धीरे-धीरे खुलने लगी है। नीति आयोग के जरिये सरकार ने यह मंशा जाहिर कर दी है कि वह प्राथमिक स्कूलों को बड़ी संख्या में बंद करेगी, क्योंकि आर्थिक दृष्टि से वे लाभप्रद नहीं है।
भारत जब आजाद हुआ था, तो औसत साक्षरता दर बहुत कम थीI इस चुनौती से निपटने के लिए शिक्षा का जो ढांचा अपनाया गया था, उसके मूल में यही विचार था कि हमारे देश का कोई भी बच्चा प्राथमिक शिक्षा के दायरे से बाहर न रहे। इसके लिए सैद्धांतिक रूप से यह तय किया गया था कि प्राथमिक स्कूल के बच्चे को एक किमी. से ज्यादा पैदल न चलना पड़े। इसके सकारात्मक नतीजे भी मिले। 2011 में साक्षरता दर बढ़कर करीब 73% हो गयी और महिलाओं में औसत साक्षरता दर बढ़कर 65% हो गयी।
आज देश में सात लाख तीस हज़ार के करीब सरकारी प्राइमरी स्कूल हैं। लेकिन इनमें से एक-तिहाई से ज़्यादा (लगभग ढाई लाख) स्कूलों में कुल मिलाकर 50 से भी कम बच्चे हैं। इनमें से लगभग 5% स्कूल ऐसे हैं, जहाँ 10 से भी कम बच्चे पढ़ते हैं और करीब 8% स्कूल ऐसे हैं, जहाँ सिर्फ़ 11 से 20 बच्चे ही पढ़ते हैं।
नीति आयोग का यह मानना है कि शिक्षा के क्षेत्र में व्यापक सुधार के लिए और देश को 2047 तक विकसित राष्ट्र बनाने के लिए कम बच्चे वाले स्कूलों को बंद कर देना चाहिए, क्योंकि ऐसे स्कूलों को चलाना आर्थिक रूप से अप्रभावी और प्रशासनिक तौर पर चुनौतीपूर्ण होता है। साफ तौर पर यह समझदारी उस रणनीति के उलट है, जो शिक्षा को सार्वभौमिक बनाने और 100 प्रतिशत साक्षरता को प्राप्त करने के उद्देश्य से आजादी के बाद से आज तक हमने अपनाई है।
नीति आयोग की यह समझदारी शिक्षा के क्षेत्र को माल बनाने और प्राथमिक शिक्षा के स्तर से ही शिक्षा का निजीकरण करने की समझदारी है। मोदी सरकार की नीति भी यही है कि जिसकी औकात हो, वह पढ़े। हाल ही में विभिन्न परीक्षाओं में प्रश्न पत्र लीक होने की जो घटनाएं सामने आई है, वह भी यही कहती है कि जिसकी औकात हो, वह शिक्षा और रोजगार को खरीद ले।
यदि इन कम बच्चों वाले स्कूलों में औसत दर्ज संख्या 30 भी मानी जाएं, तो ढाई लाख स्कूलों को बंद करने का अर्थ है, 75 लाख बच्चों को सरकारी प्राथमिक शिक्षा क्षेत्र के दायरे से बाहर करना। चूंकि इनमें से अधिकांश स्कूल दूरस्थ और पहुंच विहीन इलाकों में पड़ते हैं और इन स्कूलों में पढ़ने वाले अधिकांश बच्चे गरीब, आदिवासी, दलित और सामाजिक रूप से पिछड़े तबकों से ताल्लुक रखते हैं, यह माना जा सकता है कि शिक्षा से निष्कासित होने वाला शायद ही कोई बच्चा निजी और महंगी शिक्षा के क्षेत्र में कदम रखेगा। इससे साक्षरता दर, और खासकर महिला साक्षरता प्रतिकूल रूप से प्रभावित होंगी।
नीति आयोग की रिपोर्ट यह स्वीकार करती है कि मोदी राज के पिछले एक दशक के दौरान पूरे देश में लगभग 94000 स्कूल बंद हो गए हैं। वर्ष 2014-15 में देश भर में स्कूलों की संख्या 11.07 लाख थी, जो वर्ष 2024-25 तक घटकर 10.13 लाख रह गई है। इसी अवधि के दौरान देश में सरकारी सहायताप्राप्त स्कूलों की संख्या भी 83000 से घटकर 79000 रह गई है। इसी प्रकार, इसी अवधि में निजी स्कूलों की संख्या 2.88 लाख से बढ़कर 3.39 लाख हो गई है। इसका अर्थ है कि देश में 25-26 स्कूल रोज बंद हो रहे हैं और इनकी जगह रोज 13-14 निजी स्कूल ले रहे हैं। साफ है कि निजी स्कूलों के विस्तार से सार्वजनिक शिक्षा की बच्चों तक पहुंच और इसकी वहनीयता पर विनाशकारी पड़ा है। इससे सरकारी स्कूलों में दाखिलों की संख्या में गिरावट आना ही था और यह संख्या 2.26 करोड़ से ज्यादा है।
लेकिन मोदी सरकार को गरीब तबकों के हितों, उनकी चिंताओं और समस्याओं से कोई लेना-देना नहीं है। उसे तो कॉरपोरेटों का हित साधने के लिए देश के करोड़ों लोगों और लाखों परिवारों को अशिक्षा के अंधकार में धकेलने में भी कोई हिचक नहीं है। संघी गिरोह की सरकार शिक्षा के क्षेत्र में जिन नीतियों को लागू कर रही है, वह सार्वभौमिक शिक्षा के लक्ष्य को परास्त करने वाला और आज तक हासिल उपलब्धियों को मटियामेट करने वाला है।
