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डर के कारण या रणनीति के कारण राहुल ने अमेठी छोड़ी ?

डर के कारण या रणनीति के कारण राहुल अमेठी छोड़ी ?

> अशोक भाटिया,

स्मार्ट हलचल/कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष और केरल के वायनाड से सांसद राहुल गांधी ने उत्तर प्रदेश की रायबरेली लोकसभा सीट से नामांकन किया तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हमलावर हो गए। उन्होंने कटाक्ष करते हुए कहा कि राहुल गांधी ने वायनाड में अपनी हार भांप ली है, इसलिए उन्हें रायबरेली का रुख करना पड़ा है।प्रधानमंत्री मोदी ने राहुल पर हमला बोलते हुए कहा, ‘अमेठी सीट से हारने के बाद वायनाड जाने वाले कांग्रेस के ‘शहजादे’ अब रायबरेली से चुनाव लड़ रहे हैं। उन्हें पता है कि इस बार वह वायनाड भी हारेंगे।’ राहुल ने अपनी मौजूदा संसदीय सीट वायनाड से भी नामांकन भरा था। इस सीट पर मतदान दूसरे चरण में ही संपन्न हो चुका है। सवाल उठता है कि क्या प्रधानमंत्री का यह दावा ठोस तर्कों पर आधारित है? क्या इस बार वायनाड से राहुल गांधी हार जाएंगे और क्या रायबरेली में वो अपनी मां सोनिया गांधी की विरासत को संभालने में कामयाब रहेंगे? सवाल है कि अगर राहुल वायनाड और रायबरेली, दोनों जीत गए या फिर दोनों जगह से हार गए तो क्या होगा?

बताया जाता है कि राहुल गांधी का अमेठी सीट छोड़कर रायबरेली से चुनाव लड़ने का फैसला चुनाव हारने के डर से नहीं बल्किभाजपा की रणनीति को फेल करने की मंशा माना जा रहा है। 2024 का चुनावी माहौल पूरी तरह से मोदी बनाम राहुल के इर्द-गिर्द ही नजर आ रहा है। ऐसे में अगर राहुल गांधी अमेठी सीट से चुनाव लड़ते तो यह नैरेटिव बदलकर राहुल बनाम ईरानी हो जाता. इस तरह की कहानी गढ़ने से रोकने के लिए कांग्रेस ने अमेठी की जगह राहुल गांधी को रायबरेली से मैदान में उतारने का फैसला किया.

अगर राहुल गांधी अमेठी से चुनाव लड़ते तो प्रियंका गांधी रायबरेली सीट से उम्मीदवार बनने को मजबूर हो जातीं। प्रियंका गांधी को लोकसभा चुनाव लड़ने में कोई दिलचस्पी नहीं थी। इसके पीछे वजह यह थी कि अगर प्रियंका गांधी चुनावी मैदान में उतरती हैं तो भाजपा को भाई-भतीजावाद के मुद्दे पर कांग्रेस को घेरने का मौका मिल जाएगा। इतना ही नहीं अगर राहुल गांधी और प्रियंका गांधी दोनों चुनाव लड़ते तो उन्हें अपनी-अपनी सीटों पर व्यस्त रहना पड़ता। ऐसे में देश के अन्य हिस्सों में भी कांग्रेस का चुनाव प्रचार प्रभावित होने की आशंका जताई जा रही थी। अगर राहुल और प्रियंका अपने इलाकों में कम समय देते हैं तो इलाके के प्रति उदासीनता के आरोप लगने लगेंगे.

रणनीति के तहत कांग्रेस ने राहुल गांधी को रायबरेली से मैदान में उतारा है ताकि उन पर प्रदेश से भागने का आरोप न लग सके और प्रियंका अन्य क्षेत्रों में चुनाव प्रचार के लिए भी उपलब्ध रहें। प्रियंका गांधी के अब उम्मीदवार नहीं होने सेभाजपा औरप्रधानमंत्री मोदी के लिए कांग्रेस पर भाई-भतीजावाद के आरोपों को गहरा करना मुश्किल होगा। इसीलिए राहुल गांधी को अमेठी की जगह रायबरेली सीट से मैदान में उतारा गया है ताकि चुनाव मेंभाजपा को कोई मौका न मिले।

