डॉ. सुरेश पाण्डेय, नेत्र सर्जन, कोटा
स्मार्ट हलचल|चंबल के किनारे बसा हमारा कोटा केवल नक्शे पर दर्ज एक शहर नहीं है। यह स्वाद की पहचान है, कला और परंपरा की पहचान है, उद्योग और परिश्रम की पहचान है और सबसे बढ़कर आज यह लाखों विद्यार्थियों के सपनों की पहचान बन चुका है।जिस कोटा को कभी कचौरी, कोटा स्टोन और कोटा डोरिया के लिए जाना जाता था, वही शहर धीरे-धीरे देश की “शिक्षा नगरी” और “शिक्षा की काशी” बन गया।
लेकिन यह करिश्मा एक दिन में नहीं हुआ।
इसके पीछे वर्षों की तपस्या है, अनगिनत शिक्षकों का समर्पण है और वे अनदेखी रातें हैं, जब किसी शिक्षक को अपने विद्यार्थियों के परिणाम की चिंता स्वयं सोने नहीं देती थी।
इसके पीछे वे कक्षाएँ हैं, जहाँ केवल मैथ्स , फिजिक्स , केमिस्ट्री या बायोलॉजी नहीं पढ़ाया गया, बल्कि बच्चों को असफलता के बाद फिर खड़ा होना, कठिनाइयों से लड़ना और स्वयं पर विश्वास करना भी सिखाया गया।
कोटा की असली कहानी केवल विशाल कोचिंग इमारतों की कहानी ही नहीं है। यह उन जुनूनी शिक्षकों की भी अनकही कहानी है, जिन्होंने छोटे शहरों और गाँवों से आए बच्चों की आँखों में बड़े सपने देखे और धीरे-धीरे उन सपनों को अपना सपना बना लिया।
किसी विद्यार्थी के लिए उन्होंने कठिन से कठिन सवाल को आसान बनाया।
किसी का आत्मविश्वास डगमगाया तो उसे संभाला।
किसी के कम अंक आए तो समझाया, “एक परीक्षा तुम्हारा भविष्य तय नहीं करती।”
और किसी निराश बच्चे के कंधे पर हाथ रखकर बस इतना कहा,
“तुम कर सकते हो… मुझे तुम पर पूरा विश्वास है।”
शायद शिक्षा की दुनिया में इससे शक्तिशाली वाक्य बहुत कम हैं।
एक महान शिक्षक की पहचान केवल इस बात से नहीं होती कि उसके विद्यार्थियों ने कितनी रैंक हासिल की या कितने अंक प्राप्त किए। उसकी वास्तविक पहचान इस बात से होती है कि उसने कितने बच्चों के भीतर आत्मविश्वास जगाया, कितनों को अनुशासन सिखाया, कितनों को निराशा से निकाला और कितनों में फिर से आगे बढ़ने का साहस पैदा किया।
आज कोटा की सड़कों और गलियों में हजारों युवा अपनी आँखों में एक सपना लेकर चलते दिखाई देते हैं।
किसी की आँखों में डॉक्टर बनने का सपना है।
किसी की आँखों में इंजीनियर बनने का सपना है।
किसी के माता-पिता ने वर्षों की छोटी-छोटी बचत उसके भविष्य पर लगा दी है।
कोई पहली बार अपने घर से सैकड़ों किलोमीटर दूर रह रहा है।
और कोई हर रात अपने माता-पिता से फोन पर बस इतना कहता है,
“आप चिंता मत करना… मैं पूरी मेहनत कर रहा हूँ।”
इस एक वाक्य के पीछे कितनी उम्मीदें छिपी होती हैं, कितनी बेचैन रातें, कितना त्याग, कितनी जिम्मेदारियाँ और कितने सपने जुड़े होते हैं, शायद इसका पूरा हिसाब कभी लगाया ही नहीं जा सकता।
इन सपनों की यात्रा में शिक्षक केवल पढ़ाने वाला व्यक्ति नहीं रह जाता।
कभी वह गुरु होता है।
कभी मार्गदर्शक।
कभी मित्र।
और कई बार घर से दूर रह रहे बच्चे के लिए माता-पिता जैसा सहारा।
यही एक शिक्षक की सबसे बड़ी शक्ति है। वह बच्चे के भीतर उस समय भी संभावना देख सकता है, जब बच्चा स्वयं अपने ऊपर विश्वास खोने लगता है। वह केवल उत्तर नहीं बताता, वह सही प्रश्न पूछना सिखाता है। वह केवल परीक्षा की तैयारी नहीं करवाता, वह जीवन की कठिन परीक्षाओं के लिए भी मन को तैयार करता है।
शिक्षक दिवस के अवसर पर मेरा सादर नमन उन सभी गुरुजनों को, जिन्होंने अपने ज्ञान, परिश्रम, धैर्य और संवेदनशीलता से कोटा को केवल कोचिंग का शहर नहीं रहने दिया, बल्कि उसे आशा, संघर्ष, अनुशासन, विश्वास और सपनों की राजधानी बना दिया।
कचौरी कोटा का स्वाद हो सकती है।
कोटा स्टोन उसकी औद्योगिक पहचान हो सकता है।
कोटा डोरिया उसकी कला और परंपरा का गौरव हो सकती है।
कोचिंग उसकी राष्ट्रीय पहचान हो सकती है।
लेकिन कोटा का सबसे बड़ा करिश्मा उसके शिक्षक हैं।
क्योंकि इमारतें संस्थान बना सकती हैं, तकनीक पढ़ाई को आसान बना सकती है, किताबें ज्ञान दे सकती हैं, लेकिन किसी विद्यार्थी के भीतर सोए हुए आत्मविश्वास को जगाने का चमत्कार आज भी एक संवेदनशील शिक्षक ही कर सकता है।
और शायद इसी कारण कोटा केवल शिक्षा नगरी के साथ साथ शिक्षकों की भी नगरी है।
यह उन गुरुओं की तपोभूमि है, जिन्होंने न जाने कितने बच्चों के सपनों को अपने ज्ञान, परिश्रम और आशीर्वाद से पंख दिए हैं।
शिक्षक दिवस पर ऐसे सभी गुरुजनों के चरणों में सादर नमन।
आप सभी को शिक्षक दिवस की अनंत शुभकामनाएँ।
डॉ सुरेश पाण्डेय,
नेत्र सर्जन, सुवि नेत्र चिकित्सालय, कोटा.