स्मृति ईरानी एक बार फिर भाजपा के टिकट पर अमेठी लोकसभा सीट से चुनाव लड़ रही हैं। वे पिछले चार महीनों से डेरा डाले हुए हैं। अगर राहुल गांधी अमेठी से स्मृति ईरानी के खिलाफ चुनाव लड़ते और किसी कारणवश दोबारा चुनाव हार जाते तो कांग्रेस के साथ-साथ गांधी परिवार को भी इसका संदेश राजनीतिक रूप से बहुत गलत होता। इससे उत्तर भारतीय राजनीति में राहुल के लिए राजनीतिक राह बहुत मुश्किल हो जाती। माना जा रहा है कि इस दुविधा से बचने के लिए अमेठी की जगह रायबरेली सीट को चुना गया है।

रायबरेली में राहुल गांधी की हार का दावा करते हुए प्रधानमंत्री ने संसद में अपने भाषण की याद दिलाई। उन्होंने सोनिया गांधी पर तंज कसते हुए कहा, ‘ओपिनियन पोल’ या फिर ‘एक्जिट पोल’ की कोई जरूरत नहीं है क्योंकि मैंने संसद में बहुत पहले उनकी (कांग्रेस) हार की बात कह दी थी। जब उनके वरिष्ठ नेता अपनी लोकसभा सीट छोड़कर राजस्थान से राज्यसभा जा रहे हैं तो यह इस बात का सबूत है कि उन्होंने हार भांप ली है।’ यह सच है कि रायबरेली में सोनिया गांधी की जीत का अंतर घटता जा रहा था। 2014 में सोनिया गांधी ने अपनी पारिवारिक सीट पर 3,52,713 (42.7) वोटों के अंतर से भाजपा कैंडिडेट अजय अगरवाल को हराया था। तब सोनिया गांधी को 5,26,434 (63.8%) वोट मिले थे जबकि अगरवाल को 1,73,721 (21.1%) वोटों से ही संतोष करना पड़ा था। लेकिन 2019 के चुनाव में सोनिया गांधी की जीत का अंतर सिमटकर 1,67,178 (17.44%) वोटों तक रह गया। तब सोनिया को 5,34,918 (55.78%) वोट मिले जबकि भाजपा कैंडिडेट दिनेश प्रताप सिंह ने 3,67,740 (38.4%) वोट हासिल करने में सफलता पाई। यानी एक चुनाव के अंतर में भाजपा ने रायबरेली में 17 प्रतिशत से ज्यादा वोट बढ़ा लिया जबकि कांग्रेस पार्टी 8% वोट घट गया। क्या इस बार भाजपा इस 17% वोट का अंतर पाट लेगी? आइए इस सवाल का जवाब उत्तर प्रदेश में ही गांधी परिवार के एक और गढ़ अमेठी में ढूंढने की कोशिश करते हैं।
पहले तो इस सवाल को ही परखें कि आखिर राहुल गांधी के वायनाड से जीतने पर संदेह क्यों जताई जा रही है? इसके पीछे बड़ी वजह है वायनाड में पिछली बार के मुकाबले इस बार राहुल के सामने खड़ी कैंडिडेट। राहुल गांधी ने पिछली बार मुस्लिम और ईसाई मतदाताओं के दबदबे वाले वायनाड लोकसभा सीट को सुरक्षित समझा था। अमेठी में हार की आशंका के बीच राहुल का यह फैसला सही साबित हुआ था और वो वायनाड में भाकपा प्रत्याशी को हराकर संसद पहुंच गए। 2019 के लोकसभा चुनाव में राहुल गांधी को वायनाड में 7,06,367 (64.7%) जबकि प्रतिद्वंद्वी सीपीआई प्रत्याशी 2,4,597 (25.1%) वोट ही मिले थे। इस बार हालात अलग हैं। प्रदेश के सत्ताधारी वाम गठबंधन ने इस बार अपना प्रत्याशी बदल दिया है। इस बार राहुल का भाकपा महासचिव डी राजा की पत्नी एनी राजा से मुकाबला है। हालांकि, पिछली बार की तरह ही इस बार भी इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग (आईयूएमएल) का समर्थन राहुल गांधी को प्राप्त है। वायनाड के मुस्लिम मतदाताओं पर आईयूएमल का बहुत प्रभाव है, लेकिन एनी राजा का अपने सपोर्ट बेस है। इसलिए वहां राहुल के लिए जीत आसान नहीं बताई जा रही है।

वैसे देखा जाय तो कांग्रेस और नेहरू-गांधी परिवार का रिश्ता अमेठी और रायबरेली से काफी पहले ही स्थापित हो गया था। रायबरेली के साथ नेहरू-गांधी परिवार का रिश्ता चार पीढ़ियों पुराना है और आजादी से पहले का है, जबकि अमेठी सीट से गांधी परिवार का लगाव 1977 से है, जब संजय गांधी ने चुनाव लड़ा था। सोनिया गांधी की सास इंदिरा गांधी के पति फिरोज गांधी ने रायबरेली से चुनाव लड़ा था और जीतकर सांसद बने थे, उसके बाद इंदिरा गांधी ने अमेठी सीट को अपना कर्मस्थान बनाया था। 1967 के आम चुनाव में इंदिरा गांधी ने यहां से जीत दर्ज की। इसके बाद वह 1971 और 1980 में सांसद बनीं। सोनिया गांधी 2004 से रायबरेली सीट से सांसद हैं।

रायबरेली लोकसभा सीट मोतीलाल नेहरू, पंडित जवाहर लाल नेहरू, इंदिरा गांधी और फिर सोनिया गांधी से जुड़ी है। आजादी से पहले किसान आंदोलन के दौरान 7 जनवरी 1921 को मोतीलाल नेहरू ने पंडित जवाहर लाल नेहरू को अपना प्रतिनिधि बनाकर भेजा था. इसी तरह 8 अप्रैल 1930 को यूपी में दांडी मार्च के लिए रायबरेली को चुना गया था और उस समय जवाहरलाल नेहरू कांग्रेस के अध्यक्ष थे, उन्होंने अपने पिता मोतीलाल नेहरू को रायबरेली भेजा था। इसके बाद से ही रायबरेली सीट से नेहरू-गांधी परिवार जुड़ा हुआ है। इसीलिए जब राहुल गांधी को रायबरेली और अमेठी में से किसी एक को चुनना था तो उन्होंने रायबरेली को चुना।

गांधी परिवार रायबरेली सीट नहीं छोड़ना चाहता, क्योंकि उससे उसका चार पीढ़ियों पुराना रिश्ता है। अमेठी सीट 1977 में बनी थी और संजय गांधी ने पहली बार यह चुनाव लड़ा, लेकिन हार गए। इसके बाद 1980 में वह जीतने में कामयाब रहे, उसके बाद से राजीव गांधी, सोनिया गांधी और राहुल गांधी चुनाव लड़े। अमेठी में राजीव और सोनिया अजेय थे, लेकिन राहुल गांधी लगातार तीन चुनाव जीतने के बाद 2019 में हार गए। सोनिया गांधी 2024 में लोकसभा चुनाव लड़ रही हैं, क्योंकि वह राज्यसभा सांसद हैं और प्रियंका चुनाव लड़ने के इच्छुक नहीं हैं। ऐसे में राहुल गांधी वायनाड सीट से चुनाव लड़ रहे हैं, लेकिन जब अमेठी या रायबरेली से चुनाव लड़ने की बारी आई तो उनके लिए रायबरेली को चुना गया।

वायनाड सीट से राहुल गांधी चुनाव लड़ रहे हैं, जहां से उनकी जीत तय मानी जा रही है। राहुल गांधी पर रायबरेली या कांग्रेस की परंपरागत सीट अमेठी से चुनाव लड़ने का दबाव था। ऐसे में राहुल ने साफ कर दिया था कि उन्हें चुनाव लड़ने और हारने का डर नहीं है, लेकिन अगर वह चुनाव जीतते हैं तो वायनाड सीट नहीं छोड़ेंगे। ऐसे में कांग्रेस ने अमेठी की जगह रायबरेली सीट से चुनाव लड़ने का फैसला किया, क्योंकि गांधी परिवार के लिए अमेठी से ज्यादा अहम रायबरेली है। इसीलिए राहुल गांधी को अमेठी की जगह रायबरेली सीट से उम्मीदवार बनाया गया है और अमेठी से किशोरी लाल शर्मा को टिकट दिया गया है।
जानकर लोगों का कहना है कि अमेठी की जगह रायबरेली सीट से चुनाव लड़ने के पीछे खास रणनीति ये भी है कि अगर राहुल गांधी दोनों सीटों से जीत जाते हैं तो उन्हें एक सीट से इस्तीफा देना होगा. अगर राहुल गांधी लोकसभा चुनाव के बाद दोनों सीटों से जीतने में सफल रहते हैं, अगर वह रायबरेली या वायनाड सीट छोड़ देते हैं तो प्रियंका गांधी वहां से वैकल्पिक उम्मीदवार के तौर पर उपलब्ध होंगी. जिस तरह राहुल गांधी किसी भी सूरत में वायनाड सीट नहीं छोड़ना चाहते हैं, उसी तरह माना जा रहा है कि वह रायबरेली सीट छोड़ देंगे। ऐसे में प्रियंका गांधी उपचुनाव लड़कर सांसद बन सकती हैं।

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